परिवार – गीता अस्थाना

विवाहोत्सव समाप्त हुए एक महीना बीत चुका था। मेहमान तो विवाह संपन्न होने के तुरंत बाद ही चले गए थे। घर के आत्मीय सदस्य भी परिवार सहित धीरे धीरे अपने अपने कार्यस्थल पर चले गए। नई नवेली होने के बावजूद नमिता काफी व्यस्त रही। सबके जाने के बाद नमिता को कुछ सुकून महसूस हुआ।

उसके हाथों की मेंहदी अभी भी चटक थी।नई दुल्हन की वेशभूषा नमिता के सौंदर्य को और भी बढ़ा रही थी। सात फेरे लगाते हुए पंडित जी ने जो जो वचन बुलवाए थे, वह सब निभाने की पूरी कोशिश कर रही थी। पति गृह आने के एक हफ्ते बाद ही सासू मां ने रसोई छुआने की रश्म करवा दिया। उस दिन नमिता ने खीर बनाई। सभी ने बड़े चाव से खाया और तारीफ़ किया- ‘ बहू ने बड़ी स्वादिष्ट खीर बनाई है।बहू के हाथ में बरकत रहे।’ कहकर सभी ने आशीर्वाद दिया। दूसरे दिन से ही नमिता रसोईयें के साथ किचन में लगने लगी। वह सोचती थी कि जो भी बने,सबकी पसंद का और स्वादिष्ट बने। वह अपने पति गृह, जो अब उसका भी है, कोई बुराई नहीं आने देना चाहती थी। इसीलिए सुबह-शाम किचन में लग जाती थी।

सबके चले जाने के बाद नमिता ने थोड़ी राहत की सांस ली। मन ही मन सोचने लगी – अब केवल तीन प्राणियों का परिवार है। पति नरेंद्र, सासू मां और वह स्वयं। तीन लोगों में कितना काम ही रहेगा। सब अच्छे से निपट जाएगा और वह अपनी एम सी ए की पढ़ाई भी कर लेगी।

विवाह पूर्व जब नरेंद्र उससे मिलने गए थे,तब नमिता ने अपने पढ़ने की इच्छा व्यक्त की थी। नरेंद्र ने हामी भरते हुए कहा था – हां ! क्यों नहीं। जितना चाहो पढ़ाई कर सकती हो, कोई बंधन या रोक-टोक नहीं होगा। मुझे विश्वास है कि मां भी मना नहीं करेंगी। नमिता के हृदय में आशा की किरण फ़ैल गई थी।

आज सुबह नमिता बड़े निश्चिंत भाव से उठकर बिस्तर पर ही एक अंगड़ाई ली। फिर वाशरुम जाकर मुख प्रक्षालन कर बालों का जूड़ा बनाया और किचन में जाकर सबके लिए चाय बनाई। सासू मां को चाय देने के लिए उनके बेडरूम में गई। वो वहां नहीं थीं। फिर उसने देखा कि बाहर का दरवाजा खुला है। जाकर देखा – सासू मां लान में बैठीं पेपर पढ़ रही थीं। चाय का प्याला टेबल पर रखा और उनके पैर छुए। इतने दिनों में नमिता ने इस परिवार की कुछ गतिविधियों को तो समझ लिया था, परंतु अभी भी बहुत कुछ समझना शेष था।

फिर उसने नरेंद्र को चाय दिया। नरेंद्र बिस्तर पर ही चाय का प्याला होंठों से लगाने जा ही रहे थे कि नमिता ने यह कहते हुए रोक दिया कि मां बाहर लान में बैठीं हैं।आप भी वहीं चलिए और चाय पीजिए। नरेंद्र  बिना कोई प्रश्न किए लान में आकर मां के बगल की चेयर पर बैठ गए। मां की नज़र नरेंद्र पर पड़ी -” अरे! आज कहां से सूरज निकला जो इतनी जल्दी उठ गया”। “हां,ये नमिता चाय लेकर सिर पर खड़ी हो गई, तो मुझे उठना ही पड़ा और यहां आने के लिए इसी ने आग्रह किया।” कुछ देर चुप रहकर फिर बोले – “अभी नई नई है न, यहां के तौर-तरीके जानती नहीं। इसीलिए मैंने अभी कुछ कहा नहीं” ” कहना भी नहीं आज या कभी। आज जो उसने किया, बहुत अच्छा किया। एकसाथ बैठकर खाना पीना, बातचीत करना, जितना अपनत्व और सुकून देता है, वह अकेले में है क्या? ” फिर उन्होंने नमिता को आवाज लगाई – ” बेटा नमिता कहां रह गई” । मां की आवाज सुनकर नमिता तेज़ क़दमों से बाहर आई। उसे देखकर उन्होंने कहा ” तुम भी अपनी चाय लेकर यहीं आ जाओ। आज से साथ बैठकर चाय पीएंगे और साथ में ही खाना भी खाएंगे” । लान में फुदकते चहचहाते पक्षियों को देखकर मां जैसे आंतरिक आनंद से अभिभूत होती हुई बोलीं – ” इन पक्षियों को देखो। अपने समुदाय के साथ कितने आनंदित दिख रहे हैं। अगर कोई एक अकेला होता, तो क्या प्रसन्न दिखाई देता?”

मां की बातें नरेंद्र के हृदय में तीर सी चुभ गईं । कितनी बार जगाती थीं कि बेटा उठो, बेटा उठो, लेकिन  उठने का नाम नहीं। देर से उठना और जल्दी जल्दी तैयार होकर आफिस चले जाना। बचपन में तो पकड़ कर उससे सारे काम करवा लेती थीं। परंतु किशोरावस्था से यही ढर्रा चलने लगा।

ऐसा नहीं था कि वह मां का अनादर करता था। मां का बहुत ध्यान रखता था। मां ने खाना खाया कि नहीं, तबियत तो ठीक है न, ब्लडप्रेशर की दवा ली कि नहीं, वगैरह वगैरह। बस युवावस्था का अल्हड़पन और प्रेम प्रकट करने का तरीका नहीं था।

दिन महीने बीतते गए। वह समय भी आ गया जब नमिता को एम. सी. ए. का फार्म भरना था। उसने नरेंद्र से कहा – ” आप मां से मेरी पढ़ाई के विषय में बात कीजिए। फार्म भरने का समय आ गया है।डेट निकल जाएगी तो मेरा साल बर्बाद हो जाएगा “। नरेंद्र ने चुहलबाज़ी करते हुए कहा -” मैं क्यों बात करुं। फार्म तुम्हें भरना है तुम पूछो ” नमिता ने फिर कहा – ” आपने तो कहा था कि कोई विरोध नहीं होगा ” “हां, तो मैं कहां विरोध कर रहा हूं। मैं तो राज़ी हूं। अब मां की बात मां जाने और तुम जानो ” । नमिता का चेहरा उतर गया। चेहरे पर असमंजस और उदासी झलक आई। नरेंद्र ने उसे देखा तो प्यार से बोले – ” मां से तुम बात करो। उन्हें प्रसन्नता होगी कि बड़े विश्वास से तुम स्वयं उनसे पूछ रही हो। मेरे माध्यम से पूछना दूरी पैदा करने के समान होगा।

संकोचवश उस दिन उसने मां से नहीं पूछा। शाम को नरेंद्र के पूछने पर कि बात किया, उसने इशारे से ‘न’ में गर्दन हिलाई।

दूसरे दिन रविवार था। नरेंद्र का अवकाश था। सब लोग नाश्ते के समय टेबल पर बैठे हुए थे। उसी समय नमिता ने बड़े संकोच से मां से कहा – ” मां मैं आपसे कुछ पूछना चाहती हूं”। ” हां बोलो, क्या पूछना चाहती हो” ” मैं एम सी ए करना चाहती हूं। उसका फार्म भरा जा रहा है। क्या मैं फार्म भर सकती हूं”। ” एम सी ए करना चाहती हो तो फार्म भरना ही पड़ेगा। ज़रुर भरो, यह जानकर मैं खुश हूं कि तुम जीवन में आगे बढ़ना और कुछ करना चाहती हो। तुम ऊंचाई पर उठोगी तो अपने माता-पिता के साथ मेरा भी सर ऊंचा होगा” । मां की स्वीकृति से नमिता का चेहरा खुशी से रक्तिम हो उठा। पुनः उसने कहा – ” मां फिर घर का काम ——।”  “उसकी चिंता मत कर। सुविधानुसार कुछ तुम कर लेना, कुछ मैं कर लूंगी। सब हो जाएगा” । अंत में नरेंद्र चहकते हुए बोले – ” देखा, मां ने तुरंत स्वीकृति दे दी। डर रही थी मां”। 

मां ने नरेंद्र से कहा – ” तुमने तो साथ नहीं दिया उसका। अब सुन लो, जो काम मैं नहीं कर पाऊंगी, वह तुम्हें करना होगा” । नरेंद्र ने ऊं हुं कहते हुए मुंह बनाया। मां ने पुनः कहा – ” परिवार ऐसे ही चलता है बेटा, एक दूसरे की इच्छाओं को जानना, समझना और ज़रूरत पर मदद करना। वही परिवार सुखी और संपन्न रहता है जहां सब मिलकर रहते हैं ” ।

सभी के चेहरे पर खुशी और मुस्कान की रेखाएं खिंच गईं । नमिता के हृदय में प्रसन्नता जैसे द्विगुणित हो गई। शरारती नज़रों से उसने नरेंद्र की ओर देखा और कुछ लाने किचन में चली गई।

स्वलिखित मौलिक   (सर्वाधिकार सुरक्षित)

गीता अस्थाना,

बंगलुरू, कर्नाटका।

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