कमरें में धीमी रौशनी जल रही थी। सन्नाटा चारों ओर पसरा हुआ था, सांसो की आवाजाही भी कानों में साफ – साफ सुनाई दे रही। बिस्तर पर लेटी करुणा जी छत को अपलक निहार रहीं थीं, जैसे कुछ प्रश्नों के जबाब को तलाश रहीं हों। अतीत की यादों ने उन्हें झकझोर दिया था और आंखों से नींद गायब सी हो गई थी लेकिन वो मुस्कुरा रहीं थीं क्योंकि ये घर लोगों की मौजूदगी से रौशन हुआ करता था और आंगन में बैठकर सभी का घंटों गप्पे लड़ाना और हंसी – ठिठोली से इस घर के हर कोनों में जान डाल देता था।
कितनी मेहनत से ख्वाबों का महल हकीकत में बनवाया था रमेश जी ने । सिर पर कलश लेकर जब करूणा जी ने गृह प्रवेश किया था तो इतराने लगीं थीं अपने भाग्य पर की ईश्वर ने उनके परिवार को महफूज रखने के लिए एक छत नवाजा है।पूरा परिवार बहुत खुश था,अपना घर जो था । इसी घर में दिशा और रोहन का बचपन बिता था और सबने मिलकर ढेर सारी खुशियां और खूबसूरत पल यहां गुजारे थे।
बच्चों ने बहुत सारी कामयाबी हासिल की थी और यहां की दीवारें भी प्रमाण दे रहीं थीं। बच्चे बड़े होते चले गए और घर में धीरे-धीरे खामोशी दस्तक देने लगी। बच्चों ने कामयाबी की सीढ़ियां क्या चढ़ाना शुरू किया पीछे मुड़कर देखा ही नहीं। अब घर में पति-पत्नी ही बचे थे। उम्र के साथ बातचीत भी कम होने लगी थी। रमेश जी अपने पेपर और टीवी की दुनिया में वक्त बिताने लगे और करुणा जी वही पुरानी दिनचर्या में।
औरतों को जीते जी कब गृहस्थी से मुक्ति मिलती है। अब ईंटों से और चारदीवारी से बना घर ही बचा था क्योंकि सब अपनी जिंदगी में व्यस्त और मस्त रहने लगे थे ,ना वो आवाजें थीं जो दीवारों से टकरा कर वापस आएं और ना वो हंसी जो आंगन के रास्ते छतों तक जाती थी।
रमेश जी चश्मा उतारते हुए कमरे में आए तो करुणा जी की यादों को विराम लग गया और करवट पलटते हुए बोलीं,” दवाइयां ले ली अपने? इतनी देर तक टीवी नहीं देखा करिए आंखों पर जोर पड़ता है।”
हां!” सही कहा… क्या करूं? वक्त काटे नहीं कटता है।जब वक्त चाहिए था तुम सब के साथ बिताने के लिए तब व्यस्तता बहुत थी और आज समय ही समय है तो हम तुम ही रह गए इस घर में।घर ‘ईंटों से नहीं दिलों से बनता है ‘।
जब तक अपनों का साथ ना हो तो घर, घर नहीं कैदखाना बन जाता है, जहां हम दोनों सिर्फ अब यहां से रुखसत होने का बस इंतजार कर रहें हों जैसे।”
” सुनिए एक बात मन में आई है क्यों ना हम अपनी जिंदगी जी भर कर जीएं।”
” क्या कहना चाहती हो मैं कुछ समझा नहीं?” रमेश जी ने पलट कर देखा।”हम दोनों ने अपनी जिंदगी में बहुत कुछ छोड़ दिया कभी वक्त की पाबंदी तो कभी जिम्मेदारियों का बोझ। अभी तो सेहत ठीक ठाक है और ईश्वर की कृपा से हम दोनों का साथ भी है तो हम लोग भी कहीं घूमने चलें और छुटि्टयों में बच्चों को भी बुलाएं। सन्नाटे को अब चीरते हुए इस घर में खुशियां फिर से बिखेरते हैं।कल का क्या पता?”” सही कह रही हो”, दोनों सो जाते हैं।
आने वाली सुबह की किरणों ने फिर से घर के हर कोनों को रौशनी से भर दिया था और ये रौशनी उम्मीदों की वो दस्तक थी जिसने मन को उत्साह और उमंग भर दिया था उन दो लोगों के घर में और जीवन में ,जो अपनी – अपनी खामोशी के साथ एक छत के नीचे रह तो रहे थे पर कुछ अधूरेपन के साथ।आज दीवारों और छतों पर भी सन्नाटा सा नहीं लग रहा था क्योंकि अब नजर तो वही था बस नजरिया बदलने लगा था। रमेश जी और करूणा जी खुशियों की तलाश बाहर नहीं कर रहे थे बल्कि अपने अंदर ढूंढ चुके थे। सही मायने में घर में अब फिर से जान आ गई थी।
प्रतिमा श्रीवास्तव
नोएडा