*परिवार* – तोषिका

“ये घर, घर नहीं जेल लगता है और अगर मैं इस घर में थोड़ी देर और रही तो पता नहीं क्या हो जाएगा।” गुस्से में बिलबिलाती रिया बोली।

तभी उसके ये शब्द सुनकर उसका पति कृष बोला “ये तुम क्या कह रही हो, ये घर तुम्हे जेल कब से लगने लगा?”

“जब से इस घर में शादी कर के आई हू, तब से। जब देखलो यही सुनती रहती हू, ये मत करो, वो मत करो। ऐसा नहीं करते। ये सब सुन सुन कर मैं थक चुकी हू।” अपने पति कृष की तरफ देखती हुई गुस्से में रिया बोली।

कृष ने रिया की तरफ देखा और फिर  बोला “तुम जिनके बारे में बोल रही हो, जानती भी हो उन्होंने मेरे लिए क्या क्या किया है, जैसा उनका नाम है उससे भी बढ़कर उनके काम है।”

कृष ने रिया को सारी बातें बताना शुरू किया जब वो पहली बार राम से मिला था जिन्होंने उसका बिल्कुल अपने बच्चे की तरह ध्यान रखा था।

*कई साल पहले*

“कितने साल के हो तुम और क्या नाम है तुम्हारा?” राम ने एक लड़के से पूछा, जो उसके घर पर काम करने के लिए आया था।

लड़का बोला “साब मेरा नाम कृष है और मैं 10 साल का हू और मैं यहां अपने पिताजी के बदले काम करने आया हू।”

राम ने पूछा “क्या हुआ तुम्हारे पिताजी को?”

कृष बिना हिचकिचाते हुए बोला “मेरे पिताजी सीढ़ियों से गिर गए है, तो उनके सर पर गहरी चोट आई है, इसीलिये वो कुछ समय के लिए काम नहीं कर सकते है।”

अपनी बात को पूरी करते हुए कृष ने बोला कि उसके *परिवार* में आर्थिक तंगी के कारण उसको ये काम करना पड़ेगा।

राम ने उस से उसकी पढ़ाई का पूछा तो उसने कहा कि लोगों के घर काम करने के चक्कर में वो स्कूल भी नहीं जा पा रहा है।

थोड़ी देर तक सोच विचार करने के बाद राम ने कृष को बोला “तुम्हे कल से हमारे घर आने की कोई जरूरत नहीं है।”

कृष एक दम से घबरा गया, उसको लगा कि उसके पिताजी की नौकरी हाथ से जा रही है जिसके चलते उसने बोला “साब ऐसा मत कीजिए, मैं मन लगा कर  काम करुंगा।”

राम उसकी बात को काटते हुए बोला “तुम मुझे गलत समझ रहे हो, मेरे कहने का ये तात्पर्य था कि तुम कल से स्कूल जाओगे और काम की फिक्र करे बिना मन लगा कर पढ़ोगे। अगर बात पैसों की है तो उसकी फिक्र भी मत करो तुम्हारे पिताजी का इलाज और तुम्हारे स्कूल की फीस मैं संभाल लूंगा।”

कृष की आँखें भर आई, जो किसी को नहीं दिखा था वो राम को दिख गया था। कृष की आँखो में पढ़ने की चमक, कुछ कर दिखाने का जुनून सब दिख गया था।

कृष ने राम का धन्यवाद किया और खुश होकर राम का आशीर्वाद भी लिया।

कृष की पढ़ाई में राम ने कभी भी ढील नहीं दी और उसको भी वैसे ही दांत पड़ती थी जैसे राम अपने खुद के बच्चों को डांटता था।

कृष के पिताजी भी ठीक होने लगे थे पर भगवान की शायद कोई और मर्जी थी कि कुछ सालों में हार्ट अटैक के चलते कृष के पिताजी का देहांत हो गया और वो अनाथ हो गया।

तब राम आगे आए और उन्होंने कानूनी तौर पर कृष को गोद ले लिया।

महीने साल में बीत गए और अब कृष के लिए राम ही पिता और भगवान समान थे।

फिर मेरी तुमसे शादी हुई और तुम्हे पता है जब मैं पूछा कि मेरी शादी तुमसे क्यों तो पता है क्या जवाब था, वो बोले “लड़की दिल की साफ है और आज कल के ज़माने में ऐसे साफ और अच्छे दिल वाले नहीं मिलते।”

और एक तरफ तुम हो रिया, उनकी सारी बातें तुम्हारे भले के लिए ही होती है, बस तुम थोड़ी आज़ाद रही इसीलिये तुम्हे लगता है तुम जेल में हो पर एक बार तुम उनको अपना परिवार तो मानो, तुम देखना तुम्हे ये घर जेल नहीं लगेगा।

ये सब बोल कर कृष वहां से चला गया और उधर रिया भी कृष की सारी बातों में खो सी गई थी।

अगले दिन वो सुबह जल्दी उठी और सारा काम वैसे ही किया जैसे राम को पसंद था और उधर राम ने रिया को बोला “बेटा ये कुछ पैसे रख लो तुम काफी समय से बाहर भी घूमने नहीं गई हो, सारा दिन काम करती रहती हो।”

रिया ने जैसे ही ये सुना, उसको अपने बोले हुए शब्दों पर बहुत पछतावा हुआ और राम को वो बोली “पापा, क्या आप भी साथ चलेंगे बाहर?”

राम मना करने ही वाला था कि रिया एक दम से बोली “प्लीज पापा, मना मत करिएगा।”

राम ने भी हार मानते हुए बोला “ठीक है बेटा।”

कृष भी घर में इस नए महौल को देख कर बहुत खुश हुआ और अब वो घर घर नहीं बल्कि एक हंसता खेलता परिवार लगता है।

लेखिका

तोषिका

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