अच्छी शादी

मीरा ने अपनी एमबीए की डिग्री में पूरे कॉलेज में टॉप किया था। उसके आँखों में भविष्य को लेकर हज़ारों सपने तैर रहे थे। वह अक्सर अपने कमरे में बैठकर बड़े-बड़े कॉर्पोरेट ऑफिस, अपनी केबिन और अपनी पहली सैलरी से माता-पिता के लिए खरीदे जाने वाले तोहफों की कल्पना किया करती थी। उसने कई मल्टीनेशनल कंपनियों में अपना रेज़्यूमे भेज दिया था और इंटरव्यू के लिए दिन-रात तैयारी कर रही थी। लेकिन नियति और उसके पिता दीनानाथ जी के मन में कुछ और ही चल रहा था।

दीनानाथ जी एक पारंपरिक सोच वाले पिता थे, जिनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा लक्ष्य अपनी बेटी के हाथ पीले करना था। एक दिन अचानक उनके एक दूर के रिश्तेदार ने एक लड़के का प्रस्ताव ला खड़ा किया। लड़का, जिसका नाम समीर था, शहर के एक बहुत बड़े व्यापारी परिवार से ताल्लुक रखता था। अपना खुद का पुश्तैनी बिज़नेस, आलीशान घर, और सबसे बड़ी बात—लड़के वालों की तरफ से दहेज की कोई मांग नहीं थी। दीनानाथ जी को लगा जैसे उनके घर साक्षात भगवान उतर आए हों। उन्हें यह ‘अच्छा और सर्वगुण संपन्न’ लड़का इतना पसंद आया कि उन्होंने बिना एक पल गँवाए रिश्ता तय कर दिया।

जब मीरा को यह बात पता चली तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। उसने अपने पिता से नम आँखों से कहा, “पापा, मैंने अभी तो अपनी पढ़ाई पूरी की है। मुझे नौकरी करनी है, अपने पैरों पर खड़ा होना है। आप इतनी जल्दी मेरी शादी कैसे कर सकते हैं?”

दीनानाथ जी ने बड़े ही लाड़ से उसके सिर पर हाथ फेरा और समझाते हुए बोले, “बेटा, लड़कियों की असली मंज़िल तो उनका अपना घर ही होता है। समीर बहुत अच्छा लड़का है, और परिवार भी बहुत सुलझा हुआ है। ऐसा घर किस्मत वालों को मिलता है। नौकरी ही तो करनी है, शादी के बाद कर लेना। मैंने लड़के के पिता से बात की है, उन्हें तुम्हारी नौकरी से कोई ऐतराज़ नहीं होगा।”

मीरा अपने पिता की खुशी के आगे हार गई। उसने अपने सारे नोट्स, इंटरव्यू के कॉल लेटर और कॉर्पोरेट दुनिया के सपने एक पुरानी अटैची में बंद किए और लाल जोड़े में विदा होकर समीर के घर आ गई।

शुरुआती कुछ दिन किसी सुनहरे ख्वाब की तरह गुज़रे। समीर वाकई एक बहुत अच्छा और ख्याल रखने वाला इंसान था। उसकी सास, विमला देवी भी स्वभाव की मीठी थीं। घर में नौकर-चाकर, गाड़ियाँ, और हर तरह की सुख-सुविधा मौजूद थी। लेकिन जैसे-जैसे शादी की रस्में खत्म हुईं और ज़िंदगी अपनी आम पटरी पर लौटी, मीरा को उस ‘अच्छे घर’ की एक अलग ही सच्चाई नज़र आने लगी।

एक दिन सुबह नाश्ते की मेज़ पर मीरा ने अपनी सास से झिझकते हुए कहा, “माँ जी, अब तो घर में सब सेटल हो गया है। मैं सोच रही थी कि अब अपनी जॉब के लिए इंटरव्यू देना शुरू करूँ।”

यह सुनते ही विमला देवी के हाथ से चाय का प्याला छूटते-छूटते बचा। उन्होंने एक ठंडी मुस्कान के साथ कहा, “अरे बहू, हमारे घर की औरतों को बाहर जाकर धक्के खाने की क्या ज़रूरत है? भगवान का दिया सब कुछ है हमारे पास। समीर इतना कमाता है कि तुम्हारी हर ख्वाहिश पूरी कर सकता है। तुम बस घर सँभालो, किटी पार्टी में जाओ, शॉपिंग करो। तुम्हारे ससुर जी को बहुओं का बाहर काम करना बिल्कुल पसंद नहीं है।”

मीरा ने मदद की उम्मीद से समीर की तरफ देखा, लेकिन समीर उस वक्त फोन पर किसी क्लाइंट से बात करने में व्यस्त था और उसने इस बातचीत पर ध्यान ही नहीं दिया। मीरा चुप रह गई। दीनानाथ जी का वह आश्वासन कि ‘शादी के बाद नौकरी कर लेना’ अब एक कोरा झूठ लगने लगा था।

महीने बीतते गए। मीरा का जीवन सुबह की चाय, दोपहर के पकवानों, शाम की आरती और रात के इंतज़ाम में सिमट कर रह गया। उसके हाथ, जो कभी लैपटॉप के कीबोर्ड पर तेज़ी से चला करते थे, अब सिर्फ रोटियाँ बेलने और स्वेटर बुनने के काम आते थे। वह बाहर से बहुत खुशहाल दिखती थी—महंगी साड़ियाँ, सोने के गहने और एक भरा-पूरा परिवार। दीनानाथ जी जब भी अपनी बेटी से मिलने आते, तो उसका आलीशान घर देखकर उनका सीना गर्व से चौड़ा हो जाता। वे सोचते कि उन्होंने अपनी बेटी को दुनिया की सबसे अच्छी जगह ब्याह दिया है।

लेकिन मीरा अंदर ही अंदर घुट रही थी। उसे लगता था जैसे वह एक बहुत कीमती शोपीस बन गई है, जिसे ड्राइंग रूम में सजा कर रखा गया है, लेकिन जिसकी अपनी कोई आवाज़ नहीं है। उसकी एमबीए की डिग्री अटैची के किसी कोने में पड़ी दीमक का इंतज़ार कर रही थी।

एक दोपहर, जब घर में सब सो रहे थे, मीरा अलमारी साफ कर रही थी। अचानक उसी पुरानी अटैची से उसकी एक डायरी नीचे गिर गई। यह वही डायरी थी जिसमें उसने अपने भविष्य के लक्ष्य लिखे थे। उस पन्ने को देखते ही मीरा की आँखों से आँसुओं का सैलाब फूट पड़ा। वह ज़मीन पर बैठकर फूट-फूट कर रोने लगी। उसे अपने आप पर, अपने पिता के फैसले पर और अपनी इस खामोशी पर भयंकर क्रोध आ रहा था।

तभी दरवाज़ा खुला। समीर, जिसकी तबीयत कुछ नासाज़ थी, ऑफिस से जल्दी घर लौट आया था। उसने मीरा को इस कदर ज़मीन पर बैठकर रोते हुए देखा तो घबरा गया। वह दौड़कर उसके पास आया, “क्या हुआ मीरा? तुम रो क्यों रही हो? किसी ने कुछ कहा क्या?”

मीरा ने अपनी डायरी समीर के हाथों में रख दी और सुबकते हुए कहा, “किसी ने कुछ नहीं कहा समीर, और यही तो सबसे बड़ी समस्या है। मुझे इस घर में हर सुख मिला है, लेकिन मेरी पहचान खो गई है। मेरे पिता ने एक ‘अच्छे लड़के’ के हाथ में मेरा हाथ तो दे दिया, लेकिन मेरे सपनों का गला घोंट दिया। मैं एक पढ़ी-लिखी, महत्वाकांक्षी लड़की हूँ। मुझे किटी पार्टियों और गहनों का शौक नहीं है। मैं काम करना चाहती हूँ, अपनी काबिलियत साबित करना चाहती हूँ। लेकिन इस घर की इज्ज़त और तुम्हारे पैसों की चमक के नीचे मेरी डिग्री और मेरा अस्तित्व दोनों दफन हो गए हैं।”

समीर स्तब्ध रह गया। उसे पहली बार एहसास हुआ कि जिस सुख-सुविधा को वह अपनी पत्नी की खुशी समझ रहा था, वह दरअसल उसके लिए एक सोने का पिंजरा था। समीर वाकई वह ‘अच्छा लड़का’ था जो दीनानाथ जी ने देखा था, लेकिन उसे कभी मीरा के मन की इस घुटन का अंदाज़ा ही नहीं लगा क्योंकि मीरा ने कभी खुलकर अपनी बात नहीं रखी थी।

समीर ने मीरा के आँसू पोंछे और उसका हाथ कसकर पकड़ लिया। “मुझे माफ़ कर दो मीरा। मैं अपनी काम की उलझनों में तुम्हारी इस खामोश लड़ाई को समझ ही नहीं पाया। मैं तुम्हारे पिता की तरह वह गलती नहीं करूँगा जो तुम्हारी पहचान को तुमसे छीन ले। तुमने मुझसे शादी की है, अपनी आज़ादी और सपनों से तलाक नहीं लिया है।”

उसी रात खाने की मेज़ पर समीर ने अपने माता-पिता के सामने साफ शब्दों में कह दिया, “पापा, माँ, कल से मीरा जॉब इंटरव्यू के लिए जाएगी। वह एक होनहार लड़की है और मैं नहीं चाहता कि उसकी काबिलियत सिर्फ इस घर की चारदीवारी में सिमट कर रह जाए। हमारी इज़्ज़त हमारी बहू की तरक्की में है, उसे घर में बिठा कर रखने में नहीं।”

शुरुआत में थोड़ी नोकझोंक हुई, सास-ससुर को समाज का डर भी सताया, लेकिन समीर के मज़बूत इरादे और मीरा के आत्मविश्वास के आगे पुरानी सोच की दीवार ढह गई। कुछ ही हफ्तों में मीरा को एक बड़ी कंपनी में मैनेजर की पोस्ट मिल गई। जब मीरा अपनी पहली सैलरी लेकर घर आई और उसने अपने ससुर और सास के हाथ पर मिठाई का डिब्बा रखा, तो उनकी आँखों में भी अपनी बहू के लिए एक सच्चा सम्मान छलक उठा।

कुछ दिनों बाद जब दीनानाथ जी अपनी बेटी से मिलने आए, तो उन्होंने देखा कि मीरा सिर्फ महंगे गहनों से नहीं, बल्कि एक असीम आत्मविश्वास से चमक रही थी। उस दिन दीनानाथ जी को यह समझ में आ गया कि किसी भी पिता के लिए अपनी बेटी के लिए सिर्फ एक ‘खाता-पीता घर’ ढूंढना ही काफी नहीं होता, बल्कि एक ऐसा घर ढूंढना ज़रूरी है जहाँ उसके सपनों को उड़ान भरने के लिए खुला आसमान मिल सके।

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