*भाई, मैं तेरी तरह स्वार्थी नहीं हूं* – तोषिका

“आज क्या बनाया है खाने में आपने मां?” पीछे से गले लगकर तारा ने अपनी मां सुषमा से पूछा।” तेरी मनपसंद कड़ी बनाई है, जल्दी से हाथ मुंह धो ले, मैं खाना गरम कर देती हू।”

उधर तारा हाथ मुंह धो कर आई और खाना खाने बैठी और सुषमा से पूछा कि “मां, ये भाई और भाभी कहा गए है?” रसोई से खाने की थाली लाते हुए सुषमा बोली “तेरे लिए हॉस्टल देखने गए है।”

“हॉस्टल क्यों मां?” तारा ने झटके से पूछा।

“ताकि तुझे रोज़ कॉलेज से आने जाने में थकान ना हो, इसीलिए और किस वजह से होगा।” सुषमा, तारा को खाना खिलाते हुए बोली।

“मां आपको मैं घर पर अच्छी नहीं लग रही थी क्या?”तारा ने बेमन से पूछा।

तारा के चेहरे पर हाथ फेरते हुए उसकी मां ने कहा “मन करता है, पर मुझसे तेरी ये थकान देखी नहीं जाती, इसीलिए मैने तेरे भैया भाभी को सहमति दे दी।”

कुछ हफ्तों में तारा हॉस्टल शिफ्ट हो गई। शुरू शुरू में सब बढ़िया रहा। जब भी वो घर आती थी, उसको सब वैसे ही मिलता था जैसे वो छोड़ कर गई थी। चाहे वो उसके रिश्ते हो या फिर सामान, पर उसको ये नहीं पता था कि उस घर में अंदर ही अंदर कुछ हो रहा है, जिसकी खबर उसको कानों कान नहीं थी।

अब सुषमा ज्यादा नहीं बात करती थी, जो भी था उनकी बहु ही देखती थी।

एक दिन तारा घर पर आई तो देखा ताला लगा हुआ है, उसने अपने भाई को कॉल किया और पूछा “भाई आप लोग कहा हो? मैं घर आई थी आप लोगों से मिलने।”

उसका भाई फोन की दूसरी तरफ से बोला “अरे तारा, पहले बताती हम बाहर आए है थोड़ा काम था।”

उसका भाई फोन काटने वाला था कि तारा ने तुरंत बोला “भाई…भाई, मां भी आपके साथ है?”

तारा के भाई को कुछ समझ नहीं आया और फिर हड़बड़ाहट में बोला “नहीं, वो वीनू मौसी के घर गई है।”

इससे पहले तारा और कुछ पूछे, उसने फोन रख दिया।

तारा पहले तो जाने लगी थी फिर उसको घर से कुछ गिरने की आवाज़ आई, वो तुरंत चौंकी और उसने ताला तोड़ा और अंदर जाकर देखा तो कमरे के बाथरूम से आवाज आ रही थी। उसने देखा दरवाजा अंदर की जगह बाहर से बंद है, उसने दरवाजा खोला तो देखा उसकी मां, कोने में भीगी हुई बैठी हुई है।

तारा का दिल एकदम से थम गया उसने एक दम से बोला “मां, मां उठो आप यहां कैसे? पहले बाहर आओ।”

उसने अपनी मां को तौलिए से पोछा फिर उनको गरम पानी दिया।

जब सुषमा जी की सास में सास आई तब उन्होंने बस इतना बोला “बेटा, मुझे बचा ले। मुझसे और नहीं सहा जाएगा।”

इतना सुनते ही तारा की आँखें भर आई और वो सब कहानी समझ गई कि उसको क्यों हॉस्टल भेजा गया और उसके भाई भाभी क्या करना चाहते थे।

कुछ समय बाद दोनों घर पर आए, उन्होंने देखा कि ताला टूटा हुआ हुआ है, वो जल्दी जल्दी अंदर गए तो उन्होंने तारा और सुषमा को सोफे पर देखा। इस से पहले तारा का भाई अपने पक्ष में कुछ बोले तारा एक दम से बोल पड़ी “मुझे आपसे ये उम्मीद नहीं थी भाई, आप मेरी नजरों में पूरी तरह गिर चुके है।”

उसका भाई बोला “तू गलत समझ रही है, मैं तुझे सब बताता हू।”

लेकिन तारा ने एक भी नहीं सुनी और बोली “मुझे कुछ नहीं सुनना है, मुझे सब समझ आ गया है, आपने मुझे हॉस्टल क्यों भेजा, ताकि आप मां के साथ ऐसा कर सको। भाभी ने ही कहा होगा कि तुम घर अपने नाम करवा लो , कही मां सब मेरे नाम ना करदे। हैना? यही बात है ना।”

तारा का भाई बोलने ही वाला था कि तारा ने एक दम से बोला “*भाई, मैं तेरी तरह स्वार्थी नहीं हूं*” मुझे कुछ नहीं चाहिए और इस घर से मां नहीं आप लोग जाएंगे।

उधर तभी दरवाजे पर पुलिस आई और तारा ने बोला “इंस्पेक्टर, आप इन दोनों को ले जाइए। इन्होंने मेरी मां की ये हालत कर दी है।”

इंस्पेक्टर बोले “पूछ ताछ के लिए आपको थाने आना होगा।”

तारा बोली “जी, आपको जब भी बुलाना हो आप बुला सकते है, आप बस इन दोनों को मेरी नजरों के आगे से ले जाए।”

सुषमा ने तारा को गले लगा लिया और बोली “मैने कभी नहीं सोचा था मेरा खून ऐसा निकलेगा, मैने दोनों को ही एक जैसे संस्कार दिए थे।”

तारा बोली “मां अब जो होना था, हो गया। अब नए सिरे से सब कुछ हम दुबारा शुरू करेंगे।”

*कुछ सालों बाद*

तारा एक अच्छी कंपनी के जॉब कर रही थी, अपनी मां का भी ध्यान रख रही थी और एक बेटी की पूरी जिम्मेदारी निभा रही थी।

लेखिका

तोषिका

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