कॉलेज की कैंटीन के उस शांत कोने में आज एक अजीब सी बेचैनी थी। मेज के दोनों तरफ बैठे शिवानी और विकास के बीच पिछले दस मिनट से कोई बात नहीं हुई थी। शिवानी की आँखें सूजी हुई थीं और वह लगातार अपने दुपट्टे के छोर को उंगलियों में लपेट रही थी। विकास ने गहरी सांस लेते हुए खामोशी तोड़ी, “मुझे लगा तुम अच्छी तरह जानती हो कि मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता। फिर तुम अपने घर पर साफ-साफ क्यों नहीं कह देतीं?”
शिवानी की आँखों से आँसू छलक पड़े। वह रोंआसी होकर बोली, “मैं तो तुम्हारे अलावा किसी और से शादी के बारे में सोच भी नहीं सकती विकास। मैंने कल रात माँ को सब कुछ बताया था। मैंने कहा कि हम दोनों एक-दूसरे को समझते हैं, लेकिन उन्होंने मेरी एक नहीं सुनी। पापा तो बस अपनी जिद पर अड़े हैं कि वे अपनी पसंद के घर में ही मेरी शादी करेंगे। अब तुम ही बताओ मैं क्या करूँ?”
विकास के चेहरे पर झुंझलाहट साफ नजर आ रही थी। उसने कुछ पल सोचा और फिर शिवानी का हाथ पकड़कर कहा, “अगर वे नहीं मान रहे हैं, तो हमारे पास अब एक ही रास्ता बचा है। हम दोनों भाग कर शादी कर लेते हैं। कल रात की ट्रेन से हम शहर छोड़ देंगे। जब शादी हो जाएगी, तो कुछ दिन बाद वे लोग खुद ही मान जाएंगे।”
‘भाग कर शादी कर लेते हैं…’ यह वाक्य शिवानी के कानों में किसी धमाके की तरह गूंजा। उसने झटके से अपना हाथ विकास की पकड़ से छुड़ा लिया। उसकी आँखों में आंसू थे, लेकिन उनमें अब बेवसी की जगह एक हैरानी ने ले ली थी।
“तुम ये क्या कह रहे हो विकास?” शिवानी की आवाज कांप रही थी। “तुम चाहते हो कि मैं अपने पापा की इज्जत, उनकी पगड़ी को सड़क पर उछाल कर तुम्हारे साथ भाग जाऊं? जिस पिता ने मुझे उंगली पकड़कर चलना सिखाया, मेरे हर सपने को पूरा करने के लिए दिन-रात एक कर दिया, उन्हें मैं समाज में मुंह दिखाने लायक न छोड़ूं?”
विकास ने उसे समझाते हुए कहा, “प्यार में ये सब सोचना पड़ता है शिवानी। अगर आज हमने हिम्मत नहीं दिखाई, तो कल तुम्हें किसी अजनबी के साथ सात फेरे लेने पड़ेंगे। क्या तुम उस अजनबी के साथ खुश रह पाओगी? समाज तो चार दिन बातें करेगा, फिर सब भूल जाएंगे। हमें अपने भविष्य के बारे में सोचना होगा।”
शिवानी बिना कुछ कहे वहां से उठ गई। उसका दिल भारी था। घर लौटते समय रास्ते भर उसके कानों में विकास की बातें और दूसरी तरफ अपने पिता का प्यार गूंजता रहा। घर पहुंची तो देखा कि उसके पिता, जिन्हें मोहल्ले में सब आदर से मास्टर जी कहते थे, अपनी पुरानी चप्पलें पहने हुए किसी रिश्तेदार से फोन पर बात कर रहे थे। शिवानी को देखते ही उन्होंने फोन रखा और मुस्कुराते हुए बोले, “आ गई मेरी बच्ची? देख, आज शर्मा जी आए थे, उन्होंने अपने भतीजे का रिश्ता भेजा है। लड़का बैंक में है। मुझे पूरा विश्वास है कि मेरी बेटी वहां राज करेगी।”
पिता की आँखों में अपनी बेटी के लिए देखे गए सपनों की चमक थी और उनकी झुर्रियों में एक पिता का अथाह प्रेम। शिवानी अपने कमरे में गई और फूट-फूट कर रोई। एक तरफ उसका प्यार था, और दूसरी तरफ उसके माता-पिता का विश्वास। रात भर वह इसी कशमकश में रही कि वह अपने स्वार्थ के लिए उस घर को कैसे नीलाम कर दे जिसने उसे जीवन दिया है।
अगले दिन शाम को विकास रेलवे स्टेशन के बाहर शिवानी का बेसब्री से इंतजार कर रहा था। उसके हाथ में दो टिकट थे और मन में एक डर और उत्साह का मिला-जुला भाव। तभी उसने शिवानी को अपनी ओर आते देखा। लेकिन शिवानी के हाथों में कोई बैग नहीं था। वह बिल्कुल साधारण कपड़ों में थी।
विकास ने घबराकर पूछा, “तुम्हारा सामान कहां है शिवानी? ट्रेन आने में सिर्फ बीस मिनट बाकी हैं।”
शिवानी ने विकास की आँखों में गहराई से देखा और बेहद शांत लेकिन दृढ़ आवाज में कहा, “मैं तुम्हारे साथ नहीं जा रही विकास। मैं भागकर शादी नहीं करूंगी।”
विकास हक्का-बक्का रह गया। “इसका मतलब तुम मुझसे प्यार नहीं करती? तुम अपने परिवार के लिए मुझे छोड़ रही हो?”
शिवानी की आँखों से एक आंसू ढुलक कर उसके गाल पर आ गिरा, लेकिन उसने अपनी आवाज को मजबूत बनाए रखा। “मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ विकास, लेकिन मेरा प्यार इतना कमजोर नहीं है कि उसे छुपकर भागना पड़े। जिस रिश्ते की नींव मेरे माता-पिता के आंसुओं और उनके अपमान पर रखी जाए, वो रिश्ता कभी खुशहाल नहीं हो सकता। अगर तुम्हारा प्यार सच्चा है, अगर तुम्हें लगता है कि तुम मुझे जिंदगी भर खुश रख सकते हो, तो तुम्हें मेरे पिता के सामने जाकर मेरा हाथ मांगना होगा।”
विकास ने तिलमिलाकर कहा, “तुम जानती हो वो मुझे धक्के मारकर बाहर निकाल देंगे!”
“तो तुम वो धक्के खाओगे,” शिवानी ने कहा। “तुम एक बार नहीं, दस बार जाओगे। तुम उन्हें यकीन दिलाओगे कि तुम मेरी जिम्मेदारी उठा सकते हो। अगर राम ने सीता को पाने के लिए शिव का धनुष तोड़ा था, तो तुम्हें भी मेरे परिवार के गुस्से और उनके डर का धनुष तोड़ना होगा। लेकिन मैं चोरी-छिपे तुम्हारे साथ नहीं जाऊंगी। जो प्यार मर्यादा भूल जाए, वो प्यार नहीं, सिर्फ एक जिद है।”
शिवानी मुड़ी और वापस अपने घर की ओर चल दी। विकास स्टेशन पर अकेला खड़ा रह गया। शिवानी के उन शब्दों ने उसके भीतर के जल्दबाज प्रेमी को झकझोर कर रख दिया था। उसे अपनी गलती का एहसास हुआ कि वह शिवानी को किस अंधेरे में धकेलने जा रहा था।
अगले दिन सुबह, शिवानी के घर के दरवाजे पर एक दस्तक हुई। दरवाजे पर विकास खड़ा था। उसने शिवानी के पिता के पैर छुए और बिना डरे, लेकिन पूरी विनम्रता से अपनी बात रखी। पिता का गुस्सा सातवें आसमान पर था। उन्होंने विकास को खूब खरी-खोटी सुनाई और घर से निकाल दिया। लेकिन विकास ने हार नहीं मानी। वह लगातार कई हफ्तों तक उनके घर जाता रहा। बारिश हो या धूप, वह बाहर खड़ा रहता। उसने शिवानी के पिता को अपनी नौकरी, अपनी जिम्मेदारी और अपनी ईमानदारी का यकीन दिलाया। शिवानी ने भी घर में बगावत नहीं की, बल्कि खामोशी से अपने पिता की सेवा करती रही।
आखिरकार, एक पिता का दिल एक सच्चे और मर्यादित प्रेमी के सामने पिघल गया। विकास की हिम्मत और शिवानी की समझदारी ने एक ऐसे तूफान को रोक लिया था, जो दो परिवारों की इज्जत को हमेशा के लिए तबाह कर सकता था। आज शिवानी लाल जोड़े में सजी, अपने पिता के आशीर्वाद और विकास के प्यार के साथ सात फेरे ले रही थी। प्यार की जीत हुई थी, लेकिन मर्यादा की दहलीज को लांघे बिना।
कहानी पढ़ने के बाद आपको क्या लगता है? क्या शिवानी का भागने से इंकार करना और विकास को उसके परिवार का सामना करने के लिए प्रेरित करना सही फैसला था? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर बताएं।
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