बहु की समझदारी – खुशी

कमला एक घर में रहने वाली महिला थी जिसने घर में कुछ जोड़ना नहीं सीखा था।खाना घूमना नए कपड़े या फिर हर साल 3 महीने के लिए मायके जाना यही उसका शगल था।बहने समझाती भी दीदी जीजाजी की इतनी कमाई नहीं है थोड़ा बचाओ पर कमला चीड़ जाती इसलिए बहने भी कुछ नहीं कहती।पहले कमला के मायके और उसके घर में आधे घंटे का अंतर था तो वो सारा दिन वही पड़ी रहती।पर फिर कमला के पति राजन  को दूसरे शहर नौकरी लग गई तो उसे मजबूरी में जाना पड़ा।बड़ा रोना पीटना किया उसने पर उसके पिताजी बोले बेटा सबको जाना पड़ता हैं।जब तक वो अपने मायके के पास रहती थी उसको खाने पीने की चिंता नहीं थी वहीं से सब ले आती थी पर जब दूसरे शहर आई तो सारा काम करना पड़ता ।

काम से बचने के लिए वो बीमारी का नाटक करती ताकि उसे कोई काम के लिए ना बोले पति राजन सीधा साधा था वो सोचता सच में परेशानी होगी वो दफ्तर जाने से पहले सारा काम करके जाता खाना बनाने तक।घर में रिश्तेदार आते तो भी घर में कुछ लाकर ना रखती रिश्तेदार आकर इनके घर सामान भी भरते और खाना भी बनाते ये ससुराल वालों के लिए रवैया था।इसी कारण उन लोगों ने आना ही बंद कर दिया कि इनके घर आओ तो सामान भी खुद लाओ और खुद ही बनाओ।दो बच्चों की मां बनने पर भी कमला के स्वभाव में कोई फर्क नहीं पड़ा।

बच्चे कहते मां अच्छा बनाओ पर रोज़ वही दाल सब्जी इतना प्याज भर देती दाल में ।बच्चे जब नानी के यहां जाते अच्छा खाते तो नानी से शिकायत करते मम्मी कुछ नहीं बनाती।नानी भी समझाती बेटा बनाया कर मौसी भी बोलती की दीदी बच्चों के लिए बनाया करो।बच्चे नानी मौसी के हाथ का खुश होते पर यहां आकर वहीं ढाक के तीन पात ।फिर पता नहीं कहा से उसने एक बाबा का आश्रम ज्वाइन कर लिया फिर तो पूछो ही नहीं सुबह निकल जाती 7:30 बजे घर में घुसती बच्चों और राजन का कच्चा पक्का लंच पैक कर जाती।बच्चे बिना मां के ही स्कूल चले जाते।

राजन भी कहते तुम बाद में जाया करो।पर कमला किसी की ना सुनती अपनी ही जिद चलाती अब प्याज लहसुन खाना छोड़ दिया था तो घर में लाती भी नहीं थी बच्चे कुछ प्याज लहसुन डाल कर बनाने को कहते तो लड़ने बैठ जाती।लड़की भी बिल्कुल उसके जैसी ही थी।दसवीं तक पढ़ाई कर एक प्ले स्कूल में पढ़ाने लगी थी।बेटे आदर्श को कमला की जेठानी अपने साथ ले गई और उसका एडमिशन फाइन आर्ट्स कॉलेज में करवा दिया।

6 साल वही रह आदर्श ने पढ़ाई करी वहां पढ़ाई के साथ साथ आदर्श ने संस्कार भी सीखे। यहां बेटी रिया मुंहफट आलसी और जिद्दी थी।राजन आदर्श को पैसा भेजते उस पर भी कमला लड़ती सारा पैसा वहां भेज देते हो हमें भी तो पैसा चाहिए दिन पर दिन कमला पागल होती जा रही थी उस आश्रम के चक्कर में जो भी मिलता उससे बाबा बाबा की कहानी गाने लगती ।लोग उससे कतराने लगे थे।रिया का जहां पढ़ाने जाती थी वही चक्कर चल गया।लड़का भी कुछ खास पढ़ा लिखा नहीं था पर उसकी जिद के कारण उसकी शादी हुई जिसे कमला का समर्थन था।

ना ही कमला के मायके वाले और नाही ससुराल वाले खुश थे अब आदर्श को भी नौकरी लग गई थी लड़कियां देखी जाने लगी पर घर इतना गंदा टूटा फूटा।घर में कोई सामान नहीं कोई अपनी लड़की क्यों देगा।फिर आदर्श के लिए शालिनी का रिश्ता आया।आदर्श को शालिनी पसंद आई।लड़का शरीफ सीधा साधा है और शालिनी भी पढ़ी लिखी थी इसलिए शालिनी के पिता आलोक ने रिश्ता पक्का कर दिया शालिनी की मां  अंजलि जब उनके घर गई तो इतना गंदा घर तेल से भरे पर्दे।टूटे कप देखकर उसका दिल टूट गया।वो घर आकर आलोक जी से बोली ये रिश्ता मत करो मेरी बेटी कैसे रहेगी वहां आलोक बोले लड़का अच्छा है और अपनी बेटी भी घर बना लेगी।शादी हो कर शालिनी आई।

तो इतना गंदा घर खाना देख कर वो कुछ खाती ही नहीं थी।धीरे धीरे उसके ऊपर सब छोड़ सास घूमने चल देती।शालिनी खाना बनाती वो आदर्श को बहुत पसंद आता । शादी के दो सालों बाद आदर्श की ताई और ताऊजी आए वो घर पहुंचे।गरमा गरम चाय नाश्ता,खाना सब समय से मिला घर भी साफ सुथरा था।कहा पहले प्लास्टिक की प्लेट हुआ करती थी।स्टील की कटोरिया प्लेट्स ग्लास सब जगमगाते हुए।शालिनी भी बराबर आदर्श के साथ मेहनत करती थी।घर में ट्यूशन पढ़ाती थी।ससुर राजन की तबीयत भी अब ठीक नहीं रहती थी।

आदर्श की बेटी पिहू का पहला बर्थडे था ताई जी बोली मैं गुलाब जामुन बनाऊँगी।शालिनी ट्यूशन पढ़ा रही थी उन्हाेंने सारा सामान बाजार से मंगवा लिया।जब शालिनी नीचे आई तो वो चाय बनाने रसोई में गई वहां पर सामान रखा था। शालिनी ने पूछा ये सामान कौन लाया ? ताई जी बोली मैंने मंगवाया तुम्हारे घर में कुछ होता ही नहीं है? शालिनी को बहुत अपमानित महसूस हुआ उसने नीचे की अलमारी खोल दिखाया कि ताई जी घर में सब कुछ है।आदर्श के ताई ताऊ खुश हो कर गए और बोले आदर्श अब तेरी गृहस्थी की चिंता नहीं है।

कुछ सालों बाद आदर्श और शालिनी ने अपना घर बना लिया।4 कमरों का घर घर में सब सुख सुविधा।ससुर का देहांत हो गया था। शालिनी ट्यूशन ,स्कूल में पढ़।ती घर देखती हर आए गए का अच्छे से करती हर आदमी आदर्श और शालिनी की तारीफ करता दोनो ने कितनी समझदारी से घर जोड़ लिया।आदर्श इसका पूरा श्रेय शालिनी को देता और कमला इस बात से चीड़ जाती।फिर एक बार ताई जी और ताऊ जी कही से घूम कर इनके घर आए उन्होंने इनका नया घर भी नहीं देखा था उनके साथ उनके और भी दो रिश्तेदार थे।

घर देख ताईजी खुश हुई और बोली आदर्श की समझदार बहु ने घर का नक्शा बदल दिया।कहा पहले यहां खाने के भी लाले थे अब देखो सब कितना व्यवस्थित है। हीरा बहु है कमला चीड़ गई और बोली हा हमने तो कुछ किया ही नहीं सब इसी महारानी ने किया है इसे उड़ने का और ज्यादा अमीरी दिखाने का शौक है मेरे बेटे का पैसा खर्च करवाती हैं दुनिया को दिखाती हैं।बस चुप कमला एक शब्द नहीं इसी लड़की की वजह से आज तेरी समाज में इज्जत है अच्छा खा रही है पहन रही है हर जगह तेरा सम्मान हो रहा है ।

इन्हीं की वजह से तेरे राज़ में भी तो यहां आते थे पर घर में कुछ नहीं होता था।याद है वो कश्मीर वाला किस्सा दो हफ्ते पहले बताया था हम आयेंगे घर में सब्जी के नाम पर दो आलू और 2 प्याज अगली सुबह हमारी गाड़ी थी उस आलू प्याज में इनकी सब्जी बनती या हमारी दस बजे ये आटा और सब्जी लाए तब रात का और अगले दिन सुबह का खाना बना।आदर्श की शादी में तो मै एक माचिस की डिब्बी से लेकर तवे तक बर्तन भी ढो कर लाई थी क्योंकि इतने मेहमान होंगे ये तो कह देगी मेरे पास कुछ नहीं है।तेरी बहु ने समझदारी से पति का साथ दिया हर तकलीफ में खड़ी रही और तू उसे उल्टा सीधा बोल रही है।तेरी सगी भाभी कहती हैं आदर्श ने मोती दान किए होंगे तभी शालिनी उसे मिली ।

वरना कोई तेरे जैसी फूहड़ मिल जाती तो बस ज्यादा मुंह मत खुलवाओ एक बेटी नहीं संभाली गई तुमसे ।राजन भैया इतने सीधे सरल थे अगर तुम उन्हें साथ देती ना तो वो भी अपना घर खड़ा कर लेते।तुमने कभी बचाया ही नहीं बस मायका ,घूमना कपड़े तभी 10 वीं के बाद यदि आदर्श का एडमिशन मैने नहीं करवाया होता तो इस बच्चे का क्या होता।तुम्हारी बहने इसे सुना ती थी तुम हर साल बंबई ना आते तुम्हारे माता पिता ने पैसा बचाया होता तो दसवीं के बाद दूसरों से पैसे की भीख नहीं मांगनी पड़ती।

तेरे पापा मुझे चिट्ठी लिखते है आप उसके एडमिशन की स्लिप भेज दो मै खैराती संस्था से पैसा जुटा लूंगा।मैने भी उन्हें साफ बोल दिया था कि बच्चे को मैं अपने दम पर लाई हूं आप रहने दे।वो तो राजन भैया यहां काट कसर कर हर महीने पैसा भेजते थे ।तुम अपनी और अपने परिवार की बात मत करो।

बहु अगर तू कल इसका नहीं करेगी तो तुझे हमारे परिवार से कोई कुछ नहीं कहेगा। नहीं ताई जी ये मेरे संस्कार नहीं ये मुझे मेरे बच्चों को मेरे माता पिता सबको उल्टा सीधा बोलती है परंतु मैं सिर्फ इसलिए इनके साथ हूं क्योंकि ये मेरे पति की मां है और मैं इनसे अलग हुई तो अपने बच्चों को क्या सिखाऊंगी ताऊजी बोले देखो कमला तुमने शादी के 10 दिन में बेटी को ससुराल से अलग करवा दिया था।

यहां ये बच्ची तुम्हारे इतने गंदे व्यहवार के बाद भी तुम्हारे साथ खड़ी है।इसे कहते है घर जोड़ने की समझदारी।सही कहा जी हमारी बहु है ही समझदार।आदर्श हमेशा अपनी पत्नी की परछाई बन कर रहना और उसके आत्मसम्मान की रक्षा करना।सब भोजन करने बैठ गए और कमला एक तरफ मुंह फूला कर बैठ गई क्योंकि अब उसे पता चल चुका था उसकी मूर्खता और मायका प्रेम उसे ले डूबा था।

स्वरचित कहानी 

आपकी सखी 

खुशी

error: Content is protected !!