घर में शहनाइयां बज रही है, खुशी का माहौल है। सारा शोर एक बंद दरवाजे के पीछे बंद हो गया और उस शोर में नवी को एक कड़कती आवाज आई “बहु आज से इस घर की और मेरे बेटे की जिम्मेदारी तुम्हारी है।”
*१ साल बाद*
आज कल आप दफ्तर से इतनी लेट आने लग गए, काम का ज्यादा प्रेशर हैं क्या? नवी ने चिंतित आवाज में अपने पति रोहित से पूछा। उसका पति जल्दी में था इसीलिए उसको बिना जवाब दिए चला गया। उधर नवी का मुंह मुरझा गया लेकिन अपनी सास को देख कर वो हल्का सा मुस्कुराई और रसोई में चली गई।
नवी और रोहित की शादी को एक साल हो गया था और उनका रिश्ता पूरा विश्वास पर टिका हुआ था पर कुछ समय से नवी की सास को वो विश्वास की डोरी कमजोर होती दिख रही थी, इससे पहले वो डोरी टूटे उसने कुछ देर दोनों के नजरिए को समझना चाहा। ऐसे काफी समय तक चला पर एक दिन कुछ ऐसा हुआ कि उसने बीच में आकर बात को सुलझानी चाही।
उस रात रोहित काफी लेट हो गया था और नवी नींद से उठी और पूछा “आज आप इतनी लेट कैसे हो गए, खाना खा लीजिए”। रोहित एकदम से झल्ला उठा और चिल्लाकर बोला “तुम क्या मुझे हर बार मुझे लेट आने का पूछती रहती हू, तुम तो सारा दिन घर पर रहती हो, कभी दफ्तर आओ तो पता चले तुम्हे।
” नवी की आँखें भर आई और बोली “आप ऐसा क्यों बोल रहे है, मुझे तो बस आपकी फिक्र रहती है।” रोहित बोला “तुम्हे मेरी कोई फिक्र नहीं है, तुम्हे तो बस लग रहा है कि मैं काम की जगह कही चक्कर चला रहा हू।” ऐसा नहीं है… वो तो… इससे पहले नवी कुछ बोले वो रो पड़ी।
रोहित को ये नहीं पता था कि उसकी सास ये सब देख रही है। वो नवी के पास गई और इससे पहले कुछ बोले नवी बोल पड़ी “मुझे माफ कर दीजिए मां, मेरी वजह से…” इससे आगे वो कुछ बोले उसकी सास बोली “तुम्हारी कोई गलती नहीं है, तो तुम किस चीज की माफी मांग रही हो।
बल्कि मुझे तुम पर गर्व है, कि तुम्हे अपने रिश्ते पर विश्वास है, और यहां पर *विश्वास की डोर बहुत मजबूत होता है* ना वो रिश्ता बहुत लंबा चलता है, मैं रोहित से बात करूंगी।
अगले दिन रविवार था, सुबह सुबह रोहित को उसकी मां ने उठाया और बोला “मेरे लिए चाय बना कर लाओ”। रोहित नींद से उठा और बोला “मां मैं थका हुआ हू, नवी कहा है उसको बोल दो। उसका काम है चाय बनाना।” उसकी मां बोली “मैने जो बोला वैसा करो।” कुछ देर बाद रोहित त्यार हो कर आया और अपनी मां के लिए चाय बनाई।
फिर धीरे धीरे करके उससे घर के सारे काम करवाए और अगर कुछ वो पलटकर बोलता तो उसकी मां उसको बोलती “घर का काम ही है बस बैठे बैठे हो जाता है”।
शाम तक उसकी बुरी हालत हो गई थी जबकि उसने अभी सबके लिए खाना नहीं बनाया था, वो नवी बना रही थी। रोहित ने अपनी मां को बोला “मां ये काम तुम नवी को भी बोल सकती थी।” ये वो काम इतने समय से करती आ रही है, पर आज तक कभी उसने शिकायत नहीं की।
उसको तुम पर इतना भरोसा है, तुम्हारा ध्यान रखती है और तुम हो उस पर चिल्ला रहे थे। रोहित बोला “पर मां, मैं थका हुआ था…” इससे आगे कुछ बोले उसकी मां बोली “थकी हुई तो नवी भी होती है, सारे घर को देखना, खाना बनाना हो या हमें दवाई देना और फिर तुम्हारा इंतजार करना, तुम्हे पता है उसकी नींद भी पूरी नहीं होती।
रोहित बोला “मैने उसको थोड़ी बोला है मेरे लिए ये सब करने के लिए।” करने को तो मुझे भी किसी ने नहीं बोला था तुम्हारा और तुम्हारे पापा का ध्यान रखने के लिए पर अपनो के लिए वो अपना पन वो परवाह वो ध्यान रखना सब आ जाता है।
रोहित को बात समझ आ गई थी। उसने नवी को बुलाया और सबके सामने उससे माफी मांगी और अपनी मां का आशीर्वाद लिया।
लेखिका
तोषिका