सपना की शादी को तीन साल हो चुके थे। ससुराल वाले अच्छे थे, पर कभी-कभी बातों के बीच ऐसा ताना छूट जाता कि दिल को चुभ जाता। “बहुएँ मायके जाकर ऐश करती हैं” – ये वाक्य सपना ने कई बार सुना था।
इस बार दीवाली से एक हफ्ते पहले उसे मायके जाने का मौका मिला। ट्रेन में बैठते ही मन हल्का हो गया। स्टेशन पर उतरते ही माँ की आवाज़ आई, “आ गई मेरी बेटी!” गले लगते ही सपना की आँखें भर आईं।
घर के अंदर कदम रखते ही पुरानी खुशबू ने स्वागत किया – गुड़ और घी की महक। रसोई में माँ पहले से हलवा बना रही थी। “तेरा पसंदीदा बेसन का हलवा, ड्राई फ्रूट्स डालकर,” माँ बोली। सपना को याद आया, बचपन में बुखार होने पर भी माँ यही बनाती थी।
पिताजी बैठक में अखबार पढ़ रहे थे। सपना को देखते ही चश्मा उतारकर बोले, “आ गई? तेरी अलमारी साफ करवा दी। तेरे कॉलेज के नोट्स, वो डायरी जिसमें तू कविता लिखती थी, सब संभालकर रखे हैं। कहीं तेरे काम आ जाएं।” सपना ने डायरी खोली। आखिरी पन्ने पर लिखा था – “एक दिन मैं अपने पैरों पर खड़ी होऊँगी।” शादी के बाद वो डायरी भूल गई थी।
शाम को छोटा भाई मोहन दौड़ता हुआ आया, हाथ में गोलगप्पे का पैकेट। “दी, तुम्हारे लिए स्पेशल। पापा ने कहा ज्यादा खट्टा मत देना।” दोनों भाई-बहन आँगन में बैठकर हँसते रहे। वो हँसी में कोई दिखावा नहीं था, कोई हिसाब नहीं था।
तीन दिन बीत गए। सपना को वापस जाना था। सामान पैक करते समय माँ ने उसकी पसंद की हरी चूड़ियाँ, अचार की छोटी शीशी, और एक स्वेटर रख दिया। “सर्दी आ रही है, ससुराल में मत कहना कि माँ ने नहीं दिया।”
घर लौटते ही सास ने दरवाज़े पर ही पूछा, “तो, मायके में बहुत ऐश की होगी? आराम मिला? अब बताओ, तुम्हारा मायका तुम्हारे ससुराल से बढ़कर है क्या?”
सपना ने सामान रखा। सास की आँखों में वो पुराना सवाल था, जिसमें तुलना छिपी थी। सपना ने धीरे से कहा, “माँ जी, बडा और छोटा का हिसाब लगाया तो रिश्ते टूट जाते हैं। मायका वो जगह है जहाँ मैं सपना थी – बिना जिम्मेदारी के, बिना नाम के। ससुराल वो जगह है जहाँ मैं बहू हूँ – जहाँ मुझे निभाना सीखना है।”
वो रुकी, फिर बोली, “मायके में माँ मेरे लिए हलवा बनाती है क्योंकि मैं उसकी बेटी हूँ। यहाँ आप मुझसे खीर बनवाती हैं क्योंकि मैं आपकी बहू हूँ। दोनों जगह प्यार है, बस रूप अलग है। एक ने मुझे उड़ना सिखाया, दूसरा मुझे घोंसला बनाना सिखा रहा है।”
सास कुछ देर चुप रही। फिर आँगन की तरफ देखकर बोली, “तेरे पिताजी ने वो नोट्स अच्छे संभालकर रखे। कल मैं भी तेरे लिए बेसन का हलवा बनवाऊँगी। ड्राई फ्रूट्स डालकर।”
उस दिन के बाद घर का माहौल बदल गया। ताने कम हो गए। सपना ने भी समझ लिया – तुलना करने से कोई नहीं जीतता। मायका जड़ है, ससुराल शाखा। पेड़ तभी हरा रहता है जब जड़ और शाखा दोनों को पानी मिले।
अब जब भी सपना मायके जाती, तो लौटते समय सास के लिए भी कुछ लेकर आती। और ससुराल में जब कोई त्योहार होता, तो माँ को फोन करके पूछती, “माँ, इस बार क्या बनाऊँ?”
क्योंकि रिश्ते न मायके से बड़े होते हैं, न ससुराल से। रिश्ते बड़े होते हैं उस समझ से, जिससे हम दोनों को अपना कह पाते हैं।
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Ranu Jain