परिवार का साथ

“हम तो कहीं के नहीं रहे सुजाता! अब क्या होगा हमारा? कैसे जिएंगे हम? ये सफेद लिफाफा मेरी पच्चीस साल की वफादारी का इनाम है… उन्होंने कंपनी से निकाल दिया मुझे!” आनंद जी की आवाज़ गले में ही घुट कर रह गई। उनके आंसू अब रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। “अब कहाँ जाएंगे हम? अभी तो आर्यन की इंजीनियरिंग का आखिरी साल बचा है, उसकी लाखों की फीस कहाँ से आएगी? और नेहा… उसके ससुराल वालों को जो कार देने का वादा किया था, वो कैसे पूरा होगा? घर का लोन, गाड़ी की किश्तें… सब कैसे चुकाएंगे हम सुजाता!”

सुजाता के पैरों तले से मानो ज़मीन खिसक गई थी। नौकरी जाने का मतलब सिर्फ आमदनी रुकना नहीं था, बल्कि उस सुरक्षा चक्र का टूट जाना था जिसके भरोसे इस मध्यमवर्गीय परिवार ने अपने छोटे-छोटे सपने बुने थे। सुजाता का दिल भी खौफ से ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था, लेकिन उसने अपने चेहरे के भावों को तुरंत बदल लिया। कांपते हुए हाथों को अपनी साड़ी के पल्लू में छिपाकर, उसने अपने चेहरे पर एक बहुत ही झूठी लेकिन मजबूत मुस्कान ओढ़ ली।

उसने आगे बढ़कर आनंद जी के कांपते हुए कंधों पर हाथ रखा और बेहद शांत स्वर में बोली, “आप इतनी चिंता क्यों करते हैं? सब ठीक हो जाएगा। भगवान ने कोई न कोई रास्ता जरूर सोचा होगा हमारे लिए। आप बस खुद को संभालिए।” ऊपर से मुस्कुराते हुए सुजाता ने उन्हें ढांढस तो बंधा दिया, लेकिन आने वाले कल के भयानक भविष्य की आहट ने उसे अंदर तक डरा दिया था। जब नौकरी ही नहीं रहेगी, तो इतने सारे कर्ज़, बच्चों की पढ़ाई और समाज की उम्मीदों का बोझ कैसे उठाया जाएगा? हर महीने की शुरुआत में कटने वाली किश्तों का क्या होगा?

उस रात उस छोटे से बेडरूम में कोई नहीं सोया। आनंद जी छत को घूरते हुए मन ही मन हिसाब लगा रहे थे कि पीएफ और ग्रेच्युटी का जो थोड़ा बहुत पैसा मिलेगा, उससे कितने महीने घर चल पाएगा। सुजाता करवटें बदलती रही। उसे समझ नहीं आ रहा था कि कल सुबह जब सूरज निकलेगा, तो वह इस नए और भयानक सच का सामना कैसे करेगी।

अगली सुबह घर का माहौल बहुत भारी था। आनंद जी जो रोज़ सुबह सात बजे तैयार होकर ऑफिस के लिए निकल जाते थे, आज वो बालकोनी में एक पुरानी कुर्सी पर सिर झुकाए बैठे थे। सुजाता ने उन्हें चाय का प्याला थमाया और उनके पास ही ज़मीन पर बैठ गई। उसने अपने गले से अपनी सोने की चेन और हाथों की दो चूड़ियां उतार कर आनंद जी के हाथों में रख दीं।

आनंद जी ने चौंक कर पूछा, “ये क्या कर रही हो सुजाता?”

“ये गहने मैंने बुरे वक्त के लिए ही तो बनवाए थे। आप इन्हें बेच दीजिए। इससे आर्यन की इस सेमेस्टर की फीस भर जाएगी। और रही बात घर के खर्च की, तो आप भूल गए कि मैं शादी से पहले कितनी अच्छी सिलाई करती थी? मैं आज ही पड़ोस की महिलाओं से बात करूंगी। बुटीक का काम घर से ही शुरू कर दूंगी। कुछ पैसे वहाँ से आ जाएंगे। आप बस हार मत मानिए।” सुजाता की आँखों में एक अजीब सी चमक और हिम्मत थी, जिसे देखकर आनंद जी को अपने भीतर की कायरता पर शर्म आने लगी।

उसी वक्त दरवाजे पर आहट हुई। बाइस साल का आर्यन, जो शायद अपने माता-पिता की सारी बातें सुन चुका था, कमरे में दाखिल हुआ। उसकी आँखों में भी नमी थी, लेकिन चेहरे पर एक ऐसा आत्मविश्वास था जो आनंद जी ने पहले कभी नहीं देखा था।

आर्यन ने आगे बढ़कर अपनी माँ के हाथ से वो गहने वापस लिए और उन्हें सुजाता के गले में पहनाते हुए बोला, “माँ, जब तक आपका बेटा ज़िंदा है, आपको अपने सुहाग की निशानियां बेचने की ज़रूरत नहीं है।” उसने अपने पिता की ओर देखा और कहा, “पापा, आप हमेशा कहते थे न कि मैं बहुत लापरवाह हूँ। लेकिन आज मैं आपसे वादा करता हूँ कि मेरी पढ़ाई का बोझ अब आपके कंधों पर नहीं रहेगा। मैंने कल ही अपने कॉलेज के प्रोफेसर से बात की है, मुझे शाम की शिफ्ट में एक कोचिंग सेंटर में पढ़ाने का काम मिल गया है। मेरी फीस और मेरा खर्च अब मैं खुद उठाऊंगा।”

आनंद जी अपने बेटे को अवाक होकर देख रहे थे। जो लड़का कल तक नई बाइक के लिए ज़िद करता था, वो एक ही रात में इतना बड़ा कैसे हो गया?

तभी आनंद जी का फोन बजा। स्क्रीन पर ‘नेहा’ का नाम चमक रहा था। आनंद जी ने डरते हुए फोन उठाया। उन्हें लगा कि शायद ससुराल वालों ने कार के लिए फिर ताना मारा होगा। लेकिन फोन के दूसरी तरफ से नेहा की चहकती हुई आवाज़ आई, “पापा, कैसे हैं आप? मैंने कल रात आर्यन से बात की थी… उसने मुझे सब बता दिया।”

आनंद जी का दिल बैठ गया। “बेटा, तू चिंता मत कर, मैं कुछ न कुछ इंतज़ाम…”

“पापा, आप चुप रहिए!” नेहा ने उन्हें बीच में टोकते हुए कहा। “आप मुझे पराया समझते हैं क्या? मैंने अपने सास-ससुर और पति से सारी बात साफ-साफ कह दी है। उन्होंने कहा है कि उन्हें कोई कार नहीं चाहिए। बल्कि मेरे ससुर जी ने कहा है कि अगर आपको किसी भी तरह की आर्थिक मदद चाहिए, तो वो पीछे नहीं हटेंगे। और पापा, मैं भी अब घर पर खाली नहीं बैठूंगी, मैंने अपनी पुरानी कंपनी में दोबारा जॉइन करने के लिए ईमेल डाल दिया है। आप बिल्कुल अकेले नहीं हैं।”

फोन कटने के बाद आनंद जी फूट-फूट कर रोने लगे। लेकिन ये आंसू लाचारी के नहीं, बल्कि गर्व और सुकून के थे। उन्होंने सुजाता और आर्यन को गले से लगा लिया।

जिस सफेद लिफाफे ने कल रात आनंद जी की दुनिया उजाड़ दी थी, आज उसी छिन गई नौकरी ने उन्हें उनके जीवन की सबसे बड़ी दौलत से मिलवा दिया था। उन्हें एहसास हो गया कि इंसान की असली कमाई उसका बैंक बैलेंस या उसकी नौकरी नहीं होती, बल्कि वो परिवार होता है जो तूफानों में भी उसका हाथ नहीं छोड़ता।

धीरे-धीरे समय ने करवट ली। सुजाता की सिलाई का काम चल पड़ा, आर्यन ने ट्यूशन पढ़ाकर अपनी डिग्री पूरी की और एक अच्छी कंपनी में नौकरी पा ली। आनंद जी ने भी हार नहीं मानी और अपनी उम्र और अनुभव के हिसाब से एक छोटी फर्म में एकाउंटेंट की नौकरी शुरू कर दी। आज उनके पास पहले जैसी बड़ी तनख्वाह तो नहीं थी, लेकिन उनके घर में जो सुकून और एकता थी, वो किसी भी बड़ी नौकरी से कहीं बढ़कर थी।

दोस्तों, क्या आपको भी लगता है कि मुसीबत के समय परिवार का साथ दुनिया की सबसे बड़ी ताकत होता है? क्या आज के भौतिकवादी युग में ऐसे निस्वार्थ परिवार होते हैं? अपनी राय कमेंट करके जरूर बताएं।

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