“आधुनिक दुनिया में संस्कार” – तृप्ति देव

नेहा एक मध्यमवर्गीय परिवार की समझदार और संस्कारी लड़की थी। उसके घर में बचपन से ही अच्छे संस्कारों का वातावरण था। दादी हमेशा उसे समझाती थीं—

 “बेटी, जिंदगी में कितनी भी आधुनिक बन जाना, लेकिन अपनी मर्यादा और आत्मसम्मान कभी मत खोना।” और अपने संस्कार बहुत मूल्यवान होते हैं जहां अच्छे संस्कार होते वहां पर इंसान अच्छा और बुरा समझने लगता है. गलत रास्ते पर रोकने के लिए संस्कारी ही बहुत बड़ी पाठशाला होती है.

माँ भी उसे हर बात प्यार से समझाती और पिता कहते—

 “हमें तुम पर भरोसा है, क्योंकि हमें तुम्हारे संस्कारों पर भरोसा है।” और तुम्हें पूरी आजादी है जीने की कोई रोक-टोक नहीं है लेकिन रोक-टोक नहीं इसका मतलब यह नहीं तुम अपनी मर्यादा को भूल जाए. हमारी परवरिश बड़े ही बहुत अमीर हो जैसी नहीं है हमारे संस्कार बहुत अमीर है.

इन्हीं संस्कार के सीखों के साथ नेहा बड़ी हुई।

जब वह कॉलेज में पहुँची, तो उसके लिए एक नई दुनिया खुल गई। वहाँ हर किसी को अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीने की आज़ादी थी। नेहा भी अपने दोस्तों के साथ हँसती, घूमती और पढ़ाई करती थी। उसके कई दोस्त और सहेलियाँ बन गई थीं।

एक दिन कॉलेज के कुछ दोस्तों ने पिकनिक का प्लान बनाया। सब लोग शहर के बाहर एक रिसॉर्ट में गए। शुरुआत में सब बहुत अच्छा था। सबने साथ खाना खाया, गाने गाए और खूब फोटो खिंचवाई।

लेकिन शाम होते-होते कुछ लड़कों का व्यवहार बदलने लगा। उन्होंने चोरी-छिपे शराब मंगवाई और लड़कियों पर भी उसे पीने का दबाव डालने लगे।

नेहा और उसकी सहेलियों ने साफ मना कर दिया।

लेकिन उनमें से एक लड़का बोला—

 “अरे, इतना भी क्या संस्कारों का बोझ लेकर जीना? थोड़ी मस्ती कर लो…!”

दूसरा लड़का जबरदस्ती नेहा का हाथ पकड़कर उसे डांस फ्लोर की तरफ खींचने लगा। किसी ने मोबाइल से लड़कियों के वीडियो बनाने शुरू कर दिए ताकि बाद में उन्हें सोशल मीडिया पर डालकर मज़ाक उड़ाया जा सके।

कुछ लड़कियाँ डर गईं। माहौल अचानक असुरक्षित लगने लगा। और उनका विश्वास भी नहीं होने लगा कि वही लड़के हैं जो कॉलेज में अच्छे से रहते थे. अचानक उनका नया रूप देखकर सब डर गए.

उसी पल नेहा को अपनी दादी की बात याद आई.

“गलत बात को सहना भी गलत होता है।”

नेहा ने तुरंत उस लड़के का हाथ झटक दिया और ऊँची आवाज़ में बोली—

 “ये दोस्ती है या बदतमीज़ी? हमें हमारी मर्यादा पता है। अगर तुम लोग नहीं समझते, तो अभी पुलिस और कॉलेज दोनों को शिकायत करेंगे!”

उसकी आवाज़ में इतना आत्मविश्वास था कि बाकी सहेलियों को भी हिम्मत मिल गई। सभी लड़कियाँ एक साथ खड़ी हो गईं। उन्होंने उन लड़कों के वीडियो और हरकतों के सबूत जुटाए और तुरंत कॉलेज प्रशासन तथा अपने परिवार वालों को जानकारी दी।

अगले दिन कॉलेज में उन लड़कों के खिलाफ सख्त कार्रवाई हुई।

उस घटना के बाद कई लड़कियाँ नेहा के पास आईं और बोलीं—

“अगर उस दिन तुम आवाज़ नहीं उठाती, तो शायद हम डरकर चुप रह जाते।”

उस दिन नेहा ने महसूस किया कि संस्कार सिर्फ सिर झुकाकर बात करना नहीं सिखाते…

संस्कार गलत बात के सामने सिर उठाकर खड़े होना भी सिखाते हैं।

रात को घर लौटने पर पिता ने गर्व से कहा“

बेटा, जिंदगी में हर जगह हमारी डिग्री, हमारी खूबसूरती या हमारी आधुनिकता काम नहीं आती…

कई बार सिर्फ हमारे संस्कार ही हमें गलत रास्तों से बचाते हैं।

आज तुमने साबित कर दिया कि अच्छे संस्कार सिर्फ घर की बातें नहीं होते,

वो मुश्किल समय में हमारी ढाल बन जाते हैं।

इंसान की असली पहचान उसके कपड़ों या दोस्तों से नहीं,

बल्कि उस समय से होती है जब वह गलत के सामने ‘ना’ कहना सीख जाता है।

और आज… तुमने हमारे संस्कारों का मूल्य साबित कर दिया।”

नेहा की आँखें नम हो गईं।

उसे पहली बार महसूस हुआ कि संस्कार सिर्फ सिखाए नहीं जाते…

उन्हें सही समय पर जीकर दिखाना पड़ता है।

“आज तुमने साबित कर दिया कि हमारी बेटी कमजोर नहीं, संस्कारों से मजबूत है।”

नेहा अपने पापा के गले लगकर धीरे से बोली—

 “पापा…

आज समझ आया कि आपने मुझे सिर्फ पढ़ाया-लिखाया नहीं,

बल्कि सही और गलत में फर्क करना भी सिखाया है।

अगर आपके दिए संस्कार मेरे साथ नहीं होते,

तो शायद मैं भी डरकर चुप रह जाती।

लेकिन आज… आपके संस्कारों ने ही मुझे गलत के सामने झुकने नहीं दिया…”

और फिर मुस्कुराकर उसने कहा—

 “पापा,

दुनिया चाहे कितनी भी आधुनिक क्यों ना हो जाए…

बेटी को सबसे ज्यादा सुरक्षित उसके संस्कार ही रखते हैं…”

सच ही तो है—

 हर लड़की की जिंदगी में एक पल ऐसा जरूर आता है,

जहाँ उसकी पढ़ाई नहीं… उसके संस्कारों की परीक्षा होती है।

“संस्कार वो जड़ें हैं,

जो इंसान को हर तूफ़ान में भी गिरने नहीं देतीं…”

तृप्ति देव 

भिलाई छत्तीसगढ़ 

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