सुमित्रा जी के हाथों में चाय की दो प्यालियां थीं, जिनसे उठती भाप सुबह की शांति में घुल रही थी। आज रविवार था, छुट्टी का दिन। सुमित्रा जी के कदमों की आहट बहुत धीमी थी, मानो वो इस शांत सुबह की लय को तोड़ना नहीं चाहती थीं। उनके चेहरे पर एक गहरी, अर्थपूर्ण मुस्कान थी, और आँखों में स्मृतियों का एक समंदर हिलोरे ले रहा था।
वे धीरे-धीरे अपने बेटे माधव और बहू शिखा के कमरे की तरफ बढ़ रही थीं। दरवाज़ा हल्का सा खुला था। उन्होंने देखा, माधव गहरी नींद में था, लेकिन शिखा आधी जगी हुई, अपनी कलाई घड़ी को देखकर घबराहट में उठने की कोशिश कर रही थी। नई-नई शादी हुई थी, मुश्किल से तीन महीने। शिखा एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती थी और हफ्ते भर की थकान के बाद रविवार को भी उसे घर की ज़िम्मेदारियों और ‘नई बहू’ होने के दबाव के कारण चैन की नींद नसीब नहीं हो रही थी। सुमित्रा जी वहीं चौखट पर ठिठक गईं। उन्हें अचानक अपना बीता हुआ कल याद आ गया।
सुमित्रा जी को याद आया कि कैसे बरसों पहले उनके पति, रमेश जी, अक्सर उन्हें ताना मारते थे। जब माधव छोटा था और सुमित्रा जी उसे लाड़-प्यार में देर तक सोने देती थीं, उसके सारे काम खुद कर देती थीं, तब रमेश जी हमेशा कहते थे, “तुमने इस लड़के की आदतें बिगाड़ कर रख दी हैं सुमित्रा। इसे हर चीज़ हाथ में चाहिए। कल को जब इसकी पत्नी आएगी, तब देखना, वो तुम्हें ही ताने मारेगी। तुम्हें अपने ये तौर-तरीके बदलने पड़ेंगे। एक दिन ये लड़का अपनी पत्नी के सामने तुम्हारी इसी लाड़-प्यार वाली आदतों पर झुंझलाएगा और तब तुम्हें समझ आएगा।”
सुमित्रा जी उस वक्त रमेश जी की बातों पर बस मुस्कुरा दिया करती थीं। उनका हमेशा से यही मानना था कि प्यार कभी किसी की आदत नहीं बिगाड़ता, बल्कि वो इंसान को भीतर से कोमल और ज़िम्मेदार बनाता है। वो जानती थीं कि उनका माधव उनका बहुत सम्मान करता है और उनकी हर डांट के पीछे छुपे प्यार को समझता है। लेकिन रमेश जी की वो बात कि “जब बहू आएगी तब क्या होगा”, अक्सर एक सवाल बनकर उनके ज़ेहन में गूंजती थी। समाज ने हमेशा से सास-बहू के रिश्ते को एक जंग के मैदान की तरह पेश किया था, जहाँ एक को अपनी सत्ता बचानी होती है और दूसरे को अपनी जगह बनानी होती है। पर सुमित्रा जी ने अपने मन में कुछ और ही तय कर रखा था।
कमरे के अंदर शिखा हड़बड़ी में बिस्तर से उठ रही थी। उसके चेहरे पर साफ तनाव था। वो मन ही मन खुद को कोस रही थी कि आज उसे उठने में इतनी देर कैसे हो गई। “मम्मी जी क्या सोचेंगी? रविवार के दिन भी बहू सो रही है और सास उठकर काम कर रही है।” इसी उधेड़बुन में जैसे ही शिखा ने दरवाज़े की तरफ कदम बढ़ाया, सुमित्रा जी चाय की प्यालियां लिए मुस्कुराते हुए अंदर दाखिल हुईं।
शिखा उन्हें देखकर सकपका गई। उसने झेंपते हुए कहा, “अरे मम्मी जी, आप क्यों चाय ले आईं? मुझे आवाज़ दे देतीं। मुझे सच में पता ही नहीं चला कि कब आँख लग गई। मैं बस अभी उठकर नाश्ते की तैयारी करती हूँ।” उसके स्वर में एक अनजाना सा डर और अपराधबोध था, जो आमतौर पर हर उस लड़की के मन में होता है जो अपनी जड़ों से उखड़कर एक नई ज़मीन पर खुद को रोपने की कोशिश कर रही होती है।
सुमित्रा जी ने बड़ी शांति से चाय की प्यालियां साइड टेबल पर रखीं और शिखा का हाथ पकड़कर उसे वापस बिस्तर पर माधव के पास बैठा दिया। माधव भी चाय की महक और आवाज़ों से आधी नींद से जाग चुका था और आँखें मलता हुआ उठ बैठा था। सुमित्रा जी बिस्तर के किनारे बैठ गईं। उन्होंने अपना एक हाथ माधव के सिर पर रखा और दूसरा शिखा के सिर पर। उनके हाथों का वो स्पर्श इतना आत्मीय था कि शिखा के भीतर का सारा तनाव एक पल में जैसे मोम की तरह पिघलने लगा।
“इतनी घबराहट क्यों है शिखा?” सुमित्रा जी की आवाज़ में वैसी ही खनक और मिठास थी जैसी एक माँ की आवाज़ में अपनी बेटी के लिए होती है। “तुम दोनों को कल से फिर उसी ऑफिस की भागदौड़ में लगना है ना? हफ्ते में एक ही तो दिन मिलता है तुम्हें खुद के लिए और एक-दूसरे के लिए। अगर इस दिन भी तुम सुबह की नींद का आनंद नहीं ले पाईं, तो फिर इस छुट्टी का क्या फायदा?”
माधव ने मुस्कुराते हुए अपनी माँ की तरफ देखा। उसे याद आ गया कि कैसे स्कूल और कॉलेज के दिनों में भी उसकी माँ उसे रविवार को ऐसे ही जगाने आती थीं। लेकिन शिखा अब भी हैरान थी। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या कहे।
सुमित्रा जी शिखा के बालों में उंगलियां फेरते हुए बोलीं, “जानती हो शिखा, माधव के पापा हमेशा मुझसे लड़ते थे कि मैं इसे बिगाड़ रही हूँ। वो कहते थे कि जब तू आएगी, तो मुझे बहुत कुछ बदलना पड़ेगा, अपने लाड़-प्यार पर लगाम लगानी पड़ेगी। और वो सच कहते थे… मुझे सच में खुद को बदलना पड़ा है।”
शिखा का दिल धक से रह गया। उसे लगा कि अब सुमित्रा जी उसे कोई ताना देने वाली हैं। माधव भी थोड़ा सचेत हो गया। लेकिन सुमित्रा जी की आँखों में एक अजीब सी चमक थी।
“हाँ, मुझे बदलना पड़ा है,” सुमित्रा जी ने अपनी बात जारी रखी, “पर इसलिए नहीं कि मैं माधव से कम प्यार करूँ, बल्कि इसलिए क्योंकि अब मुझे वो सारा प्यार, वो सारी परवाह, वो सारा लाड़ अब दो हिस्सों में बाँटना है। बल्कि सच कहूँ तो, माधव से भी ज़्यादा तुम्हारे हिस्से में रखना है।”
शिखा ने अचरज से सुमित्रा जी की आँखों में देखा। उन आँखों में कोई छलावा नहीं था, बस एक अथाह समंदर जैसी गहराई और सच्चाई थी।
सुमित्रा जी गहरी साँस लेते हुए बोलीं, “तुम अपना पूरा का पूरा संसार, अपना वो घर जहाँ तुमने बचपन बिताया, अपने वो माँ-बाप जिनकी तुम जान हो… सब कुछ छोड़कर सिर्फ इस एक लड़के के भरोसे इस अनजान घर में आ गई हो। तुम्हारे लिए यह घर, यहाँ की आदतें, यहाँ के लोग सब कुछ नए हैं। अगर मैं तुम्हारे इस नए सफर में तुम्हारी माँ नहीं बन पाई, तो मेरा इतने सालों का अनुभव किस काम का? माधव तो मेरे हर गुस्से में भी मेरा प्यार समझ लेता है, क्योंकि वो मेरे आँगन में पला है। पर तुम्हें तो मुझे ये विश्वास दिलाना होगा ना कि इस घर में तुम्हारे कदम पड़ते ही तुम इस घर की आत्मा बन गई हो।”
कमरे में एकदम सन्नाटा छा गया था। शिखा की आँखों की कोरें भीगने लगी थीं। सुमित्रा जी ने माधव की तरफ देखते हुए कहा, “देख माधव, ये लड़की हमारे घर की नई रोशनी है। इसके आने से इस घर में जो रौनक आई है, वो मैंने बरसों से नहीं देखी थी। मेरा मानना है कि मायके से लड़की सिर्फ अपना सामान नहीं लाती, बल्कि वो अपने साथ एक नया जीवन, एक नई ऊर्जा लेकर आती है। और मेरी ये ज़िम्मेदारी है कि मैं उस ऊर्जा को, उस रोशनी को कभी मद्धम ना पड़ने दूँ।”
सुमित्रा जी फिर शिखा की तरफ मुड़ीं, “मुझे तुमसे कोई परफेक्शन नहीं चाहिए शिखा। मुझे नहीं चाहिए कि तुम सुबह पाँच बजे उठकर मेरे लिए चाय बनाओ। तुम जली हुई रोटियां भी खिलाओगी, तो मैं उसे प्रसाद समझ कर खा लूंगी। मुझे बस तुम्हारा खुश रहना चाहिए। जैसे मेरी अपनी बेटी होती, तो क्या मैं उसे छुट्टी के दिन आराम से सोने नहीं देती? क्या मैं उसे हर बात पर टोकती? नहीं ना! तो फिर तुम्हें क्यों टोकूँ?”
शिखा से अब और नहीं रुका गया। उसने अपने दोनों हाथ सुमित्रा जी के गले में डाल दिए और फूट-फूट कर रोने लगी। ये आँसू दुख के नहीं थे, ये उस भारी बोझ के पिघलने के आँसू थे जो वो पिछले तीन महीने से अपने सीने पर ढो रही थी ‘एक आदर्श बहू’ बनने का बोझ। माधव ने भी आगे बढ़कर अपनी माँ और पत्नी को अपनी बाहों के घेरे में ले लिया। उस एक पल में उस कमरे में कोई सास, कोई बहू नहीं थी; वहाँ बस एक माँ थी और उसके दो बच्चे।
दरवाज़े के बाहर खड़े रमेश जी इस पूरे दृश्य को देख रहे थे। उनकी आँखों में भी नमी तैर आई थी। आज उन्हें एहसास हो रहा था कि सुमित्रा की जिस ममता को वो उसकी कमज़ोरी समझते थे, असल में वो इस परिवार को बाँधे रखने वाली सबसे मज़बूत डोर थी। उन्होंने मन ही मन अपनी पत्नी को सलाम किया। सुमित्रा ने ना सिर्फ एक बहू को बेटी बना लिया था, बल्कि एक नए रिश्ते की ऐसी बुनियाद रख दी थी जिसे दुनिया की कोई भी दरार कभी नहीं तोड़ सकती थी।
सुमित्रा जी ने शिखा के आँसू पोंछे और हंसते हुए बोलीं, “चलो, अब बहुत रोना-धोना हो गया। तुम्हारी चाय ठंडी हो रही है। जल्दी से पियो, फिर आज हम सब मिलकर तुम्हारे पापा की पसंद का नाश्ता बनाएंगे।”
कमरे में एक बार फिर से खिलखिलाहट गूंज उठी। सूरज की किरणें अब और भी ज्यादा चमकीली लग रही थीं, मानो वो भी इस घर के नए और खूबसूरत रिश्ते को अपना आशीर्वाद दे रही हों। आज इस घर में सिर्फ सुबह नहीं हुई थी, बल्कि रिश्तों की एक नई भोर का उदय हुआ था।
आप सभी पाठकों से एक सवाल:
क्या आपको भी लगता है कि अगर सास और बहू के रिश्ते में अपेक्षाओं की जगह समझ और प्यार को रख दिया जाए, तो हर घर स्वर्ग बन सकता है? इस कहानी के बारे में अपने विचार मुझे कमेंट करके ज़रूर बताएँ। मुझे आपके जवाब का इंतज़ार रहेगा।
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