रिश्तों की जमा पूँजी – सुनीता सोलंकी ‘मीना’

ब्रह्मसिंह की बैंक की पासबुक में छपी आखिरी एंट्री  — ₹2,847/-  थी । ब्रह्मसिंह  जी ने चश्मा उतारकर मेज़ पर रखा। 72 साल की उम्र में बैंक बैलेंस से ज़्यादा ज़रूरी था उनके जीवन में  ‘लोगों का बैलेंस’। पर आज उसे वही खाली लग रहा था। 

पेंशन से ही उसका घर चलता था, दवाइयाँ निकल जाती थीं।बस यूँ समझो गुजारा हो रहा था। उसका बेटा प्रशान्त पूना में सॉफ्टवेयर इंजीनियर है तीन साल से , मगर एक बार भी घर नहीं आ पाया । वीडियो कॉल पर बस इतना — “पापा, प्रोजेक्ट डेडलाइन है। अगले महीने पक्का पापा ।” हर महीना ‘अगला’ महीना  होकर गुज़र जाता।

पत्नी गायत्री के जाने के बाद घर की दीवारें भी चुप हो गई हों जैसे । सुबह अख़बार, शाम को पौधो में पानी, रात को छत पर ठहलते तारों से बातें। बस यही जमा-पूँजी बची थी।

एक दिन नीचे वाले वर्मा जी की पोती ने दस्तक दी! 

“दादाजी, नमस्ते। मैं अन्नू। 

आठ साल की बच्ची, दो चोटी, हाथ में गुलाबी बस्ता।  

“दादाजी, मम्मी ने कहा है, आप अकेले रहते हो। मैं शाम को होमवर्क करने आ जाऊँ?

ब्रह्मसिंह जी हँस दिए। “बेटा, मेरे पास तो AC नहीं है, गर्मी लगेगी रानी बिटिया को ।”  

“तो क्या हुआ दादाजी, आपसे  कहानियाँ  सुनूँगी । नानी कहती है, पुराने लोगों के पास कहानी का खज़ाना होता है।”

ब्रह्म सिंह की शायद  वो पहली किश्त थी रिश्तों की जमा-पूँजी में।

अगले दिन अन्नू   के साथ उसका भाई नीटू व तीन बच्चे और  आए। देखते-देखते शाम 4 से 6 का ‘दादाजी वाला स्कूल’ शुरू हो गया। न फीस, न हाज़िरी। बस एक शर्त — आने वाला हर बच्चा एक नया शब्द सीखकर जाएगा।

“दादाजी, ‘जमा-पूँजी’ माने क्या होता है?” अन्नू ने पूछा।  

“बेटा, जो बैंक में रखो वो पैसा, जो दिल में रखो वो रिश्ता। पैसा घटता है खर्च करने से, रिश्ता बढ़ता है बाँटने से।”

बच्चों ने ये बात अपने घर जाकर दोहराई। जब रविवार आया तो  वर्मा जी खुद चाय लेकर ऊपर आ गए।  

“भाईसाहब, सुना है आप बच्चों को मुफ्त में पढ़ाते हैं। मैं भी हिसाब में कच्चा हूँ भाईसाहब , मुझे भी बिठा लो।”  

 ब्रह्मसिंह जी चौंके, मुस्कुराए । 55 साल के वर्मा जी, जो बैंक मैनेजर पद से रिटायर हुए थे, बेंच पर बैठकर पहाड़ा दोहरा रहे थे — “दो एकम दो…”

धीरे-धीरे ये बैठक ‘रिश्तों का बैंक’ बन गई। किसी को दवा लानी हो, किसी को राशन। ब्रह्मसिंह जी के पास पैसा कम था, पर समय ही समय था, अनुभव था,  कान  थे सुनने वाले।

एक शाम प्रशान्त का फोन आया। आवाज़ में थकान थी।  

“पापा, प्रमोशन हो गया। पैकेज डबल। पर नींद नहीं आती। फ्लैट बड़ा है, पर खाली-खाली लगता है पापा ।”  

ब्रह्म सिंह जी ने कहा — “बेटा, पैकेज बढ़ा, पर ‘पीपल-ऐज’ घट गया। ज़िंदगी में बैलेंस शीट दो होती हैं — एक बैंक की, एक दिल की। बैंक वाली तो तू भर रहा है, दिल वाली कब भरेगा?”

प्रशान्त चुप रह गया।

दो महीने बाद पूना से एक ट्रक आया। जिसमें प्रशान्त का सामान था और प्रशान्त दर पर खड़ा देख, ब्रह्मसिंह दंग रह गये , खुशी के आंसू छलक आए, गले लगाकर बेटे को आशीर्वाद दिया।

 प्रशान्त के हाथ में इस्तीफ़ा और आँख में पानी।  “पापा, मैंने नौकरी छोड़ दी। यहाँ पास वाले शहर में छोटी कंपनी जॉइन की है। पैसा आधा, पर सुकून डबल। अब रोज़ शाम को आपके ‘रिश्तों के बैंक’ में आऊँगा। अकाउंट खुलवाना है पापा ।ब्रह्म सिंह ने बेटे को गले लगाया। 

अन्नू  ताली बजाने लगी — “दादाजी, एक और  नया एडमिशन!”

आज ‘रिश्तों का बैंक’ में 40 खातेदार हैं। कोई ब्याज़ नहीं माँगता, कोई FD नहीं तुड़वाता। बस हर शाम 6 बजे एक घंटी बजती है — “दादाजी, कहानी सुनाइए ना …ब्रह्मसिंह की पासबुक में अब भी ₹2,847/- दिखाती है।  पर उनके रजिस्टर में दर्ज है — 1. अन्नू — रोज़ की मुस्कान जमा/ 2. वर्मा जी — वक्त पर चाय जमा/ 3. प्रशान्त —तीन साल बाद वापसी जमा/ 4. मुहल्ला — भरोसा जमा।  

 ब्रह्म सिंह के डॉक्टर  ने कहा  — “बाबूजी, BP कैसे कंट्रोल में ?”  

हँसकर कहते हैं — “डॉक्टर साहब, दवा से ज़्यादा असर दुआ में है। और दुआ जमा करने का कोई ATM नहीं होता, बस दिल का लॉकर चाहिए।”

रात को जब वो छत पर जाते हैं, तो अब  तारे नहीं गिनते । अब गिनते हैं कि — आज कितने लोगों ने ‘दादाजी’ कहा।  

जितनी बार ‘दादाजी’ सुना ,  उतना जमा का खाता  बढ़ा

यही है असली जमा-पूँजी।  

लोग नोट गिनते हैं, रिश्ते वाले अपनो को गिनते हैं।  

नोट खत्म हो सकते हैं,’अपने’ संग हों तो ज़िंदगी खत्म होने से पहले जीना आ जाता है।

सुनीता सोलंकी ‘मीना’  ✍️

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