बेटी! ये तुम्हारे संस्कारों की परीक्षा है – सुदर्शन सचदेवा

“मम्मी, मैं ऑफिस के लिए लेट हो रही हूं… प्लीज़ आज आप पापा को दवाई दे देना,” रिया ने जल्दी-जल्दी बैग उठाते हुए कहा।

“बेटा, मैं भी मंदिर जा रही हूं,” सासू माँ सावित्री जी ने शांत स्वर में जवाब दिया।

रिया कुछ पल रुकी, फिर बिना कुछ बोले खुद ही पानी और दवाई लेकर अपने ससुर जी के कमरे में चली गई।

कमरे में हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही थी। बिस्तर पर बैठे अशोक जी खांस रहे थे।

“पापा जी, पहले दवाई ले लीजिए,” रिया ने प्यार से कहा।

अशोक जी मुस्कुरा दिए, “तुम रोज़ इतनी भाग-दौड़ करती हो, फिर भी सब संभाल लेती हो।”

रिया बस मुस्कुरा दी, लेकिन अंदर कहीं थकान जमा हो चुकी थी।

रिया एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती थी। सुबह घर, फिर ऑफिस, वापस आकर खाना, बच्चों की पढ़ाई… और ऊपर से ससुर जी की बीमारी। कई बार उसे लगता कि जिंदगी बस जिम्मेदारियों का नाम बन गई है।

उस रात वह बहुत थकी हुई थी। तभी उसकी मां का फोन आया।

“कैसी है मेरी बेटी?”

रिया की आवाज भर्रा गई, “मम्मी… कभी-कभी लगता है मैं सब नहीं कर पाऊंगी।”

मां कुछ पल चुप रहीं, फिर बोलीं—

“बेटी… याद है जब तू छोटी थी और तेरे दादाजी बीमार रहते थे? तब तू ही उनके पास बैठकर कहानी सुनाया करती थी।”

रिया हल्का सा मुस्कुराई, “हां मम्मी…”

“आज वही समय फिर आया है। फर्क बस इतना है कि तब तू बेटी थी, आज बहू है।

बेटी! ये तुम्हारे संस्कारों की परीक्षा है।

घर केवल दीवारों से नहीं चलता, किसी एक के धैर्य और प्रेम से चलता है।”

रिया की आंखें नम हो गईं।

अगले दिन ऑफिस में उसकी मीटिंग थी। उसी समय घर से कॉल आया कि अशोक जी की तबीयत अचानक बिगड़ गई है।

रिया तुरंत घर पहुंची। डॉक्टर ने कहा, “इनको कुछ दिन पूरी देखभाल की जरूरत है।”

रिया ने बिना सोचे एक हफ्ते की छुट्टी ले ली।

अब उसका पूरा दिन ससुर जी की सेवा में गुजरने लगा। कभी दवाई, कभी खाना, कभी रात को उठकर पानी देना।

लेकिन इस दौरान उसने एक चीज महसूस की—अशोक जी उसे बहू नहीं, बेटी की तरह देखने लगे थे।

एक रात अशोक जी ने धीमे स्वर में कहा—

“रिया, मैंने हमेशा सोचा था कि आजकल की लड़कियां सिर्फ अपने बारे में सोचती हैं।

लेकिन तुमने मेरी सोच बदल दी।”

रिया की आंखें भर आईं।

तभी दरवाजे पर खड़ी सावित्री जी सब सुन रही थीं।

उन्होंने आगे बढ़कर रिया का हाथ पकड़ा और कहा—

“मुझे माफ कर देना बेटा। मैं कभी खुलकर तुम्हारी तारीफ नहीं कर पाई।

लेकिन आज समझ आया कि संस्कार बड़ी-बड़ी बातों से नहीं, छोटे-छोटे त्याग से दिखते हैं।”

रिया पहली बार अपनी सास के गले लगकर रो पड़ी।

कुछ दिनों बाद अशोक जी की तबीयत काफी बेहतर हो गई।

घर मे फिर से हंसी लौट आई।

रविवार की शाम सब साथ बैठे थे। तभी रिया की छोटी बेटी परी स्कूल से मिली एक ट्रॉफी लेकर दौड़ी आई।

“मम्मा! मुझे ‘Best Values Award’ मिला है।”

रिया खुश होकर बोली, “वाह! मेरी बेटी तो बहुत अच्छी है।”

परी मासूमियत से बोली—

“टीचर ने पूछा था कि मैंने सबसे अच्छी बात किससे सीखी… तो मैंने आपका नाम लिखा।

क्योंकि आप कहते नहीं, करके दिखाते हो कि परिवार क्या होता है।”

कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।

सावित्री जी की आंखों से आंसू बह निकले।

उन्होंने धीरे से कहा—

“रिया… आज सच में तुम्हारे संस्कार जीत गए।”

रिया ने अपनी बेटी को सीने से लगा लिया।

उसे महसूस हुआ कि त्याग कभी व्यर्थ नहीं जाता।

बच्चे हमारे शब्द नहीं, हमारा व्यवहार सीखते हैं।

उस रात बालकनी में खड़ी रिया आसमान को देख रही थी।

फोन पर मां का मैसेज आया—

“कैसी हो बेटी?”

रिया मुस्कुराई और जवाब लिखा—

“मम्मी… परीक्षा मुश्किल थी, लेकिन आपके संस्कार पास हो गए।”

सुदर्शन सचदेवा

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