सुमित्रा जी के जीवन का एकमात्र सहारा उनका इकलौता बेटा अंशुल था। पति के कम उम्र में ही गुजर जाने के बाद, सुमित्रा जी ने अपना पूरा जीवन अंशुल को एक अच्छा इंसान और एक सफल व्यक्ति बनाने में लगा दिया था। अंशुल भी अपनी माँ से बहुत प्यार करता था और उनकी हर छोटी-बड़ी खुशी का ख्याल रखता था।
लेकिन सुमित्रा जी के जीवन में उथल-पुथल तब मच गई, जब अंशुल ने शहर की एक आधुनिक और स्वतंत्र विचारों वाली लड़की, मीना से प्रेम विवाह करने का फैसला किया। मीना मुंबई की रहने वाली थी, पढ़ी-लिखी, खुले विचारों वाली और एक मल्टीनेशनल कंपनी में अच्छे पद पर काम करती थी।
सुमित्रा जी ने बेटे की खुशी के लिए शादी के लिए हामी तो भर दी, लेकिन उनके मन के किसी गहरे कोने में एक अनजाना सा डर बैठ गया था। शादी के बाद जब मीना उनके घर आई, तो पड़ोसियों और रिश्तेदारों ने सुमित्रा जी के घर आना-जाना शुरू कर दिया।
बातों ही बातों में सुमित्रा जी की एक करीबी रिश्तेदार ने उनके कान भरते हुए कहा, “सुमित्रा, तूने अपने पैर पर खुद कुल्हाड़ी मार ली है। ये मुंबई की पढ़ी-लिखी और मॉर्डन लड़कियां कभी सास की सगी नहीं होतीं। देखना, कुछ ही दिनों में ये तेरे बेटे को अपनी उंगलियों पर नचाएगी और उसे तुझसे दूर कर देगी। तेरा बेटा तो अब तेरे हाथ से गया समझ।”
इन बातों ने सुमित्रा जी के मन में छिपी असुरक्षा को एक भयानक डर में बदल दिया। उन्हें लगने लगा कि मीना उनके बुढ़ापे का सहारा, उनके बेटे को उनसे छीन लेगी।
इस डर ने धीरे-धीरे एक अजीब सी जलन और प्रतिद्वंद्विता का रूप ले लिया। सुमित्रा जी अनजाने में ही सही, लेकिन मीना को अपनी बहू या बेटी की तरह नहीं, बल्कि एक दुश्मन की तरह देखने लगीं।
उन्होंने घर में एक ऐसा मौन युद्ध छेड़ दिया जिसका मीना को कोई अंदाजा नहीं था। मीना जब भी ऑफिस से थककर आती और अंशुल के साथ कुछ वक्त बिताना चाहती, सुमित्रा जी कोई न कोई काम लेकर बीच में आ जातीं। वह छोटी-छोटी बातों पर अंशुल के सामने मीना की कमियां निकालतीं।
कभी खाने में नमक को लेकर, तो कभी मीना के कपड़ों को लेकर। मीना बहुत समझदार थी, वह सुमित्रा जी का सम्मान करती थी और उनकी बातों का कभी पलटकर जवाब नहीं देती थी। वह सोचती थी कि शायद नई जगह और नए लोगों के बीच ढलने में थोड़ा वक्त लगेगा।
लेकिन सुमित्रा जी की चालें कम नहीं हुईं। वे जानबूझकर अंशुल के सामने ऐसी बातें कहतीं जिससे उसे लगे कि मीना उसकी माँ का सम्मान नहीं करती। “बेटा, आज तुम्हारी पत्नी ने मुझे पलटकर जवाब दिया,” या “इसे तो बस अपने पैसों का घमंड है, मेरी तो इस घर में कोई कद्र ही नहीं है।
” अंशुल, जो अपनी माँ को भगवान मानता था, इन बातों से आहत होने लगा। धीरे-धीरे अंशुल और मीना के बीच दूरियां बढ़ने लगीं। जो जोड़ा कभी एक-दूसरे की आंखों में देखकर दिन गुजार देता था, अब उनके बीच हर दिन बहस और झगड़े होने लगे।
एक दिन बात इतनी बिगड़ गई कि अंशुल ने मीना को बहुत बुरा-भला कह दिया। मीना के लिए यह सब बर्दाश्त के बाहर हो गया था। उसने अंशुल से कहा कि अगर उसके प्यार और समर्पण की इस घर में कोई अहमियत नहीं है, तो उसका यहाँ रहना व्यर्थ है। अगले ही दिन मीना अपना सामान लेकर वापस मुंबई अपने माता-पिता के घर चली गई।
मीना के जाने के बाद सुमित्रा जी को लगा कि उन्होंने अपना बेटा वापस पा लिया है, लेकिन यह उनकी बहुत बड़ी भूल थी। मीना के जाने के बाद अंशुल जैसे एक जिंदा लाश बन गया।
उसने हंसना-बोलना छोड़ दिया। वह ऑफिस से आता और चुपचाप अपने कमरे में बंद हो जाता। न वह ठीक से खाना खाता और न ही अपनी माँ से पहले की तरह बातें करता। उसकी आँखों में एक गहरा सूनापन आ गया था। कई रातें सुमित्रा जी ने अंशुल को अपने कमरे में अकेले रोते हुए सुना।
बेटे की इस दर्दनाक हालत ने सुमित्रा जी की आँखों पर पड़ी असुरक्षा की पट्टी को खोल कर रख दिया। उन्हें एहसास हुआ कि मीना अंशुल की सिर्फ पत्नी नहीं, बल्कि उसकी रूह थी। उन्होंने मीना को अंशुल से दूर करके उसे बचाया नहीं, बल्कि उसकी सारी खुशियां छीन ली हैं।
समाज के तानों और अपने अकेले रह जाने के झूठे डर ने उनसे कितना बड़ा पाप करवा दिया था। रातों की नींद उड़ गई थी सुमित्रा जी की। उन्हें याद आने लगा कि कैसे मीना सुबह उठकर उनके लिए चाय बनाती थी, उनके घुटनों के दर्द की दवाई याद से लाती थी, लेकिन उन्होंने कभी उसकी अच्छाई नहीं देखी।
छह महीने बीत चुके थे। एक सुबह जब कोहरा अभी छंटा भी नहीं था, सुबह के करीब सात बज रहे थे। दरवाजे की घंटी बजी। सुमित्रा जी ने भारी कदमों से जाकर दरवाजा खोला। दरवाजा खोलते ही उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। सामने मीना खड़ी थी। वह पहले से काफी कमजोर लग रही थी, लेकिन उसकी आँखों में वही पुरानी सच्चाई थी।
मीना को देखते ही सुमित्रा जी की आँखों से पश्चाताप के आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। वे वहीं दरवाजे पर मीना के पैरों के पास बैठ गईं और फूट-फूट कर रोने लगीं। शोर सुनकर अंशुल भी अपने कमरे से बाहर आ गया। मीना को दरवाजे पर देखकर वह दौड़कर उसके पास आया और उसे कसकर गले लगा लिया। दोनों की आँखों से आंसू बह रहे थे।
मीना ने खुद को अंशुल से धीरे से अलग किया और सुमित्रा जी को उठाने लगी। “मम्मी जी, आप ये क्या कर रही हैं? आप उठिए।”
सुमित्रा जी ने रोते हुए अपने दोनों हाथ जोड़ लिए। “मुझे माफ कर दे मेरी बच्ची। मैंने ही तुम दोनों के इस हंसते-खेलते स्वर्ग को आग लगाई है। मैं डर गई थी… लोगों ने कहा था कि तू शहर की है, मेरे बेटे को मुझसे छीन लेगी। मैं इस डर में अंधी हो गई थी कि बुढ़ापे में मैं अकेली रह जाऊंगी। मैंने तुझे कभी अपनी बहू की नजर से देखा ही नहीं, बल्कि हमेशा एक प्रतिद्वंदी माना, एक ऐसी औरत जो मेरे बेटे पर राज करना चाहती है। मैं हर वक्त तुझे गलत ठहराने के बहाने ढूंढती रही।”
सुमित्रा जी सिसक रही थीं। “मैं ये भूल गई थी कि मेरा बेटा तुझसे कितना प्यार करता है। जिस तरह मुझे उसकी जरूरत है, उसी तरह तुझे भी उसकी जरूरत है और उसे तेरी। मैंने अपने ही हाथों से अपने बच्चे की हंसी छीन ली। अगर तू न आती, तो शायद मेरा बेटा घुट-घुट कर मर जाता। मुझे माफ कर दे मीना , इस पापी माँ को माफ कर दे।”
मीना की आँखों में भी आंसू थे। उसने आगे बढ़कर अपनी सास को गले लगा लिया। “मम्मी जी, मांओं से कैसी माफी? मैं भी समझ नहीं पाई कि आपके अंदर इतना डर बैठ गया था। हम कहीं नहीं जा रहे हैं, हम सब यहीं साथ रहेंगे।”
उस सुबह उस घर की दीवारों ने जो आंसू देखे, वे दुःख के नहीं बल्कि एक नई शुरुआत के थे। सारे गिले-शिकवे धुल चुके थे और उस घर में फिर से खुशियों का सूरज उग आया था।
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लेखिका : सीमा श्रीवास्तव