परिवार – खुशी

रजत का परिवार बहुत बड़ा था।दो ताया,चाचा बुआ दादा दादी सब एक साथ रहते थे।मिलजुल कर काम करना घूमना फिरना सब जुड़े रहते।रजत के दादाजी दीनानाथ एक सरकारी मुलाजिम थे उनकी पत्नी रत्ना एक सम्पन्न परिवार की लड़की थी।बस दीनानाथ की सरकारी नौकरी और शराफत देख उनका विवाह हो गया।फिर उनके 8 बच्चे हुए ।

सबसे बड़ी शीला बुआ थी जिनकी शादी रवि जी से हुई दोनो सरकारी मुलाजिम थे।दोनो की नौकरी लखनऊ में थी।उससे छोटे भाई रमेश और सुरेश दोनों की किराने की दुकान थी।उससे छोटा राम डॉक्टर था।उससे छोटे दिनेश यानि रजत के पापा दुकान पर भी काम करते घर में भी करते पर तब भी उन्हें निठला ही कहा जाता।

उससे छोटी सुशीला बैंक में थी और उसके पति अशोक CBI में थे सबसे छोटा मयंक भी बैंक में था। तभी रत्ना का देहांत हो गया।सारी बागडोर  बहुओं पर आ गई।सुरेश रमेश की पत्नियां सुमन और विजया घर से खाने का काम भी करती थी।राम के लिए नर्स पत्नी देखी गई रजनी जो कोई काम नहीं करती थी।

सिर्फ हॉस्पिटल,घर अपना पति उसका क्लीनिक ये उसकी दुनिया थी। रजत की मां पूनम का हाल सबसे खराब था वो घर का काम भी करती सब कुछ संभालती ।देवरानी जेठानी बाहर जाती तो उनके बच्चे भी देखना।पर कोई इज्जत नहीं पति की कोई अपनी आमदनी नहीं थी इसलिए वो तीनों पूनम का मज़ाक़ भी बनाती।

एक बार उनके परिवार में शादी थी।सारा परिवार गया।सिर्फ रजत पूनम और दिनेश को छोड़। पूनम बहुत रोई बोली तुम कुछ ढंग का काम करते होते तो आज हम अभावों में ना जीते हमारी कोई इज्जत नहीं है।सब नौकर समझते हैं।सब बैठ के आराम से पंखे कूलर में खाते हैं हम अपने कमरे में गर्मी में अब मै यहां नहीं रहूंगी।

मैने स्कूल में नौकरी ढूंढ ली है।वही एक कमरा भी देखा है हम वहां रहेंगे और तुम जब कोई काम ढूंढ लो तभी शक्ल दिखाना ।पूनम ने अपना और रजत का सामान भरा और जो उसे शादी में बर्तन वगैरह मिले थे वो उसने ले लिए और अगले दिन सुबह वो घर छोड़ कर चली गई।

दिनेश रोकता रहा पर पूनम नहीं रुकी। पूनम ने स्कूल में नौकरी कर ली।जिस घर में रहने गई।वहां एक कमरा था जिसमें उसने टेबल लगा कर स्टोव रख दिया वो स्कूल में पढ़।ती,ट्यूशन पढ़ाती और उसके।पड़ोस में दो लड़के रहते थे जो बैंक में नौकरी करते थे उनका टिफिन भी बनाती। इस तरह वो अपना और रजत का गुजारा चल रहा था।बीच बीच में दिनेश भी आता अब उसे पूनम की बात सही लग रही थी।

ससुर दीना नाथ भी आए थे वापस ले जाने पर पूनम की जिद देख वो भी चुप हो गए।पूनम हर इतवार अपने ससुराल जाती थी मिलने के लिए पर उसकी जिद ने लोगों का नजरिया बदल दिया था।राम की पत्नी भी लड़ झगड़ कर अलग हो गई थी।उसे लगता था सारा परिवार मेरे पति के पैसों पर ऐश करता है।

सबसे छोटे मयंक की शादी तय हो गई ज्योति से जो किसी ऑफिस में रिसेप्शनिस्ट का काम करती थी।वो भी जुबान की तेज थी इसलिए वो भी 6 महीने में अलग हो गई।अब बच्चे बड़े हो रहे थे तो घर छोटा पड़ता था इसलिए रमेश ने भी दूसरा घर ले लिया जबकि रमेश की वहां से जाने की इच्छा नहीं थी परंतु सुरेश की पत्नी ने घर खाली नहीं किया।

ससुरजी का वास्ता ये वो बाते बना वो वही रही।इस तरह सबका अलग अलग घर बस गया।दिनेश भी वहां से बंबई चला गया।उससे दमन में दवाई की कंपनी में नौकरी लग गई।वहां स्मगलिंग का भी खुब सामान आता था।जिससे कुछ दिनों में उसने अच्छा पैसा बना लिया।

और रजत के नाम वो पैसा भेजने लगा।कुछ दिनों में उनकी माली हालत सुधार गई।बेटे को अच्छा पढ़ाया लिखाया सोना जोड़ लिया।एक घर खरीद लिया।भाइयों को और पिताजी को लगता कही गलत राह पर तो नहीं है।परंतु दिनेश कहता नहीं पिताजी मेहनत का है।

घर परिवार में बड़े बच्चों की शादियां हो गई। और इसी बीच दीनानाथ जी भी दुनिया को अलविदा कह गए।रजत का कॉलेज का आखिरी साल था कि एक दिन सुबह सुबह दिनेश आया उसे बहुत तेज बुखार था।उसे हॉस्पिटल एडमिट करवाया गया वहां टेस्ट में उसे टाइफाइड निकला।

पर दिन पर दिन उसकी सेहत गिर रही थी।राम ने उसे अपने अस्पताल में एडमिट करवाया और सारे टेस्ट हुए उसमें पता चला कि दिनेश को एड्स हो गया है सारा परिवार सकते में था।ज्योति ने तो इतना उल्टा सीधा बोला इस आदमी से दूर रहो ।हमारे बच्चों को और हमे भी हो सकता हैं।मयंक और उसकी मां पूनम घर बाहर सब संभाल रहे थे।पैसा पानी की तरह खर्च हो रहा था।

3 महीने के दर्द के बाद आखिर दिनेश की मृत्यु हो गई।सारा परिवार आया पर पूनम के मन में उन किसी के लिए कोई भाव नहीं था क्योंकि उसके मुश्किल वक़्त में सबने पल्ला झाड़ लिया था आज दुनिया दिखावे के लिए सब आए।पूनम और रजत दोनों ने काफी मेहनत की और आज रजत की बहुत बड़ी कंपनी में नौकरी लग गई।

पहली पीढ़ी से दोनों ताऊ,बड़ी बुआ दादा जी गुजर चुके थे।पर दूसरी पीढ़ी में सभी भाइयों में आपस में प्यार था।इसलिए रजत अपने परिवार से जुड़ा रहा और एक दूसरे के सुख दुख में वो साथ खड़े रहे।पूनम कहती भी कि बेटा इन्होंने हमारा साथ नहीं दिया तो रजत कहता मां वो सोच और परिस्थितियों का फर्क था। आज हम सक्षम हैं

तो क्यों ना मिलकर चले और रहे।अकेले तो कोई काम नहीं आता पर जब हम जुड़े होते है तो सब मदद के लिए आते हैं। इसलिए परिवार से बना कर चलना चाहिए। मा देखो अगर राम काका आगे नहीं आए होते तो क्या पापा को अच्छा ट्रीटमेंट मिलता। इसलिए सब भूलने की कोशिश करो।

पूनम अपने बेटे की सोच पर हैरान थी इतना सा लड़का परिवार की अहमियत समझ रहा है और हम एक साथ रहते हुए भी वो अहमियत नहीं समझ पाये थे।

स्वरचित कहानी 

आपकी सखी 

खुशी

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