“बेटा,ले थोड़ा थोड़ा सरसों का साग अपने दोनों भाई भाभी को भी देकर आ।उन लोगों को मेरे हाथ का सरसों का साग बहुत पसंद है।”माँ की बात सुनकर नेहा को गुस्सा आ गया।बोली-“अब जब दोनों बहु बेटों ने अपनी अलग रसोई बना ली है तो फिर आप उनकी पसंद न पसंद का क्यों ख्याल रखती हो?
उनका खाने का मन होगा तो वो खुद बना लेंगे।”नेहा का इतना कहना ही था,कि उसकी मां रोने लगी।मां को रोता हुआ देख नेहा भी दुखी हो गई।वो बेचारी सर्दी में मां के पास आई थी,इसलिए मां ने सरसों का साग बनाया था।मां की बात रखने के लिए नेहा दो अलग-अलग बर्तनों में सरसों का साग लेकर ऊपर चली गई,जहां उसके दोनों भाइयों ने अपने-अपने अलग पोर्शन बना रखे थे।
सीढ़ियां चढ़ते हुए उसे वो दिन याद आ गए जब सब साथ रहते थे..सांझा चूल्हा था।रसोई में सब मिलजुलकर काम करते थे,मां सब्जी बनाती तो एक भाभी रोटी बेल देती दूसरी भाभी दूसरे छुट पुट काम कर लेती।शाम को दोनों भाई ऑफिस से आते तो सब मिलकर चाय पीते व रात का खाना सब रसोई में बैठकर खाते।
खाने के समय हंसी मजाक की बातें और विचारों का आदान प्रदान होता।सर्दी में तो मजे आ जाते सबकी मां के हाथ का बने सरसों का साग और मक्के की रोटी की डिमांड रहती थी।मां भी बड़े प्यार से सबको सरसों का साग और मक्के की रोटी बनाकर खिलाती थी।
नेहा छोटी थी इसलिए अपने भाइयों की लाडली थी बिना उसके कोई खाना नहीं खाता था।उसकी शादी के कुछ समय बाद ही दोनों भाइयों ने ऊपर अपने लिए अलग अलग पोर्शन बना लिए और उसकी मां नीचे अकेली रह गई क्योंकि उसके पिता का देहांत हो गया था।
दोनों भाभियों की रसोईयां अलग अलग हो गई थीं।सब अपने हिसाब से जो बनाना होता बना लेते।बच्चों के लिए आए दिन पिज्जा बर्गर बाजार से आ जाता था। संडे के दिन बाहर खाना खा लेते यानी सब अपनी अपनी दुनिया में मस्त थे।
नेहा को विश्वास था,कि मां के हाथों का बना साग देखकर दोनों भाई वैसे ही खुश हो जाएंगे जैसे पहले हुआ करते थे।ऊपर पहुंचकर उसने देखा कि दोनों भाई अपने-अपने परिवार के साथ भोजन कर रहे थे।भाभियों ने कई तरह के व्यंजन और गाजर का हलवा बनाया था पर किसी को उसकी व मां की याद नहीं आई।
नेहा ने मुस्कुराते हुए साग के बर्तन आगे बढ़ाए, लेकिन दोनों भाइयों ने बिना किसी विशेष उत्साह के कहा-“अभी तो बहुत कुछ बना हुआ है,रख दो… कल खा लेंगे।”उनके शब्द सुनकर नेहा का मन बुझ-सा गया।
वह चुपचाप साग भाभियों को देकर नीचे लौट आई। मां उसकी राह देख रही थी।उसने उत्सुकता से पूछा-“सब खुश हुए न साग देखकर?” नेहा ने हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर हिला दिया।वह मां की भावनाओं को आहत नहीं करना चाहती थी।
नीचे बैठी नेहा की नजर आंगन पर पड़ी…वही आंगन जहां कभी शाम ढलते ही चारपाइयां बिछ जाती थीं।पिता जी सबको अपने पास बैठाकर दिनभर की बातें करते थे।मां रसोई से चाय और पकौड़े लेकर आती थीं।बच्चों की किलकारियों से घर गूंज उठता था।किसी एक की खुशी पूरे परिवार की खुशी होती थी
और किसी एक का दुख सब मिलकर बांट लेते थे।लोहड़ी दीवाली और अन्य त्योहार पूरे परिवार के साथ मिलकर मनाए जाते थे।घर में रौनक रहती थी और हर कोना अपनत्व से भरा हुआ लगता था।अब तो रसोई भी अलग हो गई और त्योहार भी अलग हो गए।दिलों के बीच भी दूरियां आ गईं।
घर की दीवारें तो वही रहीं,पर रिश्तों की गर्माहट कम होती चली गई।सुविधाएं बढ़ गई थीं,घर पहले से अधिक सजा-संवरा दिखाई देता था लेकिन वह अपनापन कहीं खो गया था जो इस घर की सबसे बड़ी पहचान हुआ करता था।
अगले दिन जब नेहा विदा होने लगी तो मां ने उसके हाथ में शगुन और मिठाई का डब्बा देते हुए कहा-“बेटा,फिर जल्दी आना।तेरे पापा भी नहीं रहे अब अकेलापन काटने को दौड़ता है।
” नेहा ने मां को गले लगा लिया। उसकी आंखें नम थीं।गाड़ी में बैठते समय उसे महसूस हुआ कि उसे मायके की याद केवल इस घर की वजह से नहीं आती थी,बल्कि उस सांझे चूल्हे की वजह से आती थी जिसने पूरे परिवार को एक डोर में बांध रखा था।
नेहा सोचने लगी,कि परिवार केवल एक छत के नीचे रहने का नाम नहीं है। परिवार तो वह एहसास है जो एक-दूसरे के सुख-दुख में साथ खड़ा रहता है।परिवार की असली पहचान एक ही घर में रहने से नहीं, बल्कि एक-दूसरे के दिलों में बसने से होती है।सांझा चूल्हा केवल भोजन पकाने का साधन नहीं,वह रिश्तों को जोड़ने वाला वह धागा था
जिसमें प्रेम,अपनापन, त्याग और साथ होने का सुख पिरोया हुआ था।जब सब एक साथ बैठकर भोजन करते थे,तब केवल खाना ही नहीं खाया जाता था,बल्कि सुख-दुख,हंसी-खुशी और अपनापन भी बांटा जाता था।आज घर पहले से अधिक सुविधासंपन्न था,
लेकिन उस सांझेपन की गर्माहट कहीं खो गई थी।परिवार की सबसे बड़ी पूंजी धन या संपत्ति नहीं,बल्कि रिश्तों की निकटता और दिलों का जुड़ाव है।अलग रसोई होना गलत नहीं,लेकिन जब रिश्तों के बीच संवाद और अपनापन कम होने लगे तो दूरियां अपने आप बढ़ जाती हैं।
नेहा ने नम आंखों से घर की ओर देखा और मन ही मन प्रार्थना की,कि एक दिन इस घर में फिर वही हंसी गूंजे,वही अपनापन लौटे और रिश्तों के बीच की दूरियां मिट जाएं।क्योंकि घर दीवारों से नहीं,बल्कि प्रेम से जुड़े दिलों से बनता है,और यही किसी भी परिवार की सबसे बड़ी ताकत और सबसे सुंदर पहचान होती है।
कमलेश आहूजा