“ममता की कोई कीमत नहीं – डॉ अनुपमा श्रीवास्तवा

हम लोग दूसरे जगह शिफ्ट हो रहे थे l सारा सामान पैक हो चुका था….कुछ हो रहा था….गाड़ी दरवाजे पर लगी थी ताकि हमलोगों को जाने में देरी ना हो जाए l.  

मैं बार -बार ताई को आवाज दे रहीं थी कि वो जल्दी से बिट्टू को दूध पीला दे…मुझसे वह ढंग से नहीं पी पाता है इसलिए मैंने थोड़ा जोर देकर कहा…..ताई आप के हाथ से वह बड़े आराम से दूध पी लेता है आप उसे …

अपने कमरे में ही ले जाकर वहीँ  पिला दीजिए….मैं कहना चाह रहीं थी कि….अंतिम बार…..लेकिन नहीं कह पाई उन्हें  कहीं बुरा. लग जाता!

  कुछ देर बाद. ताई…भरे मन से बिट्टू  को हमारे पास लेकर आई….उनकी आँखे आंसुओं से भरी हुई थीं…मैं खुद को  रोक नहीं पा रही थी,…कुछ समझ में नहीं आ रहा था l 

मैं कुछ बोलती इससे पहले मेरे पति ने कहा-” सीमी…ताई ने बिट्टू को अपने बच्चे से बढ़कर पाला है….हम अपने काम में इतने व्यस्त थे कि…दूसरा कोई चारा ही नहीं था….वह तो शुक्र मनाओ की ताई हमें मिल गई और उन्होंने उसे अपने बच्चे की तरह पाला….!”

              मुझे वह  दिन याद आने लगा जब हम इस नये शहर में आये थे l हम दोनों पति -पत्नी अपने छोटे से बच्चे के साथ बिल्कुल ही अकेले थे l  पति सुबह-सुबह ऑफिस चले जाते और मैं इस अनजाने घर में बिट्टू को एक हाथ में दबाए दूसरे हाथ से एक एक कर घर के सारे काम निबटाती थी l जब वह सोता तब मैं जल्दी जल्दी फ्रेश हो लेती और जैसे ही खाना खाने बैठती वह जग कर रोने लगता……l

उस दिन उसे गोद में लिए मैं दूध लेने गई थी….दुकान पर काफी भीड़ थी….मुझे समझ नहीं आ रहा था कि कैसे भीड़ में बच्चे को लेकर जाऊँ….जब तक मेरी बारी आती उससे पहले ही दूध खत्म हो गया….मुझे अपने आप पर बहुत गुस्सा आया…

गुस्सा इस बात का कि अब मैं  क्या करूंगी…भूख से बिलखते बच्चे को कैसे देखती रहूँगी…मैंने बिट्टू को एक नजर देखा वह मेरे गले में अपने बांहों को लपेटे लोगों को निहार रहा था….मुझे रोना आ रहा था…भारी कदमों से मैं पिछे मुड़ी…तभी एक बुढ़ी महिला ने पिछे से टोका….-” बेटा तुम यह ले लो ….मैं अपने लिए दूसरे जगह से ले लुंगी !”

उस महिला के हाथ में दूध का पैकेट था और वह मुझे प्यार से देख रही थीं….नहीं नहीं आप रहने दीजिए मैं ही चली जाती हूँ…आप बता दीजिए कहां मिलेगा….उस महिला ने अपनेपन से कहा-” बेटा क्यूँ शर्माती हो ले लो…मुझे पैसे दे दो…मैंने फिर भी मना किया तो उसने कहा-” ठीक है लाओ मुन्ने को दो मैं इसी दुकान पर बैठी हूं तुम दूध लेकर आओ! “

हमदोनों की बातचीत पास खड़े एक दंपति सुन रहे थे उन्होंने कहा कि बेटा….यह बड़ी ही भली महिला हैं दूध ले लो या फिर इन्हें पैसे दे दो यह लाकर दे देंगी तुम्हें….

मैंने बच्चे को गोद में देने के बजाय दूध लेना ही उचित समझा….उसने मुझे दूध का पैकेट दिया और चली गई….उनके जाने के बाद वहां खड़े दंपति ने बताया कि वह एक गरीब लेकिन भली महिला है तथा लोगों के घरों में काम करती है…मैंने उसका पता लिया और वापस घर आ गई l

पति जब घर आये तो मैंने उन्हें सारी घटनाओं का जिक्र किया उन्होंने कहा कि यदि वह तैयार हो जाती हैं तो अपने ही पास रख लो ….किसी और के यहां क्यों जायेगी बेचारी…हमें तो जरूरत है ही बिट्टू को देख भाल करने वाला…..!

फिर क्या था मैंने पता लगाया और उन्हें अपने घर में रख लिया…मेरे सोच से भी ज्यादा ममतामयी निकली ताई….

हाल ऐसा हो गया कि बिट्टू के साथ साथ वह हमारी भी जरूरत बन गईं थीं…बस यूं कहें कि कोई रिश्तेदार भी इतना नहीं कर सकता था जितना….ताई हमारे लिए करतीं थीं. 

हमने  कई बार लोगों के कहने पर उनकी ईमानदारी की परीक्षा ली पर हरबार हम खुद ही शर्मशार हुए….मैंने अपनी दबी हुई इच्छा ताई को बताया उन्होंने कहा-” बेटा तुम निश्चिंत होकर अपना काम करो मैं हूँ ना..!

उस दिन के बाद से ताई हमारे और मेरे बच्चे के लिए जीवन की डोर हो गईं थीं….बिट्टू मुझसे ज्यादा ताई के साथ खुश रहता था…ऐसा लगता था जैसे ताई ने जनम भर का बटोरा प्यार उसी के लिए इकट्ठा करके रखी था ⁶l कई बार तो रिश्तेदारों को शंका होने लगता था कि कोई अनहोनी ना हो जाए…मेरे विरोध पर वे चुप हो जाते थे….ऐसे ही तीन साल निकल गया….अचानक मेरे पति के ट्रांसफर का फरमान जारी हो गया….कोई उपाय नहीं था…जाना ही था l मैं विचलित हो गई थी क्या करूँ…ताई के बिना बिट्टू कैसे रह पायेगा…बिट्टू का ताई  से लगाव  ऐसा था कि मुझे डर लगने लगा था कि कहीं वह बीमार न हो जाए l 

हमने दो दिनों तक हिम्मत जुटाया और फिर ट्रांसफर वाली बात ताई को बताया…..बेचारी सुनते ही मौन हो गईं….हम लोग उनसे आँख नहीं मिला पा रहे थे…वह चुपचाप कमरे में चली गई जहां बिट्टू सोया हुआ था l

मेरे पति ने मुझे समझाया…देखो सीमी  ताई ने हमारे बच्चे को अपने बच्चे की तरह ही प्यार दिया है इसलिए हम जाने से पहले…उन्हें कुछ देकर जाएंगे जो उन्हें चाहिए…मैंने हामी भरी और भरे मन से समान पैकिंग करने लगी l 

आज वो दिन भी आ गया….गाड़ी आकर खड़ी हो गई…समान से ज्यादा पैर भारी हो रहा था….जैसे तैसे हम दोनों ने ताई को बुलाया ….मेरी तो हिम्मत जबाव दे चुकी थी….पति ने कहा-” ताई आपने जो भी किया है बिट्टू के लिए शायद उतना सीमी भी नहीं कर पाती….ताई ने एक शब्द भी नहीं बोला बस नज़रे झुका ली…  शायद वह नहीं चाहती थीं कि उनके आंखों में आये आंसू हम देख लें….कुछ भी जबाव नहीं दिया….मैंने पति की ओर देखा….तो वह मेरे इशारों को समझ गये…उन्होंने कहा-” ताई एक बात बोलूँ आप बुरा तो नहीं मानोगे….हम चाहते हैं कि आप बिट्टू  की देखभाल करने के बदले जो चाहें मांग लो हम जरूर पूरा करेंगे!”

ताई ने नजरे झुका ली कोई जबाव नहीं दिया और धीरे धीरे  कमरे से बाहर निकल गई….हम दोनों  एक दूसरे को देख रहे थे  कि अब कैसे समझाये….ताई ने माँ बाप से ज्यादा बच्चे पर अपना ममता लुटाया है..

ऐसे कैसे खाली हाथ छोड़कर जा सकते थे l 

बाहर गाड़ी वाला ड्राइवर जोड़ जोड़ से हॉर्न बजा रहा था….मैं भागकर कमरे में गई ताकि बिट्टू को ताई की गोद से ले सकूँ….वहां देखा तो ताई बिट्टू को अपने सीने से लगाए बिलख कर रो रहीं थीं…मैं उनकी ममता देख वहीं जड़ सी हो गयी…

मेरे पीछे पति आकर खड़े हों गये उनका हाल भी कुछ वैसा ही था….उनके कुछ बोलने से पहले ही ताई ने मेरे गोद में बिट्टू को देते हुए कहा…..बेटा  मेरी औलाद को भगवान  ने  मुझसे  बहुत  पहले ही छीन कर मेरी ममता को  लहूलुहान कर दिया था …

लेकिन तुमने मुझे फिर से उसे जीने दिया…..मेरी ममता की क़ीमत ना लगाओ….उनकी आंखों से झड़ झड़ बहते आंसुओं को देख हम दोनों पति पत्नी खुद को रोक न सके….ताई को गले से लगाया…मेरे पति ने भरे गले से कहा….ताई आज से आपकी ममता के हकदार हम भी हैं….आप हमेशा हमारे साथ रहेंगी!”

स्वरचित एवं मौलिक 

डॉ अनुपमा श्रीवास्तवा

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