रिश्तों की असली वसीयत

शहनाई की गूंज और गेंदे के फूलों की महक से पूरा घर महक रहा था। घर के आंगन में शामियाना लगा हुआ था और मेहमानों की चहल-पहल से एक उत्सव का माहौल बना हुआ था। आज कावेरी जी की इकलौती बेटी शिखा की हल्दी की रस्म थी। कावेरी जी अपने माथे का पसीना पोंछते हुए

रसोई और आंगन के बीच चक्कर काट रही थीं। तभी मुख्य द्वार से उनकी देवरानी, रंजना अपनी रेशमी कांजीवरम साड़ी को संभालते हुए दाखिल हुईं। रंजना के आते ही जैसे घर की औरतों का ध्यान उनकी चमकती ज्वेलरी और उनके नखरों पर चला गया।

रंजना हमेशा से ही दिखावे और हैसियत को रिश्तों का पैमाना मानती आई थीं। वे आकर सीधे आंगन में बिछे बड़े से तख्त पर बैठ गईं, जहाँ घर की अन्य बुज़ुर्ग औरतें और रिश्तेदार बैठे थे। कावेरी जी की बड़ी बहू, मीनल, जो एक बेहद शांत और संस्कारी लड़की थी, सबके लिए चाय और नाश्ता लेकर आई।

मीनल के माता-पिता एक साधारण मध्यवर्गीय परिवार से थे, और जब मीनल इस घर में ब्याह कर आई थी, तब भी रंजना ने उसके परिवार के दिए गए दहेज को लेकर खूब ताने कसे थे।

चाय का कप उठाते हुए रंजना ने अपनी भारी सोने की चूड़ियों को खनकाया और एक तिरछी नज़र मीनल पर डालते हुए कावेरी जी से कहने लगीं, “दीदी, आप भी न, दुनियादारी बिल्कुल नहीं समझतीं। मैंने तो आपको पहले ही समझाया था कि रिश्ते हमेशा अपनी बराबरी वालों में किए जाते हैं।

पर आप कहाँ किसी की सुनती हैं। बेटे के लिए तो एक साधारण से परिवार की बहू ले ही आईं, और अब अपनी इकलौती बेटी शिखा को भी अपने से कम हैसियत वाले परिवार में ब्याह रही हैं।”

कावेरी जी ने बात को टालने की कोशिश करते हुए कहा, “रंजना, हैसियत पैसों से नहीं, इंसानों के स्वभाव और उनके संस्कारों से होती है। शिखा के लिए मुझे लड़के वालों में जो शालीनता दिखी, वो किसी दौलत से कम नहीं है।”

पर रंजना कहाँ चुप रहने वाली थीं। उन्होंने आस-पास बैठी औरतों को सुनाते हुए अपनी आवाज़ थोड़ी और ऊँची की, “अरे दीदी, कैसी शालीनता? कल सगाई में उन्होंने शिखा को दिया ही क्या? बस दो-चार साड़ियाँ और एक हल्की सी सोने की अंगूठी। और तो और, आपकी बहू मीनल के मायके वालों को देखिए। ननद की शादी है, और शगुन के नाम पर केवल चांदी की एक पायल और इक्यावन सौ रुपये का लिफाफा थमा दिया।

ये कोई बात हुई भला? आज के ज़माने में कम से कम सोने का एक पेंडेंट तो देना ही चाहिए था। अब मुझे ही देख लीजिए, अपनी इकलौती भतीजी और होने वाले दामाद के लिए पूरे पांच तोले की सोने की चेन लेकर आई हूँ।” रंजना ने इठलाते हुए अपने पर्स से एक मखमली डिब्बी निकाली और सबको दिखाने लगीं।

यह सब सुनकर मीनल का चेहरा उतर गया। उसकी आँखें डबडबा आईं। वह बिना कुछ कहे चुपचाप वहाँ से रसोई में चली गई। कावेरी जी के दिल में भी देवरानी के ये शब्द तीर की तरह चुभे, लेकिन घर में शादी का माहौल था, इसलिए उन्होंने खून का घूंट पीकर रह जाना ही बेहतर समझा।

रसोई में जाकर कावेरी जी ने देखा कि मीनल स्लैब के पास खड़ी होकर चुपचाप आंसू पोंछ रही है। कावेरी जी ने आगे बढ़कर अपनी बहू के सिर पर हाथ रखा। मीनल फफक कर रो पड़ी और बोली, “माँ जी, चाची जी सच ही तो कह रही हैं। मेरे पापा ने अपनी हैसियत से बढ़कर शगुन दिया है, लेकिन फिर भी इस घर के हिसाब से वो बहुत कम है। मुझे शिखा के लिए बहुत बुरा लग रहा है कि मेरे मायके वाले उसे कोई बड़ा तोहफा नहीं दे पाए।”

कावेरी जी ने प्यार से मीनल के आंसू पोंछते हुए कहा, “पगली, तू क्यों इन बातों को दिल पर ले रही है? रंजना का तो काम ही है हर चीज़ को पैसों के तराज़ू में तौलना। तेरे माता-पिता ने मुझे जो सबसे कीमती तोहफा दिया है, वो तू है। जब से तू इस घर में आई है, तूने अपनी समझदारी और प्यार से इस घर को स्वर्ग बना दिया है। क्या सोने के कंगन उस सेवा और सम्मान की बराबरी कर सकते हैं जो तू मुझे और शिखा को देती है? और शिखा के ससुराल वालों की बात करूँ, तो उन्होंने कभी हमसे एक रुपये की मांग नहीं की। आज के ज़माने में बिना लालच का परिवार मिलना किस्मत की बात होती है।” मीनल अपनी सास की इन बातों से थोड़ी शांत हुई, लेकिन रंजना के शब्द अभी भी घर की हवा में घुले हुए थे।

अगले दिन शादी की मुख्य रस्में थीं। बारात के स्वागत के लिए एक बड़ा सा रिसॉर्ट बुक किया गया था। सब कुछ बहुत अच्छे से चल रहा था। रंजना अपने रईस रिश्तेदारों के साथ सबसे आगे खड़ी होकर दिखावा कर रही थीं। तभी अचानक मौसम ने करवट ली। आसमान में काले घने बादल छा गए और तेज़ आंधी के साथ मूसलाधार बारिश शुरू हो गई। रिसॉर्ट का जो हिस्सा खुले आसमान के नीचे था, जहाँ जयमाला और खाने का इंतज़ाम था, वहाँ पानी भरने लगा। टेंट उड़ने लगे और कुर्सियाँ यहाँ-वहाँ गिरने लगीं।

पूरे रिसॉर्ट में अफरा-तफरी मच गई। कावेरी जी और उनके पति के तो जैसे हाथ-पैर फूल गए। टेंट वाले और डेकोरेशन वाले बारिश का बहाना बनाकर काम बीच में छोड़कर किनारे खड़े हो गए। रंजना और उनके अमीर रिश्तेदार अपने महँगे कपड़ों को भीगने से बचाने के लिए कमरों में जाकर छिप गए और वहाँ से बाहर निकलकर किसी भी तरह की मदद करने से साफ इंकार कर दिया। उलटा रंजना वहां से चिल्ला रही थीं, “अरे दीदी, कैसा घटिया इंतज़ाम किया है! मेरे तो इतने महँगे कपड़े खराब हो गए।”

इसी बीच बारात रिसॉर्ट के गेट पर पहुँच गई। कावेरी जी घबराहट के मारे रोने लगीं कि अब क्या होगा, बारात का स्वागत कैसे होगा और खुले में खाने का जो नुकसान हुआ है, उसे कैसे संभाला जाएगा।

तभी शिखा के होने वाले ससुर, श्रीकांत जी, और दूल्हा, प्रतीक, गाड़ी से उतरे। उन्होंने स्थिति की गंभीरता को तुरंत समझ लिया। श्रीकांत जी ने कोई नखरा या गुस्सा नहीं किया। उन्होंने तुरंत अपनी शेरवानी के बटन खोले, आस्तीन ऊपर चढ़ाई और अपने बेटे प्रतीक तथा बारात में आए अन्य रिश्तेदारों से कहा, “खड़े क्या हो सब? चलो, लड़की वालों की मदद करो। जल्दी से सारा खाने का सामान और कुर्सियाँ अंदर हॉल में शिफ्ट करो।”

प्रतीक खुद भीगते हुए टेंट वालों के साथ मिलकर जयमाला के स्टेज का सामान अंदर सुरक्षित जगह पर पहुँचाने लगा। दूसरी तरफ, मीनल के पिता और भाई, जो इस शादी में साधारण मेहमान बनकर आए थे, वे भी बिना एक पल सोचे बारिश में कूद पड़े। मीनल की माँ रसोई के हिस्से में चली गईं और हलवाइयों को निर्देश देकर बारिश से बचे हुए सामान से मेहमानों के लिए गरमा-गरम पकौड़े और चाय बनवाने लगीं, ताकि भीगने के बाद मेहमानों को ठंड न लगे।

कावेरी जी यह सब देखकर अवाक रह गईं। जहाँ उनके अपने पैसे वाले रिश्तेदार कमरों में दुबक कर बैठे थे और व्यवस्था को कोस रहे थे, वहीं उनकी ‘कम हैसियत’ वाली बहू के माता-पिता और ‘साधारण’ से दिखने वाले समधी बारिश में भीग कर उनकी इज़्ज़त बचा रहे थे।

कुछ ही घंटों में, मीनल के मायके वालों और प्रतीक के परिवार की मेहनत से पूरा रिसॉर्ट का हॉल एक खूबसूरत विवाह स्थल में तब्दील हो गया। जो संकट एक बहुत बड़े तमाशे में बदल सकता था, वह इन दोनों परिवारों की सूझबूझ और सहयोग से टल गया। जब स्थिति सामान्य हो गई और सभी मेहमान हॉल में आकर बैठ गए, तब रंजना भी अपने कमरे से बाहर निकलीं। उनका चेहरा अभी भी उतरा हुआ था और वे बड़बड़ा रही थीं कि उनका मेकअप खराब हो गया है।

जयमाला का समय हुआ। शिखा और प्रतीक दोनों स्टेज पर खड़े थे। इससे पहले कि रस्में शुरू हों, कावेरी जी ने माइक हाथ में लिया। उनकी आँखों में आंसू थे, लेकिन चेहरे पर एक असीम गर्व था। उन्होंने पूरे हॉल में बैठे मेहमानों और विशेष रूप से अपनी देवरानी रंजना की ओर देखते हुए कहा:

“आज इस माइक से मैं कुछ कहना चाहती हूँ। कल हमारे घर में हैसियत और बराबरी की बहुत बात हो रही थी। कहा जा रहा था कि मैंने अपनी बहू और दामाद, दोनों ही साधारण परिवारों से चुने हैं। उनकी दी हुई भेंट का मज़ाक उड़ाया गया था। लेकिन आज इस तूफ़ान ने मुझे और आप सबको एक बहुत बड़ा सच दिखा दिया है।”

कावेरी जी की आवाज़ थोड़ी भारी हो गई, “जब मुसीबत आई, तो वे सोने की भारी चेन और महँगे रेशमी कपड़े कमरों में छिप गए। किसी ने बाहर आकर मेरी गिरती हुई इज़्ज़त को नहीं संभाला। मेरी इज़्ज़त को संभाला मेरी बहू के उन साधारण माता-पिता ने, जिनकी दी हुई इक्यावन सौ रुपये की शगुन की राशि कल किसी को कम लग रही थी। मेरी लाज बचाई मेरे होने वाले समधी और दामाद ने, जिन्होंने अपने महँगे कपड़ों की परवाह किए बिना एक मज़दूर की तरह काम किया ताकि मेरी बेटी की शादी बिना किसी विघ्न के पूरी हो सके।”

कावेरी जी ने रंजना की आँखों में आँखें डालते हुए आगे कहा, “रिश्ते कभी भी बैंक बैलेंस या सोने के वज़न से नहीं तौले जाते। रिश्ते तौले जाते हैं उस वक्त से, जब आप मुसीबत में हों और सामने वाला आपका हाथ थाम ले। मेरी बहू और मेरे दामाद, दोनों के परिवार हैसियत में शायद करोड़पति न हों, लेकिन संस्कारों, इंसानियत और अपनेपन में वे दुनिया के सबसे अमीर लोग हैं। और मुझे गर्व है कि मैंने अपनी संतान के लिए पैसे नहीं, बल्कि सच्चे इंसान चुने।”

पूरे हॉल में सन्नाटा छा गया था। रंजना का सिर शर्म से झुक गया था। उनके पास कहने के लिए एक भी शब्द नहीं था। वे चुपचाप पीछे की कुर्सी पर जाकर बैठ गईं। मीनल की आँखों में आज दुःख के नहीं, बल्कि गर्व के आंसू थे। प्रतीक के पिता श्रीकांत जी ने हाथ जोड़कर कावेरी जी का अभिवादन किया।

उस रात शिखा की विदाई एक बहुत ही खुशनुमा माहौल में हुई। सोने-चांदी की चमक से दूर, वह शादी सच्चे रिश्तों और संस्कारों की चमक से जगमगा उठी थी। समाज के उन तमाम लोगों को एक बहुत बड़ा सबक मिल गया था जो केवल बैंक की पासबुक देखकर रिश्तों की बुनियाद रखते हैं। कावेरी जी ने साबित कर दिया था कि एक साधारण परिवार से जुड़ा रिश्ता, मुश्किल वक्त में सबसे असाधारण ढाल बनकर उभरता है।

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