रसोई से आती बर्तनों की खटपट के बीच मीरा की दबी हुई सिसकियाँ भी जैसे उस घर की दीवारों का हिस्सा बन चुकी थीं। मीरा, जो पिछले आठ सालों से इस घर की बहू थी, आज भी खुद को एक अजनबी ही महसूस करती थी। उसका पति, विकास, शहर के एक बड़े दफ़्तर में काम करता था। कहने को तो घर में पैसे की कोई कमी नहीं थी, लेकिन जिस चीज़ से एक घर असल में घर बनता है—वह था प्रेम और सम्मान, जो उस चौखट के भीतर कहीं गुम हो चुका था।
मीरा की सास, सुमित्रा देवी, पुराने ख्यालों की महिला थीं। उनके लिए उनका बेटा विकास श्रवण कुमार से कम नहीं था, भले ही विकास हफ़्तों तक अपनी माँ के पास बैठकर दो पल बात ना करे। सुमित्रा देवी को लगता था कि बेटा दिन भर बाहर कमाता है, तो थक जाता है। उनकी नज़र में विकास की हर गलती, हर बेरुखी का कारण उसके दफ़्तर का तनाव था। और इस तनाव को दूर करने की ज़िम्मेदारी केवल मीरा की थी। अगर विकास घर आकर चीखता, तो गलती मीरा की होती कि उसने कुछ ऐसा कह दिया होगा जिससे उसका मूड खराब हुआ।
उस रात भी कुछ ऐसा ही हुआ था। विकास शराब पीकर घर लौटा था। खाना परोसते समय मीरा के हाथ से गलती से पानी का गिलास छलक गया। बस फिर क्या था, विकास ने पूरी थाली ज़मीन पर फेंक दी और मीरा को अपशब्द कहने लगा। सुमित्रा देवी अपने कमरे से बाहर आईं, लेकिन अपने बेटे को रोकने के बजाय उन्होंने मीरा को ही हिदायत दी कि उसे पति के मिज़ाज का ध्यान रखना चाहिए। इस पूरी घटना के दौरान, कमरे के दरवाज़े के पीछे छिपा आठ साल का कबीर अपनी सहमी हुई आँखों से यह सब देख रहा था।
अगली सुबह घर में एक अजीब सी खामोशी थी। विकास बिना किसी से बात किए नाश्ता करके दफ़्तर चला गया। मीरा आंगन में बैठी कल रात के बिखरे हुए चावल और टूटे बर्तनों के टुकड़े समेट रही थी। उसकी आँखें सूजी हुई थीं और चेहरा उतरा हुआ था। सुमित्रा देवी अपनी चारपाई पर बैठी माला जप रही थीं। तभी कबीर दौड़ता हुआ आया और अपनी दादी की चारपाई से टकरा गया। सुमित्रा देवी के हाथ से माला छिटक कर गिर गई।
“अरे कबीर! देखकर नहीं चल सकता? दिन भर बस उधम मचाता रहता है। एकदम नासमझ है तू, जरा भी अक्ल नहीं है कि घर में कैसे रहना चाहिए,” सुमित्रा देवी ने खीझते हुए कहा।
कबीर सहम गया और चुपचाप अपनी माँ के पास जाकर खड़ा हो गया। उसने अपने नन्हे हाथों से मीरा के आँसू पोंछे और अपनी जेब से एक मुड़ी-तुड़ी चॉकलेट निकालकर मीरा की हथेली पर रख दी। “माँ, तुम रो मत। ये लो, मैंने कल अपने पैसे बचाकर तुम्हारे लिए ली थी। तुम खुश हो जाओगी ना इसे खाकर?” कबीर ने मासूमियत से पूछा।
सुमित्रा देवी, जो अभी भी कबीर को घूर रही थीं, तंज़ कसते हुए बोलीं, “क्या मीरा, इस छटंके को कुछ तो सिखाया कर। दिन भर खेल-कूद और शरारत। मेरी माला गिरा दी। इसे क्या पता कि घर-गृहस्थी और बड़ों का आदर क्या होता है। बिल्कुल नासमझ है अभी।”
मीरा, जो अब तक हमेशा चुपचाप हर ताना सुन लेती थी, आज उसके भीतर जैसे कुछ टूट गया था। कल रात का अपमान, पिछले आठ सालों की घुटन और अब अपने मासूम बेटे के लिए कहे गए ये शब्द। उसने कबीर को अपने सीने से लगाया और पहली बार सुमित्रा देवी की आँखों में आँखें डालकर बोली।
“हाँ माँ जी, उम्र में तो यह बहुत छोटा है, पर नासमझ बिल्कुल नहीं है।” मीरा की आवाज़ में एक अजीब सी दृढ़ता थी, जो सुमित्रा देवी ने पहले कभी नहीं सुनी थी।
“काहे? ऐसा क्या समझ लिया इस आठ साल के बच्चे ने जो तू इसकी इतनी वकालत कर रही है?” सुमित्रा देवी ने त्यौरियां चढ़ाते हुए पूछा।
मीरा ने गहरी साँस ली, उसकी आँखों में आँसू थे लेकिन आवाज़ कांप नहीं रही थी। “वो इसलिए माँ जी, क्योंकि इस आठ साल के बच्चे को यह पता है कि उसकी माँ की आँखों में आँसू कब और क्यों आते हैं। इसे पता है कि मेरी कौन सी मुस्कान सच्ची है और कौन सी झूठी। यह जानता है कि जब मैं खाना नहीं खाती, तो यह अपनी आधी रोटी चुपचाप मेरे पास लाकर रख देता है। इसे यह अक्ल है कि अपनी माँ के चेहरे पर मुस्कान कैसे लानी है। इसे मेरी तकलीफ दिखती है।”
मीरा रुकी, उसने सुमित्रा देवी के चेहरे पर आते बदलाव को देखा और फिर आगे बोली, “और एक आपका सपूत है… आपका पढ़ा-लिखा, समझदार बेटा। जिसे ना अपनी बूढ़ी माँ की परवाह है कि आपने सुबह से अपनी दवा ली है या नहीं। ना उसे अपने इस बच्चे के भविष्य की फिक्र है कि कबीर किस क्लास में पढ़ता है या उसके मन में क्या चल रहा है। और मेरी बात तो आप छोड़ ही दीजिए… मेरे वजूद को तो वो इस घर की एक निर्जीव वस्तु से ज्यादा कुछ नहीं समझता। बात-बात पर मुझे मेरे मायके की याद दिलाकर यह साबित करता है कि मैं इस घर की कभी थी ही नहीं।”
सुमित्रा देवी स्तब्ध रह गईं। उनके होंठ कुछ बोलने के लिए खुले, लेकिन कोई शब्द नहीं निकला।
मीरा ने अपनी बात पूरी करते हुए एक ऐसा सवाल दागा जिसने सुमित्रा देवी के अंतर्मन को झकझोर कर रख दिया। “अब आप ही अपने मन पर हाथ रखकर पूछिए माँ जी… और मुझे बताइए कि असली ‘नासमझ’ कौन है? मेरा यह आठ साल का बच्चा, जो बिना कहे मेरी हर तकलीफ समझ लेता है, या आपका बत्तीस साल का बेटा, जिसे अपने ही घर में किसी के दर्द का कोई अहसास नहीं है?”
आंगन में एक भारी सन्नाटा छा गया। हवा का चलना भी जैसे बंद हो गया था। सुमित्रा देवी के पास मीरा के इस सवाल का कोई जवाब नहीं था। जो पर्दा उन्होंने अपने बेटे के मोह में अपनी आँखों पर डाल रखा था, वह आज एक झटके में गिर चुका था। उन्हें याद आया कि पिछले छह महीनों से विकास ने उनके पास बैठकर यह भी नहीं पूछा था कि उनके घुटनों का दर्द कैसा है। उन्हें यह भी याद आया कि विकास कैसे मीरा को हर बात पर नीचा दिखाता था।
सुमित्रा देवी की नज़रें अपने आप झुक गईं। उनका अहम, उनका लाड-प्यार सब आज एक कड़वे सच के सामने हार गया था। वे धीरे-धीरे अपने पैर के अंगूठे से ज़मीन की मिट्टी कुरेदने लगीं, जैसे उनके पास अपनी शर्मिंदगी छिपाने के लिए कोई और जगह न बची हो।
कबीर ने अपनी माँ का हाथ पकड़ा और धीरे से बोला, “माँ, चलो ना, मुझे स्कूल के लिए देर हो रही है।” मीरा ने सुमित्रा देवी की ओर एक आखिरी बार देखा, अपनी साड़ी का पल्लू ठीक किया और कबीर को लेकर अंदर चली गई।
उस दिन के बाद से उस घर की दीवारें तो वहीं रहीं, लेकिन सुमित्रा देवी के सोचने का नज़रिया हमेशा के लिए बदल गया। उन्हें समझ आ गया था कि रिश्तों की समझदारी उम्र से नहीं, बल्कि दिल में बसे अहसास और परवाह से आती है। एक छोटा सा बच्चा जो प्यार और संवेदना की भाषा समझता है, वह उस बड़े इंसान से कहीं अधिक परिपक्व है जो अपने अहंकार में अंधा हो चुका है।
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