जबसे नीता की शादी तय हुई है तब से उसके तो रंग ढंग ही बदल गए हैं।कभी बहुत खुश ,कभी उदास। मन में 100 तरह के विचार उथल-पुथल मचाते रहते थे क्योंकि पति का घर सुदूर प्रदेश में था, इसलिए एक बार के बाद दूसरी बार मिलना तो ना हुआ और कभी बातें भी नहीं हुई । लेकिन घर में हर वक्त वहां की ही बातें होती रहती थीं । मां की ममता की भी कोई सीमा नहीं होती।भाभी और मां रोज बाजार जाते और कुछ ना कुछ नया लेकर आते हैं उस घर में जहां शादी से पहले कानों के कुंडल पहनने पर भी रोक था ,जब वह अपने गहने पहन के अपने आप को शीशे में देखती तो खुद ही खुद पर ही रीझ जाती थी। इतनी सुंदर सुंदर रंग बिरंगी साड़ियां ,ख्यालों में हर वक्त ,खुद को उन्हें पहने हुए ही देखती रहती थी । अपने ख्यालों में खुद ही प्रफुल्लित होती थी और खुद ही———-।
दहेज का सामान तैयार हो रहा था हर साड़ी ट्रंक में अच्छे से जमाई जा रही थी कि तभी भाभी बोली ,नीता !तुम्हारे तो बड़ी और छोटी दो ननदियां हैं , देखो बक्सा खुलाई में तुम्हारी कौन सी साड़ी पसंद करें। —- क्यों भला? वह मेरी साड़ी क्यों लेंगी? बीबी, तुम्हारी बहना ने भी तो मेरी सबसे सुंदर साड़ी ले ली थी। उसका तो मैंने ब्लाउज भी डिजाइनदार बनवाया था । रहने दो, भाभी ! मुंह ना खुलवाओ ! ” वह कोई बहुत अच्छी साड़ी ना थी”। इन्हें तो पसंद भी ना आई वह साड़ी। बड़ी दीदी आगे बोलीं तुम तो सिर्फ साड़ी की ही सुना रही हो, मैं तो अपने घर से जितने भी पैसे मैंने जोड़े थे ,वह सारे के सारे अपने पर्स में डाल कर ले गई थी, जाते ही मेरी सासू मां ने मेरा पर्स लिया और सारे पैसे निकाल कर बोलीं, यह तो बड़ों के पैर छुआई के पैसे होते हैं, तुम्हारी अम्मा ने यह हमारे लिए रखे हैं। मेरी साड़ी तो बुआ तक ने भी उठाई थी बड़ी बहन ने भाभी को सुनाया।
तभी मैया ने बीच-बचाव करके बोला , अरे !अपना काम करो ,बेकार की बातों में समय ना गंवाओ।
बाप रे ! यह कैसी रीतें, सच में ही अपने विदा होने से ज्यादा डर तो अब इस बात का हो रहा था कि इन रंग बिरंगी प्यारी-प्यारी साड़ियों में से नंद रानी कौन सी साड़ी उठाएंगी। ख्यालों में पहनी हुई हर साड़ी “जाती हुई दिख रही थी” शादी का घर , और दोपहर का समय, सहेलियों का आना जाना तो स्वाभाविक ही था। एक सहेली ने सुझाव दिया, पहली बारी में अच्छी साड़ियां ना लेकर जाना ।जब दूसरी बार फेरा डालने आओगी ना, तब ले जाना ।इससे तुम्हारी मनपसंद साड़ियां तो जाने से बच जाएंगी। ऐसा नहीं होता—- मैंने तो ऐसी ही समझदारी करी थी ,पर मेरी ननदिया ने पहली वाली साड़ी लौटा कर ,जब मैं दूसरी बार गई तो वह वाली साड़ी लेे ली थी दूसरी सहेली ने बताया।
हे राम ! शादी की सारी खुशी ही काफूर हो चुकी थी ।ऐसे लग रहा था मानो ससुराल नहीं ,कोई लुटेरों की बस्ती में जा रहे हों ।मन तो कड़वाहट से भर चुका था ।स्वपन में भी खुद को ननदों से लड़ता हुआ पाती थी। मैया शायद मन में फैला हुआ दुख समझ रही थी। मुस्कुराती हुई बोली ,बिटिया दुखी ना हो ,यह लेनदेन तो अपनापन बढ़ाते हैं ।इससे कुछ कोई घटता थोड़े ही है।जब घर की बेटियां कुछ लेकर जाती है तो वह जो आशीर्वाद देतीं है उससे गृहस्थी सफल हो जाती है। घर में दिन दूनी चार चौगुनी बरकत होती है। मैया के पुराने विचारों से नीता कहीं भी सहमत तो नहीं थी, पर हां जब मैया ने कहा अच्छा तुम्हारी कोई भी साड़ी जो तुम्हारी नंदनबाई लेगी वैसी ही साड़ी मैं तुम्हें दूसरी दिला दूंगी। सुनकर थोड़ा अच्छा तो लगा पर—————।
आखिर शादी की शुभ घड़ी भी आ गई साड़ियों से भी ज्यादा मैया से बिछड़ने का दुख हो रहा था। रोना था कि रोके नहीं रुक रहा था। ससुराल में उतरते ही जाने किन किन खेलों में व्यस्त हो गए। तभी सासु मां की आवाज आई, पिंकी ! अब बहू को कुछ आराम करने दो। जाओ , उसे कमरे में ले जाओ। ऐसा कैसे ? भाभी! तभी बुआ सास और ताई सास और सब की आवाज आई, ऐसे कैसे चली जाएगी? जब तक बक्सा खुलाई की रसम ना हो? हम भी तो देखें कि पिंकी कौन सी साड़ी पसंद करती है। नीता को ऐसा लगा जैसे थकान और बढ़ गई हो ।गहने ज्यादा चुभने लग गए हों ।बाहर तो बाहर ,मन में भी चुप्पी छा गई हो , मैया से बिछड़ने का दुख और भी ज्यादा बढ़ गया था । चेहरे पर गर्मी के कारण पसीने ज्यादा थे या आंसू? कहना मुश्किल था। मन में तरह-तरह के विचार आ रहे थे। रो रो कर चक्कर भी आ रहे थे तभी सासु मां की आवाज आई ,बिटिया बक्सा भाभी के कमरे में ही रखा गया है । नीता को वहां ही ले जाओ। बड़ी बीबी ,बहन बेटियों के लिए तुम्हारे भैया ने भागलपुर की बढ़िया बढ़िया साड़ियां मंगवाई हुई हैं ।काहे बहुरिया का मन हलकान करना। अपनी अपनी पसंद की साड़ी सब ही ले लेना। जाने बहू ने बक्से में क्या और कैसे जमाया होगा? काहे सबके सामने खोलना
पिंकी के साथ नीता दूसरे कमरे में चली गई, पिंकी ने बक्से की चाबी भाभी को देते हुए कहा ,भाभी, यह बाबूजी ने भिजवाई है । अब मैं चलूं? रुको तो, नीता ने बक्सा खोलते हुए बोला। दीदी मैंने बक्सा खोला है — कम से कम रीत की एक साड़ी तो उठाओ ना? मुझे बहुत अच्छा ही लगेगा ।मां ने कहा था ,तुम साड़ी लेकर जो आशीर्वाद दोगी ,उससे मेरी गृहस्थी सफल होगी। भाव विभोर होकर पिंकी नीता के गले लग गई और बोली, भाभी सब आपका ही है । हमारी अम्मा ने सिखाया है ,आप हमें प्यार दोगी, तो ही यह घर आगे बढ़ेगा।ममता की कोई कीमत नहीं होती। अपनी कसमें देकर नीता ने सबसे ऊपर वाली साड़ी पिंकी को रीत में उपहार स्वरूप दी । सच मानो ! अब नीता का मन साड़ी को देकर पहले से भी ज्यादा खुश हो रहा था।
मधु वशिष्ठ फरीदाबाद हरियाणा