जयपुर के एक बड़े लेकिन शांत घर में सावित्री देवी अपने बेटे रोहन और बहु प्रिया के साथ रहती थीं। घर में किसी चीज़ की कमी नहीं थी, लेकिन सावित्री देवी के मन में एक डर हमेशा रहता था—
“आजकल की बहुएं कहाँ बुज़ुर्गों को समझती हैं…”
प्रिया शादी के बाद जब इस घर में आई, तो उसने महसूस किया कि उसकी सास हर बात में खुद को अलग-थलग रखती हैं। खाने की मेज़ पर भी कम बोलतीं, टीवी देखते समय भी चुप रहतीं।
रोहन ऑफिस में व्यस्त रहता था। उसे लगता था कि सब ठीक चल रहा है, लेकिन प्रिया ने सास की आंखों की उदासी पढ़ ली थी।
एक दिन उसने देखा कि सावित्री देवी पुराने एल्बम देखकर चुपचाप आंसू पोंछ रही थीं। प्रिया धीरे से उनके पास बैठ गई।
“मम्मी जी, ये फोटो किसकी है?”
सावित्री देवी की आंखें चमक उठीं।
“ये तुम्हारे पापा जी की है… उन्हें पुराने गाने बहुत पसंद थे।”
उस दिन पहली बार दोनों ने घंटों बातें कीं। प्रिया समझ गई कि सास को काम से ज्यादा अपनापन चाहिए।
अगले रविवार प्रिया सुबह जल्दी उठी। उसने पूरे घर में पुराने गाने चला दिए। रसोई से गरम-गरम बेसन के चीले की खुशबू आने लगी।
सावित्री देवी बाहर आईं तो हैरान रह गईं।
“अरे! आज क्या खास है?”
प्रिया मुस्कुराई,
“आज पापा जी वाला रविवार है।”
टेबल पर वही नाश्ता था जो उनके पति को पसंद था।
सावित्री देवी की आंखें नम हो गईं। कई साल बाद घर में वैसी ही रौनक लौटी थी।
धीरे-धीरे प्रिया ने घर की हर छोटी चीज़ में सास को शामिल करना शुरू कर दिया। बाजार जाना हो, रिश्तेदारों के यहां जाना हो या कोई नई साड़ी खरीदनी हो—वह हमेशा कहती,
“मम्मी जी, आपके बिना फैसला अधूरा है।”
एक दिन पड़ोस में किसी ने ताना मारते हुए कहा,
“बहु तो बहुत मीठा बोलती है, देखना धीरे-धीरे असली रंग दिखेगा।”
सावित्री देवी ने तुरंत जवाब दिया,
“मीठा बोलना भी संस्कार होता है, दिखावा नहीं।”
प्रिया यह सुनकर चुपचाप मुस्कुरा दी।
कुछ महीनों बाद रोहन का बिज़नेस घाटे में चला गया। घर का माहौल तनाव से भर गया। रोहन चिड़चिड़ा रहने लगा। एक रात उसने गुस्से में खाना तक नहीं खाया।
सावित्री देवी परेशान हो गईं। लेकिन प्रिया ने बड़ी समझदारी दिखाई। उसने रोहन को शांत किया और अगले दिन बिना किसी को बताए अपनी शादी में मिले कुछ गहने बैंक में गिरवी रख दिए ताकि घर की जरूरतें पूरी हो सकें।
जब सावित्री देवी को यह बात पता चली, तो उनकी आंखों से आंसू बह निकले।
“बहु, तूने अपने गहने तक दे दिए?”
प्रिया ने मुस्कुराकर कहा,
“मम्मी जी, गहने फिर आ जाएंगे… लेकिन परिवार की मुस्कान चली जाए, तो वापस लाना मुश्किल होता है।”
उस दिन सावित्री देवी ने पहली बार बहु को गले लगा लिया।
समय बदला। रोहन का काम फिर से चल पड़ा। घर में खुशियां लौट आईं। लेकिन अब इस घर की सबसे बड़ी खुशी पैसे नहीं, बल्कि रिश्तों की गर्माहट थी।
दीवाली की रात रिश्तेदार घर आए हुए थे। सब घर की सजावट और खुशी देखकर तारीफ कर रहे थे। तभी सावित्री देवी ने सबके सामने कहा—
“मेरे घर की असली लक्ष्मी ये सजावट नहीं… मेरी बहु प्रिया है।
इसने सिर्फ घर नहीं संभाला, हमारे टूटते मन भी जोड़ दिए।”
प्रिया की आंखें भर आईं। उसने झुककर सास के पैर छुए तो सावित्री देवी ने उसे उठाकर माथा चूम लिया।
उस पल रोहन मुस्कुराकर सोच रहा था—
“घर दीवारों से नहीं बनता… एक समझदार बहु के प्यार और धैर्य से बनता है।
सुदर्शन सचदेवा