परिवार मनुष्य की जिंदगी का वह मजबूत छत है,जिसके नीचे वह सुकून से रहता है। जिसे परिवार का सहयोग मिलता है,वह जिंदगी में असंभव को भी संभव बना लेता है। भोली-भाली राम्या की जिंदगी परिवार के सहयोग के कारण दूसरों के लिए उदाहरण बन गई।
राम्या की नौंवी की परीक्षा खत्म हो चुकी है।शाम के समय वह अपनी सहेलियों के साथ बातें करते हुए नदी किनारे टहल रही है। गाॅंव का हरियाली भरा सुरम्य वातावरण,घर लौटने को आतुर पक्षियों की चहचहाहट,डूबते हुए अस्ताचलगामी सूर्य को देखते -देखते राम्या को घर लौटने की याद आ जाती है।
शाम के समय सूर्य की सुरमई किरणें उसके साॅंवले-सलोने मुखड़े को अपनी आभा से प्रदीप्त कर रहीं हैं। राम्या दौड़कर घर आती है।उसे दौड़ते हुए देखकर उसकी माॅं उसे कहती है-“इतनी बड़ी हो गई हो, परन्तु अभी तक तुम्हारा बचपना नहीं गया है!”
राम्या इठलाकर झट से माॅं के गले में दोनों हाथ डालकर झूल जाती है।उसके पिता स्नेह-भरी दृष्टि से माॅं -बेटी का प्यार -मनुहार देखते हैं। राम्या एक छोटे से गाॅंव में अपने माता-पिता और चार भाई-बहनों के साथ रहती है।उसका रंग साॅंवला जरूर था, परन्तु उसकी बड़ी-बड़ी बोलती ऑंखें,मासूम चेहरा,घने काले लम्बे बाल उसके आकर्षण में चार चाॅंद लगाते।
उसके पिता की आर्थिक स्थिति कोई खास अच्छी नहीं थी, परन्तु परिवार में आपस में प्यार बहुत था।उसके पिता यथासंभव अपने बच्चों की अच्छी परवरिश का प्रयास करते।
राम्या के माता-पिता अब उसकी शादी के लिए चिंतित रहने लगें।एक तो गाॅंव में आगे की पढ़ाई की व्यवस्था नहीं थी,दूसरी बात उनके समाज में अभी भी कम उम्र में लड़कियों की शादी आम मानी जाती है।
कुछ समय बाद राम्या की शादी एक पुलिसकर्मी से हो गई,जो राम्या से दस साल बड़ा था। राम्या के माता-पिता सरकारी नौकरी वाले दामाद पाकर काफी खुश थे। ग्रामीण परिवेश में परवरिश और कमजोर आर्थिक स्थिति के कारण राम्या के दिल में भी न तो कोई ऊॅंचे ख्वाब थे,न ही ऑंखों में कोई सुनहले सपने।शादी के बाद पति रमण के साथ वह ससुराल आ गई।
ससुराल में भी राम्या को किस्मत से अच्छा परिवार मिला।उसे पति रमण में कभी अभिभावक नजर आता तो कभी प्रेम रस से सराबोर प्यार करनेवाला पति।उसका पति रमण था तो पुलिसकर्मी, परन्तु उसका दिल बहुत ही कोमल और सहृदय था।उसे कभी-कभी महसूस होता कि इतनी कम उम्र की लड़की से शादी कर शायद उसने उसके साथ अन्याय कर दिया हो।वह राम्या के प्रति सदैव संवेदनशील बना रहता।
ससुराल में पति के अलावे सास-ससुर का प्यार भी राम्या को भरपूर मिलता। सास-ससुर और पति की बेपनाह मोहब्बत से राम्या की जिंदगी सुवासित होने लगी। कभी-कभी राम्या के मन में पढ़ाई छूटने की टीस अवश्य उठती, परन्तु उसे वह मन में ही दबा लेती। राम्या ने अपने सद्व्यवहार से ससुराल में सबका दिल जीत लिया था। परिवार में भी सभी उसे प्यार और सम्मान देते।
राम्या की जिंदगी वक्त की गति के साथ बह रही थी।उसकी शादी को तीन वर्ष व्यतीत हो चुके थे।उस बीच राम्या एक बच्चे की माॅं भी बन चुकी थी, परन्तु कम उम्र के कारण उसका मातृत्व अधूरा ही रह गया।बच्चे ने जन्म के समय ही दम तोड़ दिया। अचानक से राम्या की हॅंसती-मुस्कराती जिंदगी में उदासी छा गई।वह बच्चे के वियोग में उदास रहने लगी।उसके सास-ससुर उसे दुख के महासागर से निकालने का प्रयास करतें। राम्या के चेहरे पर मौन अव्यक्त पीड़ा को देखकर रमण भी अधीर हो उठता।वह हमेशा उसे खुश रखने की कोशिश करता। कहते हैं कि वक्त बहुत बड़ा मलहम होता है।पति और सास-ससुर के सहयोग से राम्या धीरे-धीरे अपने दुख भूलने की कोशिश करने लगी।
कुछ समय बाद देश में 15 अगस्त आनेवाला था,इस कारण रमण रोज परेड रिहर्सल में जाता।रमण के रिहर्सल में जाते समय राम्या अपने हाथों से वर्दी देती। वर्दी से न जाने राम्या को कौन सा लगाव था कि वह रमण को वर्दी देते समय एक-दो बार उसे प्यार से जरूर सहलाती! रमण राम्या के वर्दी के प्रति प्रेम को देखकर मन-ही-मन अभिभूत हो उठता। गाॅंव की भोली-भाली राम्या को बाहरी दुनियाॅं की बहुत कम जानकारी थी।शहर में आकर अपनी जिज्ञासु प्रवृत्ति के कारण पति से प्रत्येक चीजों के बारे में पूछती।रमण भी बड़े प्यार से समझाते हुए उसके सवालों के जबाव देता।
एक दिन राम्या ने पति से कहा -“मुझे 15 अगस्त की परेड देखने की दिली ख्वाहिश है।मुझे दिखाने ले चलोगे?”
रमण ने खुशी से कहा -“क्यों नहीं?कल तुम तैयार होकर मेरे साथ चलना।”
अगले दिन राम्या पति के साथ
15अगस्त का परेड देखने गई। स्वतंत्रता दिवस का परेड देखकर राम्या अभिभूत हो उठी। वहाॅं का दृश्य उसे बड़ा ही मनमोहक और अद्भुत लगा।समारोह में बड़े-बड़े लोगों का शामिल होना, स्वतंत्रता सेनानियों को सलामी देना,तिरंगा फहराने के साथ ही सभी का खड़े होकर राष्ट्रीय गाना गाना इत्यादि दृश्य उसके रोम-रोम में रोमांच संचालित कर रहें थे।ये राम्या के जिंदगी के अद्भुत पल थे।उसे एहसास हो रहा था कि अब तक उसकी जिंदगी कुऍं के मेंढक के समान थी। यहाॅं उसे जिंदगी के नए रूप के दर्शन हुए।परेड से लौटते हुए राम्या ने उत्साहित होते हुए से पूछा-“कम उम्र की महिला,जो पुलिस ड्रेस में थी,उसे बड़ी उम्र के अधिकारी भी क्यों सलामी दे रहें थे?”
रमण ने उसे समझाते हुए कहा -“वह महिला आई पी एस अधिकारी थी,इसी कारण सभी उसे सलामी दे रहें थे।”
15अगस्त के भावपूर्ण दृश्यों और रमण की बातों से राम्या के दिल में अचानक से पढ़ने के सोऍं हुए अरमान जाग उठे।उसने रमण से कहा -“मैं भी आई पी एस अधिकारी बनूॅंगी!”
सुनकर रमण ने उसका माखौल उड़ाने की बजाय कहा -“देखो राम्या!तुम केवल नवीं ही पास हो।इसके लिए तुम्हें बहुत पढ़ाई करनी पड़ेगी।सबसे पहले तुम्हें ग्रेजुएशन की पढ़ाई करनी होगी,उसके बाद ही तुम यूपीएससी की परीक्षा दे सकती हो!”
राम्या के अंतस के पिंजड़े में बंद पढ़ाई की ख्वाहिशें जाग्रत हो चुकी थीं।उसने अपनी ऑंखों में चमक लाते हुए कहा -“मैं जरूर पढ़ूॅंगी,जरूर पढ़ूॅंगी!”
जब सास-ससुर और पति ने राम्या की पढ़ने की इच्छा जानी,तो उन्होंने उसे सहर्ष अनुमति दे दी।
अब राम्या की जिंदगी का मकसद बदल चुका था।जिन इच्छाओं को वह सदा के लिए मरा हुआ समझ रही थी,उन इच्छाओं के जागने से उसमें पढ़ने का जुनून छा गया।उसकी ऑंखें अर्जुन की भाॅंति अपने लक्ष्य पर केन्द्रित हो गईं।
परिवार और पति के सहयोग से देखते-देखते राम्या ने अपने जुनून से पहले दसवीं,इंटर और ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी कर ली।अब राम्या ने सिविल सर्विसेज की तैयारी शुरू कर दी।रमण समझ रहा था कि इस परीक्षा की तैयारी के लिए राम्या को बड़े शहर भेजना होगा। राम्या को रमण की आर्थिक स्थिति का एहसास था,इस कारण वह खामोश थी।रमण राम्या के सपने को पूरा करने के लिए दृढ़ संकल्प था।उसने राम्या को कोचिंग के लिए चेन्नई भेजने की पूरी तैयारी कर ली। राम्या पति और परिवार को छोड़कर अन्यत्र जाने को राजी नहीं थी।
रमण ने उसे समझाते हुए कहा -“राम्या! समझदारी और सामंजस्य से विषम परिस्थितियों पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है।तुम घर की चिंता मत करो।हम मिलकर सब सॅंभाल लेंगे।बस तुम लगन से परीक्षा की तैयारी करो।”
जाते समय राम्या ने पति के गले लगकर पूछा-“तुम कभी मुझपर शक तो नहीं करोगे?”
रमण उसे प्यार से कहता है-“राम्या!मुझे तुम पर पूरा विश्वास है। विवाह जैसी संस्था की जड़ें इतनी कमजोर नहीं कि छोटी-छोटी बातों से उसकी नींव हिल जाऍं। रिश्तों को सींचने के लिए एक-दूसरे के प्रति संवेदनशीलता काफी है!”
राम्या ऑंखों में उम्मीदों के सपने लिए चेन्नई पहुॅंच गई।वह एक लड़की कामिनी के साथ एक ही कमरे में रहने लगी। दोनों साथ-साथ कोचिंग सेंटर में जातीं और साथ ही परीक्षा की तैयारी करने लगीं।उसकी दोस्त कामिनी में आधुनिकता और शालीनता का अद्भुत सामंजस्य था।वह बहुत ही स्मार्ट और पढ़ने में होशियार थी।वह राम्या को पढ़ाई में पूरी मदद करती। राम्या को कामिनी से बहुत कुछ सीखने और समझने का अवसर मिलता। कभी-कभी राम्या अपनी ग्रामीण पृष्ठभूमि के कारण बहुत कुछ नहीं समझ पाती।हताश होकर कामिनी से कहती -“दोस्त!लगता है कि मुझसे ये नहीं हो पाएगा!”
कामिनी उसे समझाते हुए कहती -“राम्या! निराश होने से कुछ नहीं होगा। ग्रामीण पृष्ठभूमि से कोई अंतर नहीं पड़ता है। यूपीएससी की सफलता सिर्फ जुनून और कड़ी मेहनत पर निर्भर करती है।तुम व्यर्थ ही स्वयं को कमतर आंक रही हो।बस तुम्हें स्वयं पर भरोसा रखना है और कोशिश करना है!”
कामिनी की बातों से राम्या के दिल में नई ऊर्जा का संचार होता और वह जी-जान से परीक्षा की तैयारी में जुट जाती।पहले प्रयास में कामिनी और राम्या को असफलता हाथ लगी, परन्तु कामिनी ने न केवल खुद को सॅंभाला बल्कि राम्या का उत्साहवर्धन करते हुए कहा -“निराशा जैसी कोई बात नहीं है।हम पिछली गलतियों से सबक लेकर दुगुने उत्साह से तैयारी करेंगे!”
कामिनी तो संपन्न घराने की थी,इस कारण उसे पैसों की कोई चिन्ता नहीं थी, परन्तु राम्या को अपने पति के खर्चें की चिन्ता थी।रमण ने आकर उसे दिलासा देते हुए कहा -“तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है। मैं सब कुछ सॅंभाल रहा हूॅं।बस तुम अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करो।”
राम्या का दिल पति के प्रति श्रद्धा भाव से नत हो जाता।
रमण और कामिनी का सहारा पाकर उसका हौसला मजबूत हो गया ।
दूसरे प्रयास में उसे एक बार फिर से असफलता ही हाथ लगी, परन्तु उसकी दोस्त कामिनी सफल रही।इस बार की असफलता से राम्या हतोत्साहित हो उठी।उसने वापस घर लौटने का फैसला किया, परन्तु जाते समय कामिनी ने उसे समझाते हुए कहा -“काम्या!जब तक तुम्हें इस परीक्षा में सफलता न मिले,तब तक तुम हिम्मत नहीं हारता।बस मन में गाॅंठ बाॅंध लो कि कोशिश करनेवालों की हार नहीं होती! हौसलों से ही उड़ान होती है, पंखों से नहीं!”
एक बार फिर से कामिनी की बातें सुनकर राम्या के चेहरे पर मुस्कुराहट और ऑंखों में चमक आ गई।रमण भी अपने माता-पिता के साथ आकर राम्या का उत्साहवर्धन कर गया।ऐसे परिवार का सहारा पाकर राम्या एक बार फिर से पूरे दिन के साथ तैयारी में जुट गई।
इसे किस्मत कहें या कुछ कमी,तीसरी बार भी राम्या के हाथ असफलता ही लगी।इस बार की असफलता से राम्या उतनी अधिक निराश नहीं हुई,जितने उसके पति और सास-ससुर।हताश होकर रमण ने कहा-“राम्या!अब घर वापस लौट आओ।”
राम्या तीन बार की असफलता से इस बार निराश नहीं हुई थी, उसमें अभी भी पढ़ने का जुनून और जज्बा बरकरार था।उसने आत्मविश्वास भरे लहजे में कहा -“रमण!बस एक बार और मैं अंतिम प्रयास करना चाहती हूॅं।”
रमण ने उसकी भावनाओं की कद्र करते हुए कहा -“ठीक है!जैसा तुम ठीक समझो,वहीं करो।”
रमण जैसा सहयोगी पति पाकर राम्या खुद को धन्य समझती।
चौथी बार राम्या ने अपनी पिछली गलतियों पर बारीकियों से ध्यान देना शुरू किया। कहाॅं -कहाॅं उससे चूक हुई?उसका उसने गहरा मंथन किया। चौथी बार वह कोई कमी नहीं रखना चाहती थी। जहाॅं चाह, वहाॅं राह वाली कहावत उसके लिए चरितार्थ हुई।चौथे प्रयास में वह पूर्णतया संतुष्ट थी।अगले दिन उसका रिजल्ट आनेवाला था।उसके दिल में खलबली मची हुई थी।नींद उसकी ऑंखों से कोसों दूर थी।आधी रात बीत चुकी थी।बाहर बारिश हो रही थी। बादलों को चीरकर आती हुई ठंढ़ी हवा ने उसे कब नींद की आगोश में सुला दिया,उसे कुछ पता नहीं चला!
अगले दिन आखिर चिड़ियों की चहचहाहट और सुनहरी स्वर्ण रश्मियों के साथ सूरज का उदय हुआ।उस सुबह राम्या की वर्षों की मेहनत रंग लाई।उसने इस बार सफलता प्राप्त कर ली थी। राम्या के चारों ओर महकते हुए सुर्ख गुलाब खिल गए, जिन्हें वह अपनी काबिलियत से दुनियाॅं के समक्ष बिखेर देना चाहती थी।वह अपने सपनों को हकीकत में बदलकर काफी खुश थी।
रमण ने प्रसन्नता से उसे गले लगाते हुए कहा -“सच में!कौन कहता है कि आसमां में सुराख नहीं हो सकता,एक पत्थर तो तबीयत से उछालो दोस्तों!तुमने अपनी लगन और मेहनत के बल पर खुद को साबित कर ही दिया!”
राम्या ने भींगे नयनों से कहा -“रमण !अगर तुम्हारे जैसा पति और परिवार प्रत्येक औरत को मिल जाऍं,तो यूपीएससी क्या?वह दुनियाॅं जीत सकती है!बस उसे अवसर देने की देरी है!”
राम्या की ऑंखों से लगातार खुशी के ऑंसू बह रहें थे।उसकी दिशाहीन जिंदगी को एक नई दिशा मिल गई,मानो सागर ने नदी को आत्मसात कर लिया हो। परिवार के सहयोग से कच्ची उम्र के सींचे पौधों में नई कोपलें निकल गई हों।रमण ने राम्या का हाथ पकड़ते हुए कहा -“अब आगे की तैयारी के लिए घर चलें?”
राम्या मुस्कराकर उसके साथ कदम मिलाकर चलने लगी।
सचमुच सभी को राम्या जैसा परिवार नसीब हो।
समाप्त।
उपर्युक्त कहानी सत्य घटना से प्रेरित है।
लेखिका -डाॅ संजु झा (स्वरचित)