दर्द – सुदर्शन सचदेवा

“अजी सुनते हो… नेहा आ रही है!” रसोई से उत्साह भरी आवाज़ आई। यह सुनते ही रमेश जी के चेहरे पर मुस्कान खिल उठी। “सच! कितने दिनों बाद हमारी बेटी घर आ रही है।” उन्होंने तुरंत अख़बार एक तरफ रखा और बोले, “उसकी पसंद की कचौरी, खीर और आलू के पराठे बनाना…

और हाँ, उसका कमरा भी अच्छे से सजा देना।” घर का हर कोना जैसे अपनी बेटी के स्वागत की तैयारी में मुस्कुरा उठा, लेकिन किसी को क्या पता था कि इस बार नेहा की मुस्कान के पीछे एक ऐसा दर्द छिपा था, जिसे वह किसी से कह नहीं पा रही थी।

सुबह का समय था। घर में चहल-पहल थी। रसोई से चाय की खुशबू आ रही थी, लेकिन सीमा के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी। आज वह अपने मायके जाने की तैयारी कर रही थी। कई महीनों बाद उसे माँ से मिलने का अवसर मिला था।

सीमा ने धीरे से अपने पति से कहा, “मैं दो दिन के लिए माँ के पास चली जाऊँ?”

पति मुस्कुराए, “ज़रूर जाओ, लेकिन जल्दी लौट आना।”

ससुराल वालों ने भी अनुमति दे दी। सीमा खुश तो थी, लेकिन मन के किसी कोने में एक अनजाना डर था। क्या मायका अब भी पहले जैसा होगा?

जब वह अपने मायके पहुँची तो माँ ने उसे गले से लगा लिया। बरसों का स्नेह आँखों से आँसू बनकर बह निकला। लेकिन घर का माहौल बदल चुका था। भाई अपनी नौकरी में व्यस्त थे और भाभियाँ अपने-अपने कामों में। पहले जिस घर में उसकी हँसी गूँजती थी, आज वहाँ वह खुद को मेहमान महसूस कर रही थी।

दोपहर में सभी लोग साथ बैठे थे। तभी एक भाभी ने अनजाने में कह दिया, “दीदी, अब तो आपका घर ससुराल है। यहाँ तो बस कुछ दिनों की मेहमान हैं।”

ये शब्द सुनकर सीमा का दिल जैसे टूट गया। उसने मुस्कुराकर बात टाल दी, लेकिन भीतर का दर्द आँखों में उतर आया। जिस आँगन में उसने चलना सीखा, जहाँ बचपन की यादें थीं, आज उसी घर में वह मेहमान कहलाने लगी थी।

रात को माँ उसके पास बैठीं। उन्होंने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, “बेटी, तू खुश तो है ना?”

सीमा ने माँ की गोद में सिर रख दिया और बोली, “माँ, ससुराल में सब कहते हैं कि अब तुम्हारा मायका है, वहाँ जाओ। और यहाँ आकर सुनती हूँ कि अब तुम्हारा घर ससुराल है। आखिर बेटी का अपना घर कौन-सा होता है?”

माँ की आँखें भर आईं। उन्होंने कहा, “बेटी, सच तो यह है कि लड़की का दिल ही उसका सबसे बड़ा घर होता है। वह जहाँ प्रेम और सम्मान पाती है, वही उसका अपना घर बन जाता है।”

अगले दिन सीमा ने देखा कि उसकी बूढ़ी माँ अकेले ही सारे काम कर रही थीं। उसने तुरंत झाड़ू उठाई, रसोई संभाली और माँ के साथ बैठकर पुराने दिनों की बातें करने लगी। माँ के चेहरे पर फिर वही पुरानी मुस्कान लौट आई।

जब सीमा वापस ससुराल जाने लगी तो माँ ने उसके हाथ में एक छोटा-सा डिब्बा दिया। उसमें कोई गहना नहीं था, बल्कि उसके बचपन की एक छोटी-सी तस्वीर और एक चिट्ठी थी।

चिट्ठी में लिखा था—

“बेटी, घर ईंट-पत्थर से नहीं, अपनेपन से बनता है। इस घर का दरवाज़ा तेरे लिए हमेशा खुला रहेगा। चाहे दुनिया कुछ भी कहे, तू इस आँगन की धड़कन थी, है और हमेशा रहेगी।”

सीमा ने चिट्ठी को सीने से लगा लिया। लौटते समय उसकी आँखें नम थीं, लेकिन मन हल्का था। उसे एहसास हो गया था कि माँ का प्यार कभी कम नहीं होता।

कुछ दिनों बाद सीमा ने अपने भाइयों को घर बुलाया। उसने प्यार से कहा, “बहनों को मेहमान मत समझो। वे इस घर की यादें होती हैं। अगर बेटियाँ अपने मायके आने से पहले दस बार सोचने लगें, तो समझ लेना कि घर की दीवारें तो खड़ी हैं, लेकिन रिश्तों की नींव कमजोर हो गई है।”

भाइयों की आँखें झुक गईं। उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने उसी दिन वादा किया कि उनकी बहन जब भी आएगी, उसे मेहमान नहीं, घर की बेटी बनकर ही सम्मान मिलेगा।

उस दिन के बाद मायके का माहौल बदल गया। भाभियाँ भी सीमा का इंतज़ार करने लगीं। त्योहारों पर उसकी पसंद के पकवान बनने लगे और घर फिर से हँसी से भरने लगा।

सीख:

बेटियाँ बोझ नहीं, परिवार की सबसे अनमोल धरोहर होती हैं। वे दो घरों को प्रेम से जोड़ती हैं। उन्हें सम्मान, अपनापन और अधिकार देना हर परिवार का कर्तव्य है, क्योंकि जिस घर में बेटियों की मुस्कान बसती है, वहाँ सुख, शांति और समृद्धि स्वयं आ जाती है।

सुदर्शन सचदेवा

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