बहू नहीं सम्मान है इस घर का – गरिमा चौधरी

शहर के सबसे बड़े मैरिज हॉल में शहनाई की गूंज और रोशनी की चकाचौंध हर किसी का मन मोह रही थी। शहर के जाने-माने व्यापारी सेठ दीनानाथ की इकलौती और लाडली बेटी लीला  का विवाह एक बहुत ही रसूखदार और प्रतिष्ठित परिवार के बेटे वेदांत के साथ हो रहा था।

बारात दरवाजे पर आ चुकी थी। बारातियों का भव्य स्वागत किया गया था। वेदांत के पिता, ठाकुर भवानी सिंह, अपनी मूंछों पर ताव देते हुए मेहमानों से मिल रहे थे। दोनों परिवारों की इज्जत आज दांव पर थी। लेकिन अचानक लड़कियों वाले कमरे से एक ऐसी चीख और घबराहट भरी आवाज आई जिसने पूरे माहौल में सन्नाटा खींच दिया।

लीला  अपने कमरे में नहीं थी। वहां सिर्फ उसका भारी-भरकम लाल जोड़ा और ड्रेसिंग टेबल पर रखा एक पन्ना था। उस खत में लीला  ने लिखा था कि वह वेदांत जैसे ‘बोरिंग और पारंपरिक’ इंसान से शादी नहीं कर सकती। वह अपने प्रेमी, जो कि एक संघर्षरत गिटारिस्ट था, के साथ शहर छोड़कर जा रही है। यह खबर आग की तरह पूरे हॉल में फैल गई।

दूल्हे वालों के लिए यह एक बहुत बड़ी बेइज्जती थी। भरी महफिल में बारात का इस तरह अपमानित होना भवानी सिंह को अंदर तक जला रहा था। उन्हें बड़ी जिल्लत महसूस हो रही थी। जिस घर में वे अपनी बहू को सम्मान के साथ ले जाने आए थे, वहां से अब बारात बैरंग कैसे लौट सकती थी? बारात अगर बिना दुल्हन के जाती,

तो पूरे समाज में उनकी बहुत बदनामी होती। लड़के के पिताजी स्वयं को ठगा सा महसूस कर रहे थे। दीनानाथ जी हाथ जोड़े, रोते हुए उनके पैरों में गिर पड़े थे, लेकिन भवानी सिंह के चेहरे का क्रोध कम नहीं हो रहा था।

तभी भवानी सिंह की नजर दूर खड़ी एक लड़की पर पड़ती है। वह एक साधारण सी सूती साड़ी पहने, घबराए हुए मेहमानों को पानी पिला रही थी और रोती हुई औरतों को चुप करा रही थी। वह लड़की दीनानाथ जी की अनाथ भतीजी, परिणीति थी। परिणीति बचपन से ही अपने चाचा के घर पली-बढ़ी थी।

उसे हमेशा लीला  के उतरे हुए कपड़े और बचा हुआ प्यार ही मिला था। लीला  की परछाई में परिणीति का अपना वजूद कहीं खो सा गया था। लेकिन आज इस संकट की घड़ी में, जब सगे रिश्तेदार भी मुंह फेर रहे थे, परिणीति एक ढाल की तरह परिवार की इज्जत को संभालने की कोशिश कर रही थी।

परिणीति की शालीनता, उसके चेहरे का ठहराव और उसकी आंखों में दिख रही समझदारी ने भवानी सिंह को अंदर तक प्रभावित कर दिया। उन्होंने अपने बेटे वेदांत की तरफ देखा, जिसकी आंखों में भी परिणीति के लिए एक सम्मान का भाव था। भवानी सिंह ने तुरंत दीनानाथ जी को उठाया और अपनी भारी आवाज में कहा, “दीनानाथ जी, जो लड़की अपने परिवार की इज्जत की परवाह नहीं कर सकती, वह मेरे घर की बहू बनने के लायक थी भी नहीं। लेकिन हम खाली हाथ नहीं लौटेंगे। अगर आप अपने परिवार का सम्मान बचाना चाहते हैं, तो परिणीति का हाथ मेरे बेटे वेदांत के हाथ में दे दीजिए। मुझे अपने घर के लिए रूप-रंग और पैसे वाली लड़की नहीं, बल्कि संस्कारों वाली बहू चाहिए।”

भवानी सिंह की यह बात सुनकर दीनानाथ जी अवाक् रह गए। पूरे हॉल में फुसफुसाहट शुरू हो गई। “परिणीति? लेकिन लोग क्या कहेंगे ठाकुर साहब? लीला  की जगह परिणीति को मंडप में कैसे बिठा सकता हूं? उसने तो कभी इतने बड़े घर की बहू बनने का ख्वाब भी नहीं देखा है, और ना ही मेरे पास उसे देने के लिए वैसा दहेज है,” दीनानाथ जी घबराते हुए बोले।

लेकिन तभी घर के बुजुर्ग रिश्तेदारों ने दीनानाथ जी को समझाना शुरू किया। “दीनानाथ, ठाकुर साहब खुद आगे बढ़कर तुम्हारी इज्जत बचा रहे हैं। परिणीति हमारी ही बेटी है। इससे अच्छा घर उसे कहां मिलेगा? इसी में सबकी भलाई है।”

परिणीति, जो एक कोने में खड़ी सब सुन रही थी, उसकी आंखों से आंसू बहने लगे। उसने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि नियति उसे इस दोराहे पर लाकर खड़ा कर देगी। लेकिन अपने चाचा की पगड़ी को धूल में मिलने से बचाने के लिए उसने खामोशी से अपना सिर झुका लिया। वेदांत भी एक बहुत ही सुलझा हुआ इंसान था। उसने परिणीति के पास जाकर बहुत ही सम्मान से कहा, “मैं जानता हूं यह सब आपके लिए बहुत अचानक है, लेकिन मैं जीवन भर आपके इस बलिदान और आपके सम्मान की रक्षा करूंगा।”

लीला  के लाल जोड़े को थोड़ा छोटा करके परिणीति को पहनाया गया। जिस मंडप में लीला  के फेरे होने थे, वहां परिणीति ने वेदांत के साथ सात फेरे लिए। नियति के रंग कैसे बदलते हैं, यह उस रात हर किसी ने देखा। विदाई के वक्त दीनानाथ जी खूब रोए, क्योंकि आज उन्हें समझ आ गया था कि जिसे वह आज तक बोझ समझते थे, उसी ने उनके परिवार की लाज बचाई थी।

परिणीति जब उस बड़े और आलीशान घराने की बहू बनकर गई, तो वहां उसे वह प्यार और सम्मान मिला जिसके लिए वह बचपन से तरस रही थी। भवानी सिंह उसे अपनी बेटी से बढ़कर मानते थे। उसका पति वेदांत बहुत ही अच्छे स्वभाव का इंसान निकला। उसने कभी परिणीति को यह महसूस नहीं होने दिया कि वह किसी की जगह पर आई है। उसने परिणीति को आगे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया और उसे हर कदम पर एक मजबूत साथी का अहसास कराया। परिणीति सच में एक रानी की तरह राज कर रही थी। उसकी सादगी और समझदारी ने उस पूरे बड़े घराने को एक सूत्र में बांध दिया था।

और दूसरी तरफ, उसकी बहन लीला , जो अपने अहंकार में महलों की रौनक को ठुकरा कर भागी थी, आज सड़क की धूल फांक रही थी। उसका प्रेमी, जिसके लिए उसने अपने पिता की इज्जत दांव पर लगा दी थी, कुछ ही महीनों में उसके सारे गहने और पैसे लेकर भाग गया था। लीला  दर-दर की ठोकरें खाने को मजबूर थी। उसे कोई छोटी-मोटी नौकरी भी नहीं मिल रही थी और शर्म के मारे वह अपने पिता के पास भी वापस नहीं जा सकती थी।

जब किस्मत के रंग बदलते हैं, तब इंसान का पूरा जीवन बदल जाता है। नियति ने दोनों बहनों को उनके कर्मों का फल दे दिया था। परिणीति ने निस्वार्थ भाव से परिवार की इज्जत बचाई, तो ईश्वर ने उसे दुनिया की सारी खुशियां दे दीं। और लीला  ने जो बर्बादी की नियति स्वयं बनाई थी, वह अब उस आग में जिंदगी भर जलने को मजबूर थी।

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लेखिका : गरिमा चौधरी

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