“तुम्हें बस अपनी माँ की फिक्र है! उन्होंने सुबह दलिया खाया या नहीं, उनकी बीपी की गोली खत्म तो नहीं हो गई, उनके घुटनों का दर्द कैसा है… बस यही सब चलता रहता है तुम्हारे दिमाग में! मेरी तो रत्ती भर भी चिंता नहीं है तुम्हें। मैं सुबह से भूखी-प्यासी ऑफिस के काम में उलझी हुई थी, सिर दर्द से फटने को हो रहा है, पर तुमने एक बार भी मुड़कर नहीं पूछा कि मैंने कुछ खाया या नहीं! अगर सारी फिक्र और चिंताएं अपनी माँ की ही करनी थीं, तो मुझसे शादी क्यों की? मेरी जिंदगी क्यों बर्बाद की?”
दीपा की आवाज़ बेडरूम की खामोशी को चीरते हुए बहुत दूर तक गूँज गई थी। उसके चेहरे पर थकान, हताशा और एक अनजानी सी जलन साफ़ झलक रही थी। सामने उसका पति, अभिनव, चुपचाप खड़ा था। उसके हाथ में पानी का गिलास था जो वह अपनी माँ के कमरे से वापस आते हुए दीपा के लिए लाया था, लेकिन दीपा का यह ज्वालामुखी फटने के बाद उसके कदम वहीं ठिठक गए थे।
अभिनव एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता था और दीपा भी एक बैंक में ऊंचे पद पर थी। दोनों की ज़िंदगी बहुत अच्छी चल रही थी, लेकिन तीन महीने पहले अभिनव के पिता का देहांत हो गया। इसके बाद अभिनव अपनी अकेली और बीमार माँ, कौशल्या जी को गाँव से अपने पास शहर ले आया। कौशल्या जी की उम्र सत्तर के पार थी और उन्हें कई शारीरिक दिक्कतें थीं। अभिनव अपनी माँ से बहुत जुड़ा हुआ था, इसलिए ऑफिस से आते ही वह सबसे पहले उनके कमरे में जाता, उनकी दवाइयों का हिसाब रखता और उनके साथ वक़्त बिताता।
दीपा दिल की बुरी नहीं थी। उसने भी शुरुआत में अपनी सास का बहुत ख्याल रखा, लेकिन ऑफिस के बढ़ते दबाव और घर की ज़िम्मेदारियों के बीच वह खुद को बहुत थका हुआ और उपेक्षित महसूस करने लगी थी। उसे लगने लगा था कि अभिनव के जीवन में अब सिर्फ उसकी माँ रह गई है। आज भी जब दीपा ऑफिस से बुरी तरह थककर और तेज़ सिरदर्द के साथ लौटी, तो उसने देखा कि अभिनव सीधा अपनी माँ के कमरे में चला गया और पंद्रह मिनट तक बाहर नहीं आया। यही बात दीपा के बर्दाश्त से बाहर हो गई और उसका गुस्सा फूट पड़ा।
दीपा की कड़वी बातें सुनकर अभिनव ने पानी का गिलास मेज़ पर रखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी पीड़ा थी। उसने धीमी लेकिन भारी आवाज़ में कहा, “दीपा, मैं जानता हूँ तुम थक गई हो। लेकिन माँ अभी-अभी अपने जीवनसाथी को खो चुकी हैं। वो अंदर से टूट गई हैं। उन्हें अभी मेरे सहारे की ज़रूरत है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि मैं तुम्हारी परवाह नहीं करता।” इतना कहकर अभिनव चुपचाप कमरे से बाहर बालकनी में चला गया। दीपा अपने बिस्तर पर गिरकर सुबकती रही। उसे अपने कहे शब्दों पर हल्का सा पछतावा तो हो रहा था, लेकिन उसका अहंकार उसे झुकने नहीं दे रहा था।
अगले दिन सुबह घर का माहौल बहुत सर्द था। अभिनव बिना नाश्ता किए ऑफिस चला गया। दीपा का उस दिन ‘वर्क फ्रॉम होम’ था। दोपहर होते-होते दीपा की तबीयत सच में बहुत खराब हो गई। उसे तेज़ बुखार चढ़ गया और शरीर दर्द से टूटने लगा। उसने अभिनव को फोन किया, लेकिन उसका फोन आउट ऑफ कवरेज आ रहा था। दीपा के सिर में इतनी तेज़ पीड़ा थी कि उससे बिस्तर से उठकर पानी की एक बोतल लेना भी भारी पड़ रहा था। वह दर्द से कराह रही थी और अपनी इस लाचारी पर उसे रोना आ रहा था।
तभी उसके कमरे का दरवाज़ा हल्के से खुला। सामने कौशल्या जी खड़ी थीं। उनके खुद के घुटनों में इतना दर्द रहता था कि वे बिना लाठी के चल नहीं पाती थीं। लेकिन आज उनके एक हाथ में लाठी थी और दूसरे कांपते हुए हाथ में एक ट्रे थी, जिसमें गरमागरम चाय, कुछ बिस्कुट और बुखार की गोली रखी थी।
दीपा उन्हें देखकर हैरान रह गई। कौशल्या जी धीरे-धीरे चलकर उसके बिस्तर के पास आईं और ट्रे को साइड टेबल पर रख दिया। उन्होंने अपने खुरदरे लेकिन गर्म हाथों को दीपा के तपते हुए माथे पर रखा। उनके स्पर्श में एक अजीब सा जादू था, बिल्कुल वैसा ही जैसा दीपा को बचपन में अपनी माँ के हाथों में महसूस होता था।
“तू सुबह से कमरे से बाहर नहीं आई बहू, तो मुझे फिक्र हुई। देखा तो तू बुखार में तप रही है,” कौशल्या जी ने बहुत ही ममता भरे स्वर में कहा। उन्होंने दीपा को सहारा देकर उठाया, उसे अपने हाथों से चाय पिलाई और दवा दी।
दीपा की आँखें शर्म और कृतज्ञता से भर आईं। उसे याद आया कि कल रात उसने इसी माँ के लिए कितनी कड़वी बातें कही थीं। कौशल्या जी वहीं दीपा के सिरहाने बैठ गईं और उसके सिर को हल्के-हल्के दबाने लगीं। कुछ ही देर में दीपा को एक गहरी नींद आ गई।
शाम को जब दीपा की आँख खुली, तो उसका बुखार उतर चुका था। उसने देखा कि कौशल्या जी अभी भी वहीं पास की कुर्सी पर बैठी हैं और फोन पर किसी से बात कर रही हैं। यह अभिनव का फोन था।
कौशल्या जी बहुत सख्त लहज़े में अभिनव को डांट रही थीं, “तू कैसा पति है रे? तेरी पत्नी घर में बुखार से तप रही है और तुझे खबर तक नहीं? मैंने तुझे हमेशा यही सिखाया है कि जो लड़की अपना पूरा घर-बार छोड़कर तेरे भरोसे इस घर में आई है, उसकी ज़िम्मेदारी सबसे बड़ी है। तू मेरी फिक्र में इतना अंधा कैसे हो गया कि अपनी पत्नी का चेहरा पढ़ना भूल गया? जल्दी घर आ और रास्ते से इसके लिए ताज़े फल लेता आना। और सुन, आज रात का खाना तू खुद बनाएगा, मेरी बहू को पूरा आराम चाहिए।”
फोन कटने के बाद कमरे में एक भारी खामोशी छा गई। दीपा के गालों पर आंसुओं की धारा बह निकली। वह हमेशा अभिनव के प्यार को बाँटने वाली चीज़ समझती रही, जबकि प्यार तो वह रौशनी है जो जितने लोगों में बंटती है, उतनी ही तेज़ होती है। जिस सास को वह अपना प्रतिद्वंद्वी मान बैठी थी, आज वही सास एक ढाल बनकर अपने ही बेटे से उसके हक़ के लिए लड़ रही थी।
दीपा उठी और सीधे अपनी सास के पैरों में गिर पड़ी। “मुझे माफ कर दीजिए माँ जी। मैं बहुत स्वार्थी हो गई थी। मैंने कल रात…” दीपा फूट-फूट कर रो रही थी।
कौशल्या जी ने उसे उठाया और अपने सीने से लगा लिया। “अरे पगली, इसमें माफी कैसी? काम की थकान और इस उम्र में ऐसा गुस्सा आ जाना कोई बड़ी बात नहीं है। पर याद रख बेटा, एक आदमी जब एक अच्छा बेटा बनता है, तभी वो एक अच्छा पति भी बन सकता है। जो अपनी माँ का नहीं हुआ, वो अपनी पत्नी का क्या होगा?”
तभी दरवाज़े पर अभिनव आ खड़ा हुआ। उसके हाथों में फलों की टोकरी थी और आँखों में एक सुकून। उसने देखा कि उसकी ज़िंदगी की दो सबसे अहम औरतें एक-दूसरे के गले लगी हुई हैं। उस दिन के बाद से दीपा ने कभी यह शिकायत नहीं की कि अभिनव सिर्फ अपनी माँ की फिक्र करता है, क्योंकि अब घर में कौशल्या जी की फिक्र करने के लिए अभिनव से पहले दीपा खड़ी होती थी।
क्या आपको भी लगता है कि अक्सर काम की थकान और छोटी-छोटी गलतफहमियां हमारे प्यारे रिश्तों में दरार डाल देती हैं? क्या आपने भी कभी दीपा जैसी उलझन महसूस की है? अपने विचार ज़रूर साझा करें।
अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद