कमरे में पसरा घना सन्नाटा और उस सन्नाटे को चीरती हुई घड़ी की टिक-टिक। सुलोचना जी ने कांपते हाथों से खाने की थाली मेज पर रखी। पिछले एक महीने से उनके घर का यही दृश्य था। उनका इकलौता बेटा रोहन, जो कभी पूरे घर में अपनी हंसी और चुलबुलेपन से रौनक ला देता था, आज एक जीवित लाश की तरह बिस्तर पर निढाल पड़ा था।
रोहन की आँखें खिड़की के बाहर किसी शून्य में टिकी थीं, जैसे वो किसी ऐसे इंसान को खोज रही हों जो बहुत दूर जा चुका है। सुलोचना जी ने भर्राए हुए गले से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, “बेटा, थोड़ा सा खा ले। सुबह से अन्न का एक दाना नहीं गया तेरे पेट में। ऐसे कब तक खुद को सज़ा देता रहेगा?” रोहन ने बिना उनकी तरफ देखे, बड़ी ही बेरुखी से अपना सिर ‘ना’ में हिला दिया और करवट बदल ली।
सुलोचना जी भारी और थके हुए कदमों से अपने कमरे में लौट आईं। पलंग पर बैठते ही उनकी आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। उनके सीने में एक ऐसा दर्द उठ रहा था जिसका इलाज किसी वैद्य या डॉक्टर के पास नहीं था। यह दर्द उनके अपने ही बुने हुए स्वार्थ, असुरक्षा और अहंकार के जाल का था।
रोहन उनका इकलौता बेटा था। पति के गुज़र जाने के बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन रोहन को पालने और उसे एक सफल इंसान बनाने में लगा दिया था। लेकिन जब रोहन के जीवन में उसकी पत्नी सीमा आई, तो सुलोचना जी के अंदर एक अनजाना सा डर पनपने लगा।
सीमा बहुत ही समझदार, संस्कारी और प्यार करने वाली लड़की थी। रोहन और सीमा एक-दूसरे से बेइंतहा मोहब्बत करते थे। रोहन अपनी पत्नी की हर छोटी-बड़ी खुशी का ख्याल रखता था। लेकिन यही बात सुलोचना जी को खटकने लगी। उन्हें लगने लगा कि जिस बेटे पर सिर्फ उनका अधिकार था, जो बेटा हर काम उनसे पूछकर करता था, वह अब अपनी पत्नी का दीवाना हो गया है। उन्हें लगने लगा कि सीमा उनके बेटे को उनसे दूर कर रही है। इसी बेबुनियाद असुरक्षा और स्वार्थ में अंधी होकर सुलोचना जी ने घर में छोटी-छोटी बातों पर क्लेश करना शुरू कर दिया।
वह जानबूझकर सीमा की कमियां निकालतीं, रोहन के सामने रोने का नाटक करतीं और उसे ये एहसास दिलातीं कि सीमा उनका अपमान करती है। रोहन, जो अपनी माँ को भगवान की तरह पूजता था और अपनी पत्नी से टूटकर प्यार करता था, दोनों के बीच पिसने लगा। माँ के आंसुओं और लगातार की जा रही भावनात्मक ब्लैकमेलिंग के आगे रोहन टूट गया। एक दिन बात इतनी बढ़ गई कि सुलोचना जी ने सीमा पर कुछ झूठे आरोप लगा दिए। रोहन ने गुस्से में आकर सीमा को बहुत बुरा-भला कह दिया और उसे घर से चले जाने को कह दिया। सीमा , जिसका दिल पूरी तरह टूट चुका था, रोते हुए अपने मायके चली गई।
सुलोचना जी को लगा था कि सीमा के जाने के बाद उनका बेटा वापस पूरी तरह उनका हो जाएगा। उन्हें लगा कि उन्होंने अपना खोया हुआ साम्राज्य वापस पा लिया है। लेकिन वह कितनी गलत थीं! सीमा के जाने के बाद रोहन का शरीर तो उसी घर में था, लेकिन उसकी आत्मा जैसे सीमा के साथ ही चली गई थी। वह काम से लौटकर सीधे अपने कमरे में बंद हो जाता। न वह अपनी माँ से पहले की तरह बातें करता, न मुस्कुराता और न ही उसे किसी चीज़ की सुध रहती।
सुलोचना जी ने रोहन का दिल बहलाने के लिए उसे कई दिनों तक बहुत समझाया। उसे उसके पसंदीदा खाने बनाकर दिए, रिश्तेदारों के यहाँ ले जाने की बात कही, लेकिन रोहन का गम कम होने का नाम ही नहीं ले रहा था। उसकी आँखों में सीमा के लिए जो तड़प थी, उसने सुलोचना जी के अहंकार को चकनाचूर कर दिया। अब सुलोचना जी को अपनी भयंकर भूल का एहसास हो रहा था। वो इतनी स्वार्थी और नासमझ हो गयी थीं कि उन्होंने सिर्फ अपने बारे में सोचा। उन्हें इस बात का डर था कि कहीं बेटा उन्हें भूल न जाए, लेकिन वो यह जीवन का सबसे बड़ा सच समझ ही नहीं पाईं कि ज़िंदगी में पत्नी की जगह माँ नहीं ले सकती और माँ की जगह पत्नी नहीं ले सकती। दोनों का प्रेम, दोनों का अधिकार और दोनों की अहमियत एक पुरुष के जीवन में बिल्कुल अलग और अपनी-अपनी जगह सर्वोच्च होती है।
अपनी इस नासमझी का एहसास होने पर सुलोचना जी पश्चाताप की अग्नि में बुरी तरह जलने लगीं। “ये मैंने क्या कर दिया? अपने बुढ़ापे के स्वार्थ में अपने ही बच्चे की हंसती-खेलती ज़िंदगी तबाह कर दी,” वह खुद को कोसने लगीं। उन्होंने तुरंत अपना फोन उठाया और सीमा के नंबर पर कॉल किया। घंटी बजती रही, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। उन्होंने एक के बाद एक कई बार फोन लगाए, लेकिन सीमा ने एक बार भी कॉल रिसीव नहीं किया। सीमा के मन में इस कदर ठेस लगी थी कि वह अब उस घर की कोई बात नहीं सुनना चाहती थी।
सुलोचना जी फोन सीने से लगाकर फूट-फूट कर रोने लगीं। उस रात उन्हें एक पल के लिए भी नींद नहीं आई। कमरे की छत को घूरते हुए वह बस यही सोचती रहीं कि कैसे भी करके उन्हें अपनी गलती सुधारनी है। जब सुबह की पहली किरण खिड़की से अंदर आई, तो सुलोचना जी ने एक दृढ़ निश्चय कर लिया था। उन्होंने तय कर लिया था कि आज वह खुद सीमा के मायके जाएंगी। चाहे उन्हें सीमा के और उसके माता-पिता के पैरों में ही क्यों न गिरना पड़े, वह अपनी बहू से माफी मांग कर रहेंगी। वह अपने बेटे की खुशियां उसे वापस लौटाएंगी, क्योंकि अब वह समझ चुकी थीं कि बेटे की खुशी माँ से कटकर नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवार के एक साथ रहने में है।
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लेखिका : नेहा पटेल