लिव-इन वाली बहू – सीमा श्रीवास्तव

बेंगलुरु की एक नामी आईटी कंपनी में काम करने वाले सिद्धार्थ और नीती की सोच आज के ज़माने की थी। दोनों ने शादी का फैसला रातों-रात नहीं लिया था। करीब दो साल तक लिव-इन रिलेशनशिप में रहने के बाद, एक-दूसरे की आदतों, आर्थिक ज़िम्मेदारियों और पारिवारिक मूल्यों को पूरी तरह से समझने के बाद ही

उन्होंने सात फेरे लेने का मन बनाया था। नीती एक बेहद सुलझी हुई, आत्मनिर्भर और खुले विचारों वाली लड़की थी। वहीं सिद्धार्थ भी उसे बराबरी का दर्ज़ा देता था। दोनों का जीवन एक-दूसरे के प्रति सम्मान और गहरी समझ पर टिका था। लेकिन जब बात सिद्धार्थ के पारंपरिक परिवार तक पहुँची, तो चीज़ें इतनी आसान नहीं रहीं।

सिद्धार्थ का परिवार भोपाल के एक पुराने मोहल्ले में रहता था। उसकी माँ, कौशल्या जी, एक बेहद संस्कारी लेकिन पुरानी सोच वाली महिला थीं। जब उन्हें पता चला कि उनका बेटा एक ‘लव मैरिज’ कर रहा है,

वो भी एक ऐसी लड़की से जो उसके साथ पहले से ही एक ही छत के नीचे रह रही थी, तो उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। हालांकि सिद्धार्थ की ज़िद के आगे उन्हें झुकना पड़ा और शादी हो गई, लेकिन नीती के लिए कौशल्या जी के मन में पहले दिन से ही एक अदृश्य दीवार खड़ी हो गई थी।

शादी के बाद जब नीती कुछ दिनों के लिए भोपाल आई, तो जो थोड़ी-बहुत गुंजाइश उस रिश्ते के सुधरने की थी, वह रिश्तेदारों और आस-पड़ोस की औरतों ने खत्म कर दी। बुआ जी और पड़ोस की चाची दिन भर घर में डेरा डाले रहतीं और कौशल्या जी के कान भरती रहतीं।

“अरे कौशल्या, ये बड़े शहर की नौकरीपेशा लड़कियाँ किसी की सगी नहीं होतीं। ऊपर से तुम्हारे बेटे ने तो लिव-इन वाली से शादी की है, इसने तो पहले ही उस पर जादू कर रखा है,” बुआ जी पान चबाते हुए कहतीं।

पड़ोस की ताई भी पीछे नहीं रहीं, “बच के रहना कौशल्या इस मेमसाब से। ये मॉडर्न लड़कियाँ ससुराल को तो कुछ समझती ही नहीं। देखना, तुम्हारे बेटे को उंगलियों पर नचाएगी और तुम्हें किनारे कर देगी।”

इन बातों ने कौशल्या जी के मन में नीती के प्रति एक गहरा डर और कड़वाहट भर दी। नीती सुबह उठकर जब प्यार से चाय बनाकर लाती, तो कौशल्या जी मुंह फेर लेतीं। नीती अगर अपने ऑफिस का काम लैपटॉप पर कर रही होती, तो उसे ‘कामचोर’ और ‘घमंडी’ का ताना सुनना पड़ता। नीती सब समझ रही थी कि ये बातें कहाँ से आ रही हैं, लेकिन उसने सिद्धार्थ से कभी इस बात की शिकायत नहीं की। वह जानती थी कि संस्कार सिर्फ सिर ढकने में नहीं, बल्कि बड़ों का सम्मान करने और उनका दिल जीतने में होते हैं।

कुछ हफ्तों बाद सिद्धार्थ और नीती वापस बेंगलुरु लौट आए, लेकिन कौशल्या जी का बर्ताव फोन पर भी रूखा ही रहा। एक साल बीत गया। इसी बीच अचानक सिद्धार्थ के पिता का देहांत हो गया। कौशल्या जी पूरी तरह से टूट गईं। सिद्धार्थ उन्हें अपने साथ बेंगलुरु ले आया। उस सूनेपन और डिप्रेशन के बीच कौशल्या जी का शरीर भी बीमारियों का घर बन गया। एक दिन उन्हें तेज़ बुखार और जोड़ों में भयंकर दर्द हुआ। टेस्ट कराने पर पता चला कि उन्हें डेंगू हो गया है और उनकी प्लेटलेट्स बहुत तेज़ी से गिर रही हैं।

उसी दौरान सिद्धार्थ की कंपनी में एक बहुत बड़ा क्राइसिस आ गया, जिसके चलते उसे न चाहते हुए भी दस दिनों के लिए विदेश जाना पड़ा। कौशल्या जी घबरा गईं। उन्हें लगा कि अब इस बड़े शहर में, इस ‘मॉडर्न बहू’ के भरोसे उनका क्या होगा? जिन रिश्तेदारों ने उनके कान भरे थे, उनमें से किसी ने फोन करके हाल भी नहीं पूछा, आने की तो बात ही दूर थी।

लेकिन नीती ने जो किया, उसने कौशल्या जी की सोच को जड़ से हिला दिया। नीती ने तुरंत ऑफिस से ‘वर्क फ्रॉम होम’ की अनुमति ली। दिन-रात कंप्यूटर के आगे बैठकर अपने प्रोजेक्ट्स पूरे करने के साथ-साथ, वह कौशल्या जी की सेवा में किसी नर्स की तरह जुट गई। सुबह उनके उठने से पहले उनका पपीते के पत्तों का रस तैयार रहता। नीती जो कभी खुद नाश्ता बनाना भूल जाती थी, आज कौशल्या जी के लिए खिचड़ी, सूप और दवाइयों का पूरा हिसाब अपनी उंगलियों पर रखती थी। रात-रात भर जागकर वह कौशल्या जी के सिर पर ठंडे पानी की पट्टियाँ रखती और उनके पैरों की मालिश करती।

बीमारी की उस धुंधली हालत में भी कौशल्या जी देख रही थीं कि जिस लड़की को उन्होंने और उनके रिश्तेदारों ने ‘स्वार्थी’ और ‘चालू’ कहा था, वह अपना करियर, अपनी नींद और अपना आराम दांव पर लगाकर उनकी जान बचा रही है। एक रात जब दर्द के मारे कौशल्या जी कराह रही थीं, तो नीती ने उनका सिर अपनी गोद में रख लिया और उनके बालों में उंगलियां फेरते हुए एक माँ की तरह उन्हें चुप कराने लगी। उस पल कौशल्या जी की बंद आँखों से पश्चाताप के आंसू बह निकले। उन्हें अपने उन तमाम तानों और कड़वे शब्दों पर शर्म आने लगी।

कुछ दिनों बाद जब सिद्धार्थ वापस लौटा, तो उसने देखा कि उसकी माँ हॉल में सोफे पर बैठी आराम से टीवी देख रही हैं और नीती उनके बालों में तेल लगा रही है। दोनों आपस में किसी बात पर ठहाके मार कर हंस रही थीं। सिद्धार्थ दरवाजे पर ही ठिठक गया; उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था।

तभी बुआ जी का फोन आया। कौशल्या जी ने फोन स्पीकर पर डाल दिया। बुआ जी ने हमेशा की तरह ज़हर उगलना शुरू किया, “कौशल्या, कैसा है स्वास्थ्य? अरे, उस मेमसाब बहू ने कुछ खाने को दिया या बस अपने लैपटॉप में ही घुसी रहती है? कहा था न मैंने…”

कौशल्या जी ने बुआ जी की बात बीच में ही काट दी और बेहद कड़क आवाज़ में कहा, “दीदी, मेरी बहू को मेमसाब कहना बंद कर दीजिए। जिसे आप लोग मॉडर्न और स्वार्थी कहते हैं न, उसी ने मुझे मौत के मुँह से निकाला है। आज के ज़माने की लड़की है, खुले विचारों वाली है, तो क्या हुआ? इसके दिल में जो संस्कार और जो प्यार है, वो हमारे पुराने ज़माने के तथाकथित ‘समझदार’ लोगों में भी नहीं है। मेरी नीती मेरी बहू नहीं, मेरा बेटा और मेरी बेटी दोनों है।”

नीती ने हैरानी से अपनी सास की तरफ देखा। कौशल्या जी ने फोन काट दिया और नीती को अपने गले से लगा लिया। आज उस घर में कोई सास-बहू नहीं थीं, बल्कि दो ऐसी औरतें थीं जिन्होंने समाज के बुने हुए भ्रम के जालों को तोड़कर एक-दूसरे के प्यार और सच्चाई को पहचान लिया था। ‘लव मैरिज’ और ‘मॉडर्न सोच’ पर लगाए गए सारे लांछन नीती के सेवाभाव के आगे हार चुके थे। उस दिन के बाद, उस घर की दीवारों ने फिर कभी कोई ताना नहीं सुना, सिर्फ एक परिवार के पनपने की गूंज सुनी।

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लेखिका : सीमा श्रीवास्तव

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