कुछ रिश्ते दुनिया की हर दौलत से बढ़कर होते हैं

सुरेश का गला रुंध गया, उसके अंदर का बड़ा भाई चीख-चीख कर रोना चाहता था, लेकिन उसने अपने जज्बातों को चेहरे पर नहीं आने दिया। वह जानता था कि राघव बहुत खुद्दार है। अगर सुरेश ने पैसे दान या मदद के नाम पर दिए, तो राघव शायद अपनी जान दे देगा लेकिन पैसे नहीं लेगा। उसके स्वाभिमान को जिंदा रखना भी उतना ही जरूरी था, जितनी उसकी जान।

शाम का वक्त था और शहर के सबसे पॉश इलाके में बने सुरेश के आलीशान बंगले के बाहर बारिश की फुहारें गिर रही थीं। अंदर ड्रॉइंग रूम में मखमली सोफे पर सुरेश और उसकी पत्नी मीना चाय पी रहे थे। घर में एक अजीब सी शांति थी, जिसे बाहर की बारिश का शोर तोड़ रहा था। तभी दरवाजे पर एक कमजोर और बीमार सी परछाईं दिखाई दी। वह सुरेश का छोटा भाई, राघव था। राघव की हालत देखकर कोई भी बता सकता था कि वह किसी गंभीर बीमारी से जूझ रहा है। उसका चेहरा पीला पड़ चुका था, और आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे।

बचपन में एक ही थाली में खाने वाले इन दोनों भाइयों के बीच आज हैसियत और वक्त ने एक गहरी खाई खोद दी थी। सुरेश अपनी मेहनत और किस्मत के बल पर एक बड़ा बिजनेसमैन बन चुका था, जबकि राघव ने एक छोटी सी नौकरी चुनी थी और अपनी साधारण सी गृहस्थी में मगन था। दोनों के बीच कोई बड़ी दुश्मनी नहीं थी, लेकिन रहन-सहन और सोच के फर्क ने उन्हें एक-दूसरे से मीलों दूर कर दिया था।

राघव ने संकोच के साथ अंदर कदम रखा। उसके मैले और भीगे हुए जूतों से कीमती कालीन पर निशान बन रहे थे, जिसे देखकर मीना ने मुँह सिकोड़ लिया। सुरेश ने चाय का कप मेज पर रखते हुए थोड़ा हैरान होकर पूछा, “कहो राघव, कैसे आना हुआ? तुम्हारी तबीयत तो ठीक है? तुम काफी कमजोर लग रहे हो।”

राघव की आँखें भर आईं। वह पिछले कई महीनों से अपनी खराब किडनी का इलाज करवा रहा था और अब डॉक्टर ने जल्द से जल्द एक बड़े ऑपरेशन के लिए कहा था। उसकी सारी जमा-पूंजी खत्म हो चुकी थी, गहने बिक चुके थे और रिश्तेदारों से लिया गया कर्ज भी पहाड़ बन गया था। उसके पास अब कोई रास्ता नहीं बचा था।

कांपते होंठों से राघव ने अपनी मेडिकल फाइल मेज पर रख दी और नजरें झुकाकर बोला, “भैया मैं उधार में पैसा मांग रहा हूं। जैसे ही मैं ठीक हो जाऊंगा सारी कर्जों के साथ आपका भी कर्जा उतार दूंगा। मुझे बस पांच लाख रुपये की जरूरत है। अगर ये ऑपरेशन नहीं हुआ, तो मेरी पत्नी और बच्चों का क्या होगा, मुझे समझ नहीं आ रहा।”

कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। मीना ने सुरेश की तरफ एक तीखी नजर डाली, जैसे बिना कुछ बोले ही कह रही हो कि अगर आज पैसे दे दिए तो अब ये पैसे कभी वापस नहीं आएंगे। लेकिन सुरेश की नजरें राघव के उस झुके हुए सिर और उसके पीले चेहरे पर टिकी थीं। सुरेश के जेहन में अतीत का एक पन्ना खुल गया। उसे याद आ गया कि कैसे बचपन में जब उसे साइकिल से गिरकर चोट लगती थी, तो राघव रात-रात भर उसके पैर दबाता था और रोता था। आज वही राघव, जो कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाता था, अपने ही भाई से अपनी जिंदगी की भीख, वो भी उधार के रूप में मांग रहा था।

सुरेश का गला रुंध गया, उसके अंदर का बड़ा भाई चीख-चीख कर रोना चाहता था, लेकिन उसने अपने जज्बातों को चेहरे पर नहीं आने दिया। वह जानता था कि राघव बहुत खुद्दार है। अगर सुरेश ने पैसे दान या मदद के नाम पर दिए, तो राघव शायद अपनी जान दे देगा लेकिन पैसे नहीं लेगा। उसके स्वाभिमान को जिंदा रखना भी उतना ही जरूरी था, जितनी उसकी जान।

सुरेश ने चुपचाप अपनी चेकबुक निकाली और पांच लाख का चेक काटकर राघव की तरफ बढ़ा दिया। “यह लो। लेकिन याद रखना राघव, तुमने खुद कहा है कि तुम ये पैसे लौटाओगे। मैं कोई खैरात नहीं बांट रहा हूँ। मुझे मेरा एक-एक पैसा वापस चाहिए। इसलिए तुम्हें जल्दी से जल्दी ठीक होना होगा।” सुरेश ने अपनी आवाज को जानबूझकर बहुत सख्त और व्यापारिक रखा।

राघव ने कांपते हाथों से चेक लिया और उसकी आंखों से आंसुओं की धार बह निकली। उसने झुककर सुरेश के पैर छुए, चेक को अपनी छाती से लगाया और बिना कुछ कहे वहां से चला गया।

ऑपरेशन सफल रहा। राघव की जान बच गई। कुछ महीनों के आराम के बाद, राघव ने अपने वादे को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा मकसद बना लिया। सुबह की ड्यूटी खत्म करके वह शाम को एक छोटी सी दुकान पर हिसाब-किताब का पार्ट-टाइम काम भी करने लगा। उसकी पत्नी उसे रोकती, कहती कि अभी शरीर पूरी तरह से स्वस्थ नहीं है, लेकिन राघव का जवाब होता, “मेरे भाई ने मुझ पर जो एहसान किया है, उसका बोझ मेरी बीमारी से ज्यादा भारी है। मुझे वो कर्ज हर हाल में उतारना है।”

राघव ने अपनी जरूरतें कम कर दीं, दिन-रात एक कर दिया और पाई-पाई जोड़कर ठीक एक साल बाद पांच लाख रुपये इकट्ठा कर लिए। एक पुराने सूटकेस में पैसे लेकर वह दोबारा उसी आलीशान बंगले पर पहुंचा।

इस बार राघव के चेहरे पर बीमारी की पीलाहट नहीं, बल्कि अपने वादे को पूरा करने का सुकून और स्वाभिमान की चमक थी। उसने सुरेश के सामने वह सूटकेस खोलकर रख दिया। “भैया, यह आपका पैसा। पूरे पांच लाख हैं, आप गिन लीजिए। मैंने कहा था ना कि मैं आपका कर्जा उतार दूंगा। आज मैं अपना वादा निभाने आया हूं।”

सुरेश ने उस सूटकेस में रखी नोटों की गड्डियों को देखा और फिर राघव की आंखों में। अचानक सुरेश के चेहरे की वो सख्त परत टूट गई और उसकी आंखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। उसने सूटकेस को जोर से एक तरफ धकेल दिया, जिससे नोटों की गड्डियां जमीन पर बिखर गईं।

“क्या समझता है तू खुद को?” सुरेश चीख पड़ा। “तू मेरा कर्ज उतारेगा? अरे बेवकूफ, क्या खून के रिश्तों में कोई उधार होता है? जब तू उस दिन मेरे सामने खड़ा होकर अपनी जिंदगी की भीख मांग रहा था, तो मेरा सीना फट रहा था। मैंने वो चेक तुझे उधार के रूप में नहीं दिया था, मैंने वो इसलिए दिया था ताकि तेरी खुद्दारी को ठेस न पहुंचे और तू जीने की हिम्मत न हारे। एक बाप के बाद बड़ा भाई ही बाप होता है। और तू सच में ये रद्दी के कागज मुझे वापस करने आ गया?”

सुरेश आगे बढ़ा और उसने राघव को अपने गले से कसकर लगा लिया। शहर का सबसे बड़ा और सख्त बिजनेसमैन आज एक छोटे बच्चे की तरह फूट-फूट कर रो रहा था। “मेरा भाई मौत के मुँह से लौट आया, मेरे लिए यही मेरी सारी दौलत है। मुझे ये पैसे नहीं चाहिए राघव। मुझे मेरा वो बचपन वाला भाई चाहिए।”

राघव भी अपने बड़े भाई के कंधे पर सिर रखकर फूट-फूट कर रोने लगा। उसे आज समझ में आया कि उसका भाई बाहर से जितना सख्त था, अंदर से उतना ही मोम था। मीना, जो दरवाजे के पास खड़ी यह सब देख रही थी, उसकी भी आंखें नम हो गईं। उसे भी रिश्तों की असली कीमत समझ आ गई थी। पैसे तो कागज के टुकड़े हैं, लेकिन अपनों का साथ दुनिया की सबसे बड़ी दौलत है।

क्या आपको भी लगता है कि कुछ रिश्ते दुनिया की हर दौलत से बढ़कर होते हैं और परिवार का साथ ही इंसान की सबसे बड़ी ताकत है? जीवन के सबसे मुश्किल वक्त में क्या आपके किसी अपने ने भी ऐसा ही साथ दिया है? इस कहानी को लेकर आपके क्या विचार हैं, हमें कमेंट करके जरूर बताएं।

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