“तुमसे मिलना मेरी ज़िंदगी का सबसे खूबसूरत दर्द है, कबीर।”
आराधना ने ये बात उस दिन कही थी, जिस दिन कबीर ने पहली बार उसका हाथ थामा था। मरीन ड्राइव पर समंदर की लहरें किनारे से टकरा रही थीं, और आराधना की आँखें कबीर के चेहरे पर टिकी थीं। कबीर हँस पड़ा था — “दर्द खूबसूरत कैसे हो सकता है पगली?”
“होता है कबीर,” आराधना ने उसका हाथ और कस कर पकड़ा था, “जब दर्द की वजह तुम हो।”
कबीर और आराधना की लव स्टोरी कॉलेज की कैंटीन से शुरू हुई थी। कबीर सिविल इंजीनियरिंग फाइनल ईयर में और आराध्या फर्स्ट ईयर लिटरेचर । कबीर डिबेट में आराधना हराने आया था, दिल हार गया, कबीर शायरी भी करता था । आराधना को उसकी शायरी से प्यार हुआ, कबीर को उसकी उन्मुक्त हँसी से।
दो साल हुए इन दो साल में मुंबई की हर गली उनके प्रेम की गवाह बन गई। वीटी स्टेशन की चाय, बांद्रा के कैफे, अँधेरी की लोकल ट्रेन। कबीर कहता — “तेरे ‘प्रेम के बाद’ मुझे कुछ नहीं चाहिए आरू।” आराधना कहती — “मुझे तो बस तेरा शुभ चाहिए।”
फिर प्लेसमेंट आया । कबीर को दुबई की एक बड़ी कंस्ट्रक्शन कंपनी में जॉब मिली। पैकेज ऐसा कि सात पीढ़ी बैठकर खाएँ। आराधना के घर में जश्न । कबीर के पापा ने मिठाई बाँटी — “मेरा बेटा निकल गया।”
जाने से एक रात पहले दोनों वर्सोवा बीच पर बैठे थे।
“दो साल, आरू। बस दो साल। प्रोजेक्ट खत्म करके सीधा तेरे दरवाज़े पर आऊँगा और फिर शादी,” कबीर ने वादा किया।
आराधना चुपचाप समंदर देख रही थी। फिर बोली — “कबीर, दूरियाँ ‘दर्द’ तो देती हैं न पर ?”
कबीर बोला- “पर आरू ये दर्द ‘जायज़’ है ना? अपने फ्यूचर के लिए। तेरे लिए, मेरे लिए।”
आराधना ने हाँ में सिर हिला दिया। पर उसकी आँखों में समंदर उतर आया था।
शुरू के छह महीने वीडियो कॉल, रोज़ के मैसेज, ‘गुड मॉर्निंग’ से ‘गुड नाइट’ तक। फिर धीरे-धीरे ‘गुड नाइट’ बच गया। फिर वो भी ‘K’ में बदल गया। कबीर का प्रोजेक्ट बढ़ गया। साइट पर 16-16 घंटे। “आरू , समझा कर यार। टाइम नहीं मिलता।”
आराधना एम.ए. कर रही थी। घरवालों ने रिश्ते की बात चलानी शुरू कर दी।”बेटा, 25 की हो गई। कबीर का कुछ ‘पक्का’ है?”
आराधना हर बार कहती — “वो आएगा माँ। दो साल बोले थे उसने ।”
दो साल, चार साल में कब कैसे बदले पता न चला , समय जाते देर नहीं लगती। कबीर अब प्रोजेक्ट मैनेजर था। दुबई में फ्लैट, गाड़ी। इन्स्टाग्राम पर उसकी फोटो — बुर्ज खलीफा के सामने, डेज़र्ट सफारी में। कैप्शन — ‘Life is Good’।
आराधना की लाइफ? वो अब कॉलेज में लेक्चरर थी। उम्र 29 हो गई थी! माँ-बाप का दबाव, रिश्तेदारों के ताने — “लड़की हाथ से निकल जाएगी।” एक दिन माँ रो पड़ीं — “कबीर को फोन कर पूछ ही लिया, शादी करेगा या नहीं?”
आराधना ने हिम्मत की। रात के 2 बजे दुबई टाइम। कबीर ने फोन उठाया, आवाज़ में नींद और झुँझलाहट — “हाँ आरू, बोल।”
“कबीर, चार साल हो गए। घरवाले…”
“आरू यार, अभी नहीं। यहाँ नया प्रोजेक्ट मिला है। 2 साल और। फिर मैं परमानेंट शिफ्ट हो जाऊँगा। तू भी यहीं आ जाना। समझा कर।”
“और अगर मैं दो साल और इंतज़ार नहीं कर सकती?”
लाइन के उस पार खामोशी।
फिर कबीर की आवाज़, ठंडी और प्रोफेशनल हुई — “आरू, इमोशनल मत हो। प्रैक्टिकल सोच। मैं तेरे लिए ही तो कर रहा हूँ सब।”
फोन कट गया। ‘उसके बाद’ आराध्या ने कभी फोन नहीं किया। कबीर ने भी नहीं। ‘K’ भी आना बंद हो गए।
एक साल बाद आराधना की शादी थी आज । लड़का प्रोफेसर था, सुलझे हुए विचारों का और शांत स्वभाव। संगीत पर आराधना नाच रही थी, मेहँदी वाली हथेली पर ‘कबीर’ नहीं लिखा था। तभी गेट पर भीड़ में कबीर दिखाई दिया चार साल बाद। दुबई से सीधा आराधना के घर । आँखें लाल, सूट सलवटों वाला।
वो स्टेज पर आया। आराधना ने उसे देखा। न गुस्सा, न आँसू। बस एक अजीब सी शांति उसके चेहरे पर।
“आरू,” कबीर की आवाज़ भर्रा गई, “मैं लेट हो गया। I know पर अब आ गया हूँ। ये सब रोक दो। मैं… मैं तुम्हारे बिना नहीं रह सकता।”
पूरे हॉल में सन्नाटा। आराधना ने उसे ऊपर से नीचे देखा। वो अब वो कबीर नहीं था जिससे वो प्यार करती थी। ये कोई और था — थका हुआ, हारा हुआ और अकेला।
वो मुस्कुराई। वही मुस्कान, जो वर्सोवा बीच पर थी। फिर धीरे से बोली — इतनी धीरे कि सिर्फ कबीर सुन सके —
“कबीर, तुम सही थे। दर्द खूबसूरत नहीं होता। तुमने चार साल में मुझे यही सिखाया।
तुमसे मिलना खूबसूरत था, पर तुम्हारा इंतज़ार… वो सिर्फ दर्द था। और अब मैं उस दर्द की आदी हो चुकी हूँ। तुमने मुझे ‘दर्द’ से प्यार करना सिखा दिया कबीर ।”
“आरू, मैं…”
“श्श,” उसने कबीर के होंठों पर उँगली रख दी। “तुम्हारा ‘दर्द’ जायज़ था — अपने करियर के लिए।
आज मेरा ‘दर्द’ भी जायज़ है — अपनी ज़िंदगी के लिए।
तुम आगे बढ़ गए कबीर।
मैं भी बढ़ रही हूँ।
फर्क बस इतना है — तुम ‘पैसा’ कमाने गए थे,
मैं ‘खुद’ को कमाने लगी।”
कबीर के घुटने ज़मीन पर टिक गए। “मत जाओ आरू। प्लीज़।”
आराधना झुकी, उसके माथे को चूमा — आखिरी बार। “मैं जा नहीं रही कबीर।
मैं तो जाने कब की चली गई।
तुम ही बस अब पहुँचे हो। और मोहब्बत में जो वक्त पर न पहुँचे, वो ‘कहानी’ बन जाता है कबीर , ‘ज़िंदगी’ नहीं।”
आराधना पलटी और दूल्हे के पास जाकर खड़ी हो गई। कबीर वहीं बैठा रहा। हॉल में शहनाई बज रही थी। पर कबीर को सिर्फ एक आवाज़ सुनाई दे रही थी — उसके अपने दिल के टूटने की।
ऐसा ही होता है — कुछ दर्द ‘मोहब्बत’ देते हैं, कुछ ‘मोहब्बत’ ले लेते हैं।
कबीर को दुबई मिल गया, आराधना को सुकून।
पर दोनों को एक चीज़ कॉमन मिली — वो था “दर्द’।
फर्क सिर्फ इतना था — आराधना का दर्द उसके बाद खत्म हो गया, कबीर का’उसके बाद शुरू हुआ।
क्योंकि इंतज़ार का दर्द तो वक्त के साथ भर भी जाता है,
पर पछतावे का दर्द… वो तो उम्र भर रहता है।
सुनीता मलिक सोलंकी