“अरे मम्मी,इतना बड़ा कट लग गया है चाकू से।खून भी बहुत बह रहा है।तुम छोड़ो ये सब।मैं कर लूंगी।बैन्ड एड लगा लो चलो।” रिद्धि(बेटी) लगभग चीखते हुए बोली।रमा ने हंसकर कहा”अरे,इतना भी गहरा घाव नहीं हुआ है रे।मैं चूना और हल्दी लगा लेती हूं,अभी खून रुक जाएगा।तू इतना घबरा मत।चिल्लाना बन्द कर।”
“अच्छा,घाव ज्यादा नहीं हुआ???तुम्हें कैसे पता? दर्द भी तो हो रहा होगा उंगली में।क्यों सुपरमैन बनती रहती हो हमेशा।रसोई से बाहर नहीं निकल सकती तुम?किसी को पता भी नहीं चलेगा कि इतना खून बह रहा है।अपना दर्द बताओगी नहीं,तो कैसे कोई समझेगा मम्मी? दर्द नहीं होता क्या?”
रमा ने हंसकर कहा”नहीं , बिल्कुल भी नहीं।इन छोटे-छोटे घावों के दर्द इतने ज्यादा भी नहीं होते।तूने बेकार में चिल्लाकर सभी को बता दिया।ऐसे रोज ना जाने कितने छोटे-मोटे कट लग जाते हैं।अब मैं बच्ची थोड़े हूं कि रोऊं या चीखूं।”
” मम्मी,हर दर्द बर्दाश्त करने की जरूरत नहीं होती।ये तुम्हारी पीढ़ी समझती ही नहीं।चोट लगी है तो दर्द तो होगा ही,फिर छिपाने से क्या फायदा?मैं देख रहीं हूं, आजकल तुम निर्विकार होती जा रही हो।ऐसा क्यों मम्मी?जबरन ख़ुद को सशक्त दिखाने लगी हो अब तुम।अरे,बुला सकती हो पापा को,मुझे या भाई को।चलो टिटनेस लगवा आते हैं हॉस्पिटल से।”
रिद्धि कहां मानने वाली थी।।हर समय बस अपनी मां की चिंता करती रहती है।
“टिटनेस लगवाने की जिद,तुमने हमारे बचपन से अब तक कम नहीं की है मम्मी।अब तुम्हें भी लगवाना तो पड़ेगा।”हॉस्पिटल में नर्स के सामने चिढ़ाते हुए बोली रिद्धि।रमा ने चुपचाप इंजेक्शन लगवा लिया।रात का खाना रिद्धि ने ही बनाया।अपने पापा ,दादी,भाई को देकर मां -बेटी की थाली भी सजाकर ले आई।खाकर बाहर टहलने की दिनचर्या थी रमा की।
आज रिद्धि भी साथ में हो ली। इधर-उधर की बातें करते-करते अचानक उसने पूछा” मम्मी,तुमने अभी तक अपने पुराने घाव भरने नहीं दिए हैं ना?उन घावों की टीस आज भी तुम्हें दर्द देती है,है ना?मुझसे मत छिपाओ तुम।अब मैं बच्ची नहीं हूं।तब भी मैंने कहा था,
तुम जो भी फैसला लेना चाहो,ले लो।तुमने तब उस घाव का इलाज करवा लिया होता,तो आज वह टीस नहीं देता।साथ रह तो रही हो ,पर आत्मा से बहुत दूर होती जा रही हो पापा से।आखिर तब तुमने कहीं और नौकरी क्यों नहीं कर ली?
क्यों सब कुछ छोड़कर हमें लेकर नहीं गई?क्या मिला तुम्हें,इस रिश्ते को खींचकर?अब तुम खुश नहीं हो,बस खुश होने का अभिनय करती हो।कोई और समझें ना समझे,मैं सब समझती हूं।बेटी हूं तुम्हारी।”
रमा सन्न रह गई।सच में बेटियां क्या स्कैनिंग जानती हैं ?दिल की हर बात आंखों से समझ जाती हैं।उस घटना को हुए तो सालों गुज़र गए होंगें,पर बेटी को अपनी मां के आत्मसम्मान की हत्या का पल आज भी याद है।
संयत होने की कोशिश करते हुए बोली रमा” बाप रे बाप!!!!तू भी ना जासूसों की गुरू हैं।अरे, वो पुराना घाव तो कब का भर गया रे।वह जानबूझकर तो दिया नहीं था तेरे पापा ने, गलती से हो गया था।मैं दुर्घटना समझ कर कब का भूल गई।हां,अब मैं समझदार तो हो ही गई हूं।इस उम्र में,जब बच्चे बड़े और समझदार हो जाएं,
तो मां का बचकानापन शोभा देता है क्या?ये दर्द -वर्द की बातें बंद कर अब।तू अभी -अभी तो आई है।अपनी नौकरी की बातें कर।कोई लड़का पसंद आया या नहीं वो बता।कहां मेरे पुराने घाव और टीस को लेकर बैठी है।”
रिद्धि रोती नहीं थी कभी।ना हॉस्टल जाने में रोई,ना नौकरी करने दूर शहर जाते हुए रोई।रमा को बड़ा अभिमान था उस पर।अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना उसी से सीख रही थी रमा।आज भी रमा की बातें सुनकर वह रोई नहीं।बस इतना ही कहा उसने”मम्मी,जिसे तुम दुर्घटना समझकर भुला देने का दावा कर रही हो ना,
वह तुम्हारे पल-पल मरते हुए आत्मसम्मान की जड़ है।जो तुमने किया था ना,उसे समझौता कहते हैं।अपनी खोखली शादी बचाने के लिए तुमने अपने अस्तित्व से ही समझौता कर लिया?अब मैं जिसे देखती हूं,मिलती हूं वह मेरी पुरानी वाली मां नहीं लगती।बिचारी वाली कोई औरत लगती है।कम से कम मैं तुम्हें ऐसे नहीं देख सकती।
मैंने तो पापा को कभी माफ ना करने का प्रण ले लिया था,पर तुमने ही भावनाओं की बेड़ियों में मुझे जकड़कर उनसे दूर नहीं होने दिया।अपने दर्द का ईलाज तो नहीं ढूंढ़ पाई ना तुम?अब जब मेरी शादी की बात करती हो,तो मुझे डर लगता है।मैं शायद कभी भी अपने पति को विश्वासघात के लिए माफ नहीं कर पाऊंगी।समझौता नहीं कर पाऊंगी मैं अपने आत्मसम्मान के साथ।मुझे सच में खुश रहना है,दिखना नहीं।ऐसे बेमन से साथ रहने से अच्छा है,अलग हो जाना।”
रिद्धि लगातार बोले जा रही थी,और पहली बार अपने मन में छिपे दर्द को उकेरा था उसने।रमा अपने बच्चों के सामने लाचार और बेचारी औरत कभी नहीं दिखना चाहती।यह तो उसकी सबसे बड़ी हार होगी।जब उसकी बेटी ही उसे कायर समझेगी,तो तीस सालों की तपस्या कलंकित हो जाएगी।
तिल-तिल करके जो अपनी ईमानदारी की आहुतियां दी थीं उसने,परिवार के यज्ञ में वह तो निष्फल हो जाएगी। नहीं-नहीं,उसे यह हार स्वीकार नहीं।उसे समझौता भी कभी स्वीकार्य नहीं था।उसने यदि तब अपना निर्णय बदला था,तो केवल पिता के वात्सल्य की छांव के लिए।रिद्धि की सोच बदलनी ही होगी,आज ही ,अभी ही।
रमा ,रिद्धि का हांथ पकड़कर घर ले आई।
उम्र के इस पड़ाव में,जब शादी के पवित्र बंधन में बंधने का समय आया , तब अपनी मां की जगह खुद को रखेगी, तो शादी को निभा कैसे पाएगी? रात को सभी के सोने के बाद दोनों सामने आंगन में लगे झूले पर बैठे।रमा ने रिद्धि के बालों पर हांथ फेरते हुए कहा”देख मम्मा, मैंने कभी अपने अस्तित्व के साथ समझौता करके शादी को नहीं आगे बढ़ाया। विश्वासघात हुआ था मेरे साथ, वह अकेले तेरे पापा की तरफ से नहीं था।
मेरी अपनी बहन भी बराबर की हिस्सेदार थी उसमें।और पता है मैंने उन दोनों को माफ कर तो दिया, पर एक नई सीख भी ली उससे।जो घाव दर्द देते रहते हैं सदा, उन्हें यदि हम अपनी दवा बना लें तो बेहतर है।यही दवा हमें शांति से जीने की प्रेरणा देती है, और विश्वासघात करने वालों को प्रायश्चित का अवसर। तेरे पापा दुनिया के सबसे श्रेष्ठ पिता हैं।
उनसे ज्यादा तो मैं भी तुम दोनों से प्यार नहीं कर सकती।उनसे ज्यादा तुम लोगों के सुख की चिंता मैं कभी नहीं कर सकती।उनके जीवन में तुम दोनों की प्राथमिकता पहले है, बाद में किसी और की।और मैं इस मामले में बिल्कुल उलट।बाकी सारी जिम्मेदारी निभाने में इतना रम जाती हूं,
कि अपने पति और बच्चों के प्रति उदासीनता आ जाती है।शायद इसी वजह से पापा ने वह गलती की थी।मैंने बहुत कोशिश की थी कि तुम दोनों को पता ना चले, पर दादी के द्वारा तुम्हें पता चला।मौसी के साथ पापा का भावनात्मक रिश्ता बन गया था।शायद पुरुषों को मानसिक नजदीकियों की भी ज्यादा जरूरत होती है।उनके प्रति थोड़ा सा भी रुझान कम होता है, तो वे विचलित हो जातें हैं।
यही शायद उनकी कमजोरी है।और इसी कमजोरी ने तेरी मौसी को उनकी जिंदगी में जगह दे दी।पापा मुझमें प्रेयसी खोजते रहे होंगे, वो तो उन्हें मिली ही नहीं कभी।बल्कि एक सुशील बहू, मायके की जिम्मेदार बड़ी बेटी, अच्छी भाभी और एक अनुशासित शिक्षिका ही मिली।
तेरी मौसी का अल्हड़पन उनके उस रिक्त स्थान को भरने लगा था शायद।बात बहुत आगे तक नहीं पहुंच पाई थी, पर लगाव काफी बढ़ गया था।रह मेरे नारीत्व पर तमाचा था।मेरी सारी समझदारी पर लगाया गया एक थप्पड़ था, जिसने मुझे परास्त कर दिया था।
तूने पूछा था ना, मैंने उन्हें छोड़ कर कहीं और जाने का निर्णय क्यों बदल दिया? तुम दोनों के लिए।एक पत्नी अपने पति से अलग होकर रह सकती है, पर वह भी समाज की नजरों में बुरी बनकर।बच्चे अपने पिता से अलग नहीं रहने चाहिए।पिता अभिमान होते हैं बच्चों के।अपनी मेहनत की कमाई हंसकर एक पिता ही अपने बच्चों पर खर्च कर सकता है।जिस दिन मैं तुम लोगों को लेकर चली जाती, उसी दिन उनके प्राण निकल जाते।बहुत प्यार करते हैं पापा तुम दोनों से।”
” और तुमसे,नहीं ना”रिद्धि ने ताना देकर पूछा,तो रमा झूठ नहीं बोल पाई” नहीं रे,वो मुझसे भी बहुत प्यार करते हैं।अपने माता-पिता,बहनों से भी करते हैं।तेरे पापा सभी से बहुत प्यार करते हैं।अपनी उस गलती के लिए,मुझे बोल भी दिया था फैसला लेने को।मैंने तब अपने अहं को मारकर तुम्हारे पापा की खुशी के बारे में सोचा।इतने सालों तक ईमानदारी से अपना फर्ज निभाने वाले को ,उनकी आधी गलती की सजा ,
बच्चे छीनकर नहीं कर पाई मैं।मैंने अपना घाव खुला छोड़ा ही नहीं,कि नासूर बन सके।मैंने परिवार के प्रति अपने दायित्वों का पालन निःस्वार्थ होकर किया।यह मेरा घर है, मैं क्यों जाऊं इसे छोड़कर।तब मैंने तेरे पापा से कहा था, घर छोड़कर चले जाने के लिए, या तो अपनी ग़लती ना दोहराएं कभी।तुम दोनों को छोड़कर वो कहीं जा ही नहीं सकते थे। दादा-दादी का साथ भी मुझे ही मिलता।अकेले तो पापा एक मिनट भी नहीं रह सकते। उन्होंने अपना वचन निभाया है सौ-प्रतिशत।पूरी दुनिया एक तरफ, और तुम दोनों एक तरफ।यह समझौता नहीं था,
बल्कि सम्मान वापस पाना था मेरे लिए।एक पत्नी जो कायर होकर पति को छोड़ दें, समाज में उसकी इज्जत दो कौड़ी की भी नहीं रहती।बेटा, लड़कियों की असली ताकत छोड़ने में नहीं जोड़ने में है।”
उसने फिर आगे पूछा” और उन आंसुओं का क्या,जो तुम हमसे छिपाकर बहाया करती थी तब।उनका दर्द नहीं रहा क्या?”
” उन आंसुओं ने मेरे मन का सारा मलाल शुद्ध कर दिया।वो आंसू मेरे लिए गंगा जल बन गये।तभी तो दर्द,दवा बन सका।नहीं तो हम में से कोई खुश रह पाता आज क्या?खुशी की परिभाषा कांच के आधे भरे गिलास की तरह है।जिस नजरिए से देखोगी,वही दिखेगा।मैंने उस कांच के गिलास को हमेशा आधा भरा देखा,ना कि आधा खाली।आधा भरा होना भी तो एक वरदान है।तेरे पापा ने अपनी मेहनत की कमाई ,हम पर खुश होकर लुटाई है।
हमारी सारी जरूरतें हंसकर पूरी की हैं।मेरा कभी खुद अपमान भी नहीं किया।ना ही कभी नौकरी को लेकर शक किया।इतनी सारी अच्छाईयों के नीचे एक ग़लती कब दब गई ,पता ही नहीं चला।हां,यदि दोबारा वो गलती दोहराई जाती,तो मेरा दर्द छोड़ता नहीं फिर उन्हें।”रमा शांत होकर समझा रही थी, रिद्धि को।रिद्धि के हाव -भाव अब सामान्य दिख रहे थे।
अब रमा ने लोहा गर्म देखकर आखिरी चोट की” बेटा,जीवन में कभी-कभी अपने सुख और दुःख से ज्यादा बच्चों के सुख-दुख कीमती लगने लगते हैं।तब पत्नी बनकर केवल अपने स्वार्थ के लिए पति को सजा देना,पाप होता है।एक और अवसर दिया जा सकता है ना,हर किसी को।सबसे ज्यादा ख़ुद को।
तो मैंने भी अपने आपको एक अवसर दिया कि और अच्छी मां बन पाऊं।यदि तुम लोगों को अपने पापा की इज्जत करना ,उनसे प्यार करना ही नहीं सिखा पाती,तो कैसी टीचर मैं?और देख मैंने खुद के सम्मान को भी मरने नहीं दिया ,और पापा की पहचान को भी कलंकित नहीं होने दिया।मैं रहूं या ना रहूं,तेरे पापा तुम दोनों को अपने मजबूत पाश में हमेशा बांधकर रखेंगे।ऐसा पुरुष मिलना भी तो सौभाग्य की बात है।अब भूल तो मनुष्य से हो ही जाती है,
पर रिश्तों पर चोट देकर सजा देना ,हम औरतों को शोभा नहीं देता।मेरा हर दर्द अब दवा बनकर मुझे कष्ट मुक्त करता है।मैं खुश रहती हूं,दिखती नहीं।मैं अपनी हार अब भी स्वीकार नहीं करती।मैं ,मैं हूं।सबसे अलग,सबसे विशिष्ट,सबसे ताकतवर,
सबसे ज्यादा आत्मनिर्भर और सबसे ज्यादा अनुशासित भी।बोल अब तू,मेरा दर्द बना ना मेरी दवा।अब दर्द वास्तव में कम होता है।चोट बेअसर लगती है कोई भी।जानती है इसका मतलब क्या है?”
उसने नहीं में सिर हिलाया,तो रमा ने पुचकारते हुए कहा” मैंने स्वयं को तपाकर तुझे भी कुंदन बना दिया है।तुझे परखना आ गया लोगों को।तू दिन-प्रतिदिन और मजबूत होती गई।अब तू अपने पति के रूप में सुयोग्य लड़का ढूंढ़ने के काबिल हो गई है।यदि उस लड़के में कोई कमी है,तो तू उसे अपने अनुसार ढाल भी सकती है।समझी।यह सब दर्द का ही कमाल है।कुछ दर्द अक्सर दवा बन जाते हैं।तू भी अपने उस दर्द को दवा बना लें,तो जीवनसाथी ढूंढ़ने में सहूलियत होगी।चल अब सोने।कल सुबह-सुबह विश करना है ना पापा को?”
” हां-हां,केक भी आर्डर कर दिया है हमने(भाई-बहन)।चलो सो जाओ तुम भी।रविवार को तो तुम्हें स्कूल नहीं जाना ना?”
रमा समझ सकती थी बेटी का चिढ़ाना। फादर्स डे रविवार को पड़ रहा था।उस दिन निश्चित ही छुट्टी रहती है स्कूल की।
शुभ्रा बैनर्जी