परिवार की नींव – सीमा श्रीवास्तव 

बाहर सड़क पर गाड़ियों का शोर था, लेकिन सत्तर वर्षीय सावित्री देवी के इस चार कमरों वाले आलीशान फ्लैट में एक अजीब सा, डरावना सन्नाटा पसरा हुआ था। दीवार पर टंगी पुरानी पेंडुलम घड़ी की टिक-टिक आज हथौड़े की तरह उनके कानों पर बज रही थी। आज उनके इकलौते पोते, रोहन की शादी थी।

शादी दिल्ली से दूर उदयपुर के एक भव्य पैलेस में हो रही थी, जहाँ घर के सभी लोग, रिश्तेदार और दोस्त दो दिन पहले ही जा चुके थे। पीछे रह गई थीं तो बस सावित्री देवी और उनकी देखभाल के लिए रखी गई एक चौबीस घंटे वाली नर्स।

सावित्री देवी की धुंधली आंखों से आंसुओं की एक कतार बहकर उनकी झुर्रियों वाली गालों पर सूख रही थी। उनका मन भी कर रहा था कि वह अपने पोते को दूल्हे के लिबास में देखें, उसके सिर पर सेहरा सजते हुए देखें और उसकी आरती उतारें।

लेकिन उनके बेटे विकास और बहू रितिका ने बड़ी ही ‘समझदारी’ और ‘व्यावहारिकता’ से फैसला सुना दिया था— “माँ जी, आपके घुटनों में गठिया है।

वहां पैलेस में बहुत सीढ़ियां हैं और डीजे का शोर आपके कानों के लिए ठीक नहीं रहेगा। आपको वहां बहुत तकलीफ होगी। आप घर पर आराम से रहिए, हमने आपके लिए फुल-टाइम नर्स रख दी है।”

कहने को तो यह उनके आराम के लिए लिया गया फैसला था, लेकिन सावित्री देवी की पकी हुई उम्र और तजुर्बे ने उस मीठे झूठ के पीछे की कड़वी सच्चाई को पढ़ लिया था।

सच तो यह था कि एक डेस्टिनेशन वेडिंग में, जहां सब लोग डिज़ाइनर कपड़ों में तस्वीरें खिंचवा रहे हों, वहां व्हीलचेयर पर बैठी एक बूढ़ी और कमज़ोर औरत उनकी ‘परफेक्ट तस्वीरों’ का हिस्सा नहीं बन सकती थी। बुजुर्गों को अब आशीर्वाद के लिए नहीं, बल्कि घर की रखवाली के लिए पीछे छोड़ दिया जाता है।

आंसुओं को पोंछते हुए सावित्री देवी का मन अतीत के पन्नों में उलझ गया। उन्हें अपना वो बचपन याद आ गया जब वे अपने पिता की ‘लाडो’ हुआ करती थीं।

मायके में उनके पैर ज़मीन पर नहीं पड़ते थे। शादी के बाद जब वे इस घर में आईं, तो उन्होंने अपना पूरा जीवन इसी परिवार की नींव मजबूत करने में लगा दिया।

विकास जब महज़ बारह साल का था, तब सावित्री के पति का देहांत हो गया था। उस कम उम्र में विधवा होने के बाद, सावित्री ने अपने गहने बेचकर और दिन-रात सिलाई करके विकास को पढ़ाया-लिखाया। उसने कभी अपने लिए एक नई साड़ी तक नहीं खरीदी, ताकि उसका बेटा किसी से पीछे न रहे।

और फिर जब रोहन का जन्म हुआ, तो विकास और रितिका दोनों अपनी कॉरपोरेट नौकरियों में व्यस्त थे। रोहन की पहली किलकारी से लेकर उसके स्कूल के पहले दिन तक, सब कुछ सावित्री ने ही संभाला था।

रोहन जब छोटा था, तो उनके गले में बाहें डालकर कहता था— “दादी, जब मेरी शादी होगी न, तो आप मेरी घोड़ी के आगे सबसे ज़्यादा डांस करना।” सावित्री उस वक्त हंस पड़ती थीं। आज वही रोहन घोड़ी चढ़ रहा था, और उसकी दादी सैकड़ों किलोमीटर दूर एक बंद कमरे में टीवी की स्क्रीन को घूर रही थी।

तभी उनके पास रखे टैबलेट की स्क्रीन रोशन हुई। यह टैबलेट विकास ने ही उन्हें पिछले जन्मदिन पर दिया था ताकि वे वीडियो कॉल पर बात कर सकें। स्क्रीन पर एक नोटिफिकेशन था। आज ‘मदर्स डे’ था। सावित्री देवी ने कांपते हाथों से टैबलेट उठाया और फेसबुक खोला।

सबसे ऊपर उनके बेटे विकास का ही पोस्ट था। विकास ने सावित्री के साथ अपनी एक पुरानी तस्वीर लगाई थी और साथ में एक लंबा-चौड़ा कैप्शन लिखा था— “मेरी माँ, मेरी दुनिया। आज रोहन की शादी के दिन आपकी बहुत याद आ रही है माँ। काश आपकी सेहत इजाज़त देती और आप यहां हमारे साथ होतीं। आपके आशीर्वाद के बिना हर खुशी अधूरी है। हैप्पी मदर्स डे, माँ!”

उस पोस्ट के नीचे सैकड़ों लोगों के कमेंट्स थे। कोई लिख रहा था, “वाह विकास जी, आप कितने श्रवण कुमार जैसे बेटे हैं,” तो कोई लिख रहा था, “बहुत ही भावुक पोस्ट।”

सावित्री देवी उन कमेंट्स को पढ़ती रहीं और उनके होंठों पर एक बेहद दर्द भरी, खोखली मुस्कान आ गई। इंटरनेट की इस नकली दुनिया में उनका बेटा एक आदर्श पुत्र होने का तमगा पहन रहा था, जबकि असलियत में उसने अपनी माँ को एक पुराने और बेकार हो चुके फर्नीचर की तरह घर के कोने में छोड़ दिया था। वास्तविकता यह थी कि अगर वो सच में चाहते, तो क्या एक व्हीलचेयर का इंतज़ाम करके उन्हें वहां नहीं ले जा सकते थे? क्या कुछ घंटों के लिए संगीत की आवाज़ कम नहीं की जा सकती थी?

लेकिन आजकल के रिश्तों की यही सच्चाई है। लोग अपनों से प्यार तो करते हैं, लेकिन अपनी सहूलियत के हिसाब से। जब तक आप उनके काम आ रहे हैं, बच्चे पाल रहे हैं, घर संभाल रहे हैं, तब तक आप घर का अहम हिस्सा हैं। जैसे ही आप कमज़ोर पड़ते हैं, आपके हिस्से में एक ‘केयरटेकर’ और एकांत छोड़ दिया जाता है। सोशल मीडिया पर रिश्ते निभाना आसान है, क्योंकि उसमें सिर्फ कुछ शब्द खर्च होते हैं, वक्त और जज़्बात नहीं।

सावित्री देवी ने टैबलेट का स्क्रीन बंद कर दिया। उन्होंने गहरी सांस ली और अपने आंसुओं को पल्लू से पोछ लिया। अब उन्हें कोई शिकायत नहीं थी। उन्होंने अपने हिस्से का जीवन जी लिया था, अपना फर्ज़ पूरी ईमानदारी से निभा दिया था। अगर उनके बच्चों की खुशी उन्हें पीछे छोड़ जाने में थी, तो वे यही सही। उन्होंने सामने रखे भगवान के मंदिर की ओर हाथ जोड़े और अपने पोते के सुखी जीवन की प्रार्थना की। उनकी इस खामोशी में एक ऐसी गरिमा थी, जो इंटरनेट के किसी भी दिखावटी पोस्ट से बहुत ऊपर थी।

क्या आपने भी अपने आस-पास ऐसे बुजुर्गों को देखा है जो अपनों की खुशी और उनकी ‘सहूलियत’ के लिए अपनी इच्छाओं का गला घोंट देते हैं? क्या सोशल मीडिया का दिखावा हमारे असल रिश्तों की गर्माहट को खत्म कर रहा है? अपने विचार कमेंट बॉक्स में ज़रूर साझा करें।

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लेखिका : सीमा श्रीवास्तव 

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