रघुनाथ जी और गीता जी के घर में इन दिनों उल्लास और चिंता का मिला-जुला माहौल था। उनकी इकलौती और लाड़ली बेटी मीरा की शादी शहर के एक बहुत बड़े और प्रतिष्ठित कारोबारी परिवार में तय हुई थी। लड़के का नाम आकाश था, जो अपने पिता महेंद्र जी का कारोबार संभालता था। महेंद्र जी और उनकी पत्नी सावित्री जी जितने अमीर थे, उतने ही ज़मीन से जुड़े हुए इंसान भी थे। उन्होंने रिश्ते के वक्त ही कह दिया था कि उन्हें सिर्फ एक संस्कारी बेटी चाहिए, दहेज का एक तिनका भी नहीं।
रघुनाथ जी एक साधारण सरकारी कर्मचारी रहे थे, जो अब रिटायर हो चुके थे। उन्होंने अपनी जीवन भर की गाढ़ी कमाई मीरा की शादी के लिए जोड़ कर रखी थी। वे चाहते थे कि चाहे दहेज न देना पड़े, लेकिन शादी का आयोजन ऐसा हो कि ससुराल वालों के सामने उनका सिर ऊँचा रहे। उन्होंने शहर का सबसे अच्छा बैंक्विट हॉल बुक किया और तैयारियों में कोई कसर नहीं छोड़ी। शादी में मुश्किल से एक महीना बचा था कि अचानक नियति ने एक बहुत ही क्रूर परीक्षा ले ली।
रघुनाथ जी के छोटे भाई, जो उनके साथ ही रहते थे, उन्हें आधी रात को दिल का दौरा पड़ा। स्थिति इतनी गंभीर थी कि उन्हें तुरंत बड़े अस्पताल में भर्ती करना पड़ा और रातों-रात ओपन हार्ट सर्जरी करनी पड़ी। रघुनाथ जी के लिए उनका भाई उनके बेटे के समान था। उन्होंने बिना एक पल सोचे अपनी वह सारी जमा-पूंजी, जो उन्होंने मीरा की शादी के लिए रखी थी, अस्पताल के बिलों में लगा दी। भाई की जान तो बच गई, लेकिन रघुनाथ जी आर्थिक रूप से पूरी तरह टूट गए।
जब गीता जी को इस बात का अहसास हुआ कि अब उनके खाते में शादी के आयोजन के लिए नाममात्र के पैसे बचे हैं, तो वो रात भर फूट-फूट कर रोती रहीं। “अब क्या होगा जी? इतने बड़े लोग हैं, हमने उन्हें इतनी बड़ी-बड़ी बातें कह दी थीं। जब उन्हें पता चलेगा कि हम एक साधारण सा टेंट भी लगाने की स्थिति में नहीं हैं, तो वो क्या सोचेंगे? कहीं वो रिश्ता न तोड़ दें? हमारी मीरा का क्या होगा?”
रघुनाथ जी का सीना भी दर्द से फटा जा रहा था, लेकिन उन्होंने खुद को संभाला। अगले दिन सुबह-सुबह रघुनाथ जी ने फैसला किया कि वो खुद जाकर महेंद्र जी को सारी सच्चाई बताएंगे। चाहे जो भी हो, वो झूठ की बुनियाद पर अपनी बेटी का घर नहीं बसाना चाहते थे। गीता जी भी कांपते हुए दिल के साथ उनके साथ हो लीं।
जब वे महेंद्र जी के आलीशान बंगले पर पहुँचे, तो सावित्री जी और महेंद्र जी ने उनका बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया। उनके सामने तरह-तरह के नाश्ते और मेवे रखे गए, लेकिन रघुनाथ जी के गले से पानी का एक घूंट भी नीचे नहीं उतर रहा था।
“क्या बात है समधी जी? आप दोनों कुछ परेशान लग रहे हैं?” महेंद्र जी ने रघुनाथ जी के उड़े हुए चेहरे को देखकर पूछा।
रघुनाथ जी ने हाथ जोड़ लिए और उनकी आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। रुंधे हुए गले से उन्होंने अस्पताल वाली सारी बात कह डाली। “भाई साहब, मेरे पास अब शादी के खर्चे के लिए पैसे नहीं बचे हैं। मैं अपनी बेटी के लिए एक छोटा सा आयोजन भी नहीं कर पाऊंगा। मैं हाथ जोड़कर आपसे माफी मांगता हूँ। अगर आप इस हालत में हमारी बेटी को नहीं अपनाना चाहते, तो मैं…”
इससे पहले कि रघुनाथ जी अपना वाक्य पूरा करते, महेंद्र जी ने अपनी जगह से उठकर रघुनाथ जी के दोनों हाथ पकड़ लिए। उधर सावित्री जी तुरंत गीता जी के पास जाकर बैठ गईं और उन्हें गले से लगा लिया।
महेंद्र जी बेहद गंभीर लेकिन शांत स्वर में बोले, “रघुनाथ जी, जब हमने रिश्ता पक्का किया था, तब हम दो परिवार एक हुए थे। परिवार में किसी पर मुसीबत आए, तो क्या लोग एक-दूसरे का हाथ छोड़ देते हैं या साथ खड़े होते हैं? आपने अपने भाई की जान बचाकर यह साबित कर दिया है कि आप कितने महान इंसान हैं। और आप कह रहे हैं कि हम रिश्ता तोड़ देंगे?”
सावित्री जी ने गीता जी के आँसू पोंछते हुए कहा, “गीता बहन, हमने आपसे आपकी बेटी मांगी है, आपका बैंक बैलेंस नहीं। आप दोनों बिल्कुल चिंता मत कीजिए। शादी उसी तारीख को होगी और पूरे सम्मान के साथ होगी।”
महेंद्र जी ने उसी वक्त एक फैसला लिया। उन्होंने कहा, “हम यह शादी शहर के सबसे प्राचीन और भव्य मंदिर में करेंगे, जहाँ सिर्फ हमारे दोनों परिवारों के करीबी लोग होंगे। और रही बात समाज की, तो शादी की अगली शाम हम अपने खर्चे पर एक बड़ा रिसेप्शन रखेंगे और कार्ड पर हम दोनों परिवारों का नाम होगा, ‘सह-आयोजक’ के रूप में। किसी को कानो-कान खबर नहीं होगी कि खर्चा किसने किया है। आपकी इज्ज़त हमारी इज्ज़त है।”
रघुनाथ जी और गीता जी अवाक रह गए। उन्होंने समाज के हमेशा ताने सुने थे, लेकिन आज उनके सामने साक्षात् देवता बैठे थे।
शादी का दिन आया। मंदिर में बेहद सादगी और पवित्रता के साथ आकाश और मीरा के फेरे हुए। महेंद्र जी और सावित्री जी ने हर रस्म में रघुनाथ जी को आगे रखा। अगले दिन के रिसेप्शन में भी महेंद्र जी ने रघुनाथ जी को मुख्य दरवाज़े पर अपने साथ खड़ा किया, ताकि समाज में यह संदेश जाए कि यह आयोजन दोनों परिवारों का है। मीरा जब विदा होकर अपने ससुराल गई, तो उसे रत्ती भर भी यह महसूस नहीं होने दिया गया कि उसके पिता एक बड़े आर्थिक संकट से गुज़रे हैं।
शादी के दस दिन बाद पगफेरे की रस्म के लिए जब आकाश और मीरा घर आए, तो उनके साथ सावित्री जी और महेंद्र जी भी आए। वे अपने साथ ढेरों फल, मिठाइयां और कुछ लिफाफे लेकर आए थे।
चाय पीते हुए सावित्री जी ने एक मोटा लिफाफा गीता जी के हाथ में रखा। “गीता बहन, यह कोई शगुन या खैरात नहीं है। यह मेरे भाई के इलाज के लिए है। मैंने सुना है कि अभी उनकी दवाइयों का खर्च काफी है। अब हम एक परिवार हैं, तो इस पर हमारा भी हक बनता है।”
गीता जी के हाथ कांप गए। उन्होंने लिफाफा वापस करना चाहा, लेकिन सावित्री जी ने उनके हाथ को अपने हाथों में कसकर पकड़ लिया। उनके इस अपनेपन ने गीता जी के भीतर जमे हुए सारे डर और संकोच को पिघला दिया।
“ठीक है बहन जी, पर हम लोग सचमुच आप लोगों जैसे समधी-समधन पाकर तो निहाल हो गए।” गीता जी आँखों में आँसू भरकर बोलीं।
सावित्री जी मुस्कुराईं और बोलीं, “निहाल तो हम हुए हैं गीता जी, जिन्हें मीरा जैसी बेटी मिली है, जिसने आते ही हमारे घर को मंदिर बना दिया है। रिश्ते पैसों से नहीं, संस्कारों और एक-दूसरे के सम्मान से चलते हैं।”
उस दिन रघुनाथ जी के छोटे से घर के आँगन में जो सुकून था, वह दुनिया के किसी भी महल की दौलत से कहीं बढ़कर था।
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