मालाजी के परिवार में उनके सास ससुर और पति ,दो बच्चे थे।वे एक तेज स्वभाव की महिला थी।जब तक उनकी सास से बनी वे बहू की पूरी मदद करतीं।माला भी अच्छी बन सहयोग ले लेती।
अचानक उनकी सास को लकवे की शिकायत हो गई । उनके हाथ पैर अब कमजोर हो गये फिर भी वे धीरे-धीरे अपने काम कर लेती।
कुछ दिन के लिए बेटी पीहू ने आकर संभाल लिया।इन सबके दौरान माला जीबहुतचिड़चिड़ी रहती थी।पीहू पंद्रह दिन रह कर चली गई क्योंकि उसके बच्चों की परीक्षा भी नजदीक थी।
अब तक तो वह फिर भी थोड़ी ठीक थी पर ननद के जाने के बाद अकेले ही सब संभालने में चिढ़ जाती।पति ने समझाया कि उन्हें हम नहीं देखेंगे तो कौन करेगा।
बच्चे भी सहमे से रहते।सासू मां की इस हालत में भी वह किट्टी पार्टी, शापिंग सब कर रही थी। मां की देखभाल का जिम्मा घर की कामवाली श्यामा पर आ गया था जिसे ससुर जी पैसे दे देते।
उसने उस घर बहुत अच्छा समय व्यतीत किया था तो वह मन से ही सब काम करती।
कुछ वर्षों में सास ससुर दोनों का निधन हो गया। बच्चे भी बड़े हो गए थे। बेटी की शादी के बाद बेटे की भी शादी हो गई। निशा बहुत सुंदर, सुशील थी।
पर उसे वे हमेशा कमतर आंकती।अन्य लोगों की बहुओं से तुलना करतीं।एक दिन पड़ोस की निम्मी काकी किसी काम से आई तब भी वे निशा को थाने मार रही थी।आजकल की बहुएं क्या सेवा करेगी, खुद से ही फुर्सत नहीं मिलती।काकी से रहा नहीं गया।वे बोलीं तू रहने ही दे ।
हमें पता है कितनी सेवा की तूने अपनी सास की।बेचारी लकवे में भी अकेली पड़ी थी।वो तो भला हो श्यामा का जिसने उन्हें संभाल लिया।
आज श्यामा की बहूएं उसे संभाल रही हैं। तूने जो बोया वही काटेगी। फिर भी निशा अभी सहन कर रही है वे उसके संस्कार हैं।वक्त रहते अपना रवैया सुधार लें।
वरना आगे तो भगवान सब देख रहा है। माला जी की सच्चाई सामने आ गई थी। वे बहू से नज़र तक नहीं मिला पाईं और अंदर चली गई।
अरुणा गर्ग
स्वरचित