निस्वार्थ

इस बार देवकीनंदन ने भी अपने जोड़े हुए आखिरी तीन हज़ार रुपये उस फंड में डाल दिए। उन्हें पता था कि 100 लोगों में से उनका नाम निकलना किसी चमत्कार से कम नहीं है,

लेकिन डूबते को तिनके का सहारा ही बहुत होता है। उन्होंने रात भर अपनी आँखों में आंसू लिए भगवान विश्वनाथ से प्रार्थना की, “हे प्रभु! मेरी बच्ची की जान बचा लो। इस बार किसी भी तरह पर्ची में मेरा नाम निकाल दो, मैं जीवन भर तुम्हारा ऋणी रहूंगा।”

बनारस की तंग गलियों में करघे की खट-खट की आवाज़ के बीच देवकीनंदन का पूरा जीवन बीता था। देवकीनंदन एक बेहद स्वाभिमानी और ईमानदार बुनकर थे। उनके हाथ की बुनी बनारसी साड़ियों की तारीफ दूर-दूर तक होती थी। उनके परिवार में बस उनकी सात साल की पोती, गौरी थी।

कुछ साल पहले एक हादसे में देवकीनंदन ने अपने बेटे और बहू को खो दिया था, तब से गौरी ही उनके जीने का एकमात्र सहारा थी। देवकीनंदन ने कभी किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। चाहे कितनी भी तंगी क्यों न हो, उन्होंने हमेशा अपनी मेहनत की सूखी रोटी को ही अमृत माना।

लेकिन नियति को शायद उनका एक और इम्तिहान लेना था। कुछ दिनों से गौरी बहुत बीमार रहने लगी थी। जब देवकीनंदन उसे शहर के बड़े अस्पताल ले गए, तो डॉक्टर की बात सुनकर उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। डॉक्टर ने बताया कि गौरी के दिल में एक छेद है और जल्द से जल्द एक बड़ा ऑपरेशन करना होगा। इस ऑपरेशन और दवाइयों का खर्च लगभग तीन लाख रुपये था।

तीन लाख रुपये! एक गरीब बुनकर के लिए यह रकम किसी पहाड़ से कम नहीं थी। देवकीनंदन ने दिन-रात करघे पर काम करना शुरू कर दिया, लेकिन सूत की बुनाई से इतने पैसे इतनी जल्दी कैसे इकट्ठे होते? उनके चेहरे की झुर्रियों में अब चिंता की गहरी लकीरें खिंच गई थीं।

बनारस के बुनकर संघ का एक पुराना नियम था। हर साल दीपावली से पहले संघ के 100 सदस्य तीन-तीन हज़ार रुपये मिलाकर एक ‘कमेटी’ (फंड) बनाते थे। कुल जमा रकम तीन लाख रुपये होती थी। महीने के अंत में एक लकी ड्रॉ निकाला जाता था, और जिस भी सदस्य के नाम की पर्ची निकलती, उसे वो पूरे तीन लाख रुपये मिल जाते थे। यह एक तरह का जुआ ही था, लेकिन मुसीबत के समय यह किसी एक परिवार के लिए बड़ा सहारा बन जाता था।

इस बार देवकीनंदन ने भी अपने जोड़े हुए आखिरी तीन हज़ार रुपये उस फंड में डाल दिए। उन्हें पता था कि 100 लोगों में से उनका नाम निकलना किसी चमत्कार से कम नहीं है, लेकिन डूबते को तिनके का सहारा ही बहुत होता है। उन्होंने रात भर अपनी आँखों में आंसू लिए भगवान विश्वनाथ से प्रार्थना की, “हे प्रभु! मेरी बच्ची की जान बचा लो। इस बार किसी भी तरह पर्ची में मेरा नाम निकाल दो, मैं जीवन भर तुम्हारा ऋणी रहूंगा।”

बुनकर संघ के अध्यक्ष, रमन बाबू, देवकीनंदन की इस मजबूरी और गौरी की बीमारी के बारे में भली-भांति जानते थे। रमन बाबू के दिल में देवकीनंदन के लिए बहुत इज़्ज़त थी। ड्रॉ वाले दिन, जब सब लोग अपनी-अपनी पर्चियां बॉक्स में डाल रहे थे, तो रमन बाबू ने चुपचाप अपनी पर्ची पर अपना नाम लिखने के बजाय ‘देवकीनंदन’ लिख दिया। उन्होंने मन ही मन सोचा कि शायद इसी बहाने देवकीनंदन का नाम आ जाए और उनकी मदद हो जाए, भले ही इसकी संभावना बहुत कम थी।

शाम को संघ के प्रांगण में सभी 100 बुनकर इकट्ठे हुए। सबके दिलों की धड़कनें तेज़ थीं, लेकिन देवकीनंदन की आँखें बॉक्स पर ऐसे टिकी थीं जैसे उसी में उनकी पोती की सांसें बंद हों। रमन बाबू ने एक छोटे बच्चे को बुलाया और उससे उस कांच के बड़े से बॉक्स में हाथ डालकर एक पर्ची निकालने को कहा।

बच्चे ने अपना छोटा सा हाथ बॉक्स में डाला, पर्चियों को घुमाया और एक मुड़ी हुई पर्ची बाहर निकाल ली। पूरे प्रांगण में सन्नाटा पसरा था। रमन बाबू ने कांपते हाथों से उस पर्ची को खोला। जैसे ही उनकी नज़र पर्ची पर पड़े नाम पर गई, उनके चेहरे पर एक अद्भुत चमक आ गई। उन्होंने माइक पर भारी लेकिन खुशी से भरी आवाज़ में घोषणा की— “इस बार की कमेटी के विजेता हैं… हमारे देवकीनंदन काका!”

यह सुनते ही देवकीनंदन वहीं ज़मीन पर घुटनों के बल बैठ गए। उनकी आँखों से आंसुओं का सैलाब फूट पड़ा। उन्होंने दोनों हाथ आसमान की तरफ उठाए और ईश्वर को धन्यवाद दिया। आसपास खड़े सभी बुनकरों ने तालियां बजाकर उन्हें बधाई दी। रमन बाबू ने तीन लाख रुपये से भरा लिफाफा देवकीनंदन के हाथों में सौंप दिया। देवकीनंदन ने लिफाफा माथे से लगाया और रुंधे हुए गले से बोले, “आज मेरे महादेव ने मेरी सुन ली। अब मेरी गौरी को कुछ नहीं होगा। आप सबका बहुत-बहुत धन्यवाद।” देवकीनंदन वहां से सीधे अस्पताल की ओर दौड़ पड़े, उनका स्वाभिमान भी सुरक्षित था और उनकी पोती की जान भी।

कुछ देर बाद, जब भीड़ छंट गई और प्रांगण खाली हो गया, तब रमन बाबू उस कांच के बॉक्स को समेटने के लिए आगे बढ़े। उन्हें लगा कि चलो, भगवान की कृपा से उनकी लिखी पर्ची ही बच्चे के हाथ में आ गई। उन्होंने ऐसे ही उत्सुकतावश बॉक्स में बची हुई पर्चियों में से एक पर्ची निकाली और उसे खोला।

उस पर्ची पर लिखा था— ‘देवकीनंदन’।

रमन बाबू चौंके। उन्होंने तुरंत दूसरी पर्ची खोली। उस पर भी ‘देवकीनंदन’ लिखा था। उनके हाथ तेज़ी से चलने लगे। तीसरी, चौथी, पांचवीं… उन्होंने एक-एक करके बॉक्स में पड़ी सारी 99 पर्चियां खोल डालीं। उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं और पलकों से आंसू छलक पड़े। उस बॉक्स में मौजूद हर एक पर्ची पर सिर्फ और सिर्फ ‘देवकीनंदन’ का ही नाम लिखा हुआ था।

रमन बाबू का सीना गर्व से चौड़ा हो गया। संघ के उन 100 गरीब और मेहनतकश बुनकरों ने बिना एक-दूसरे को बताए, या शायद एक मौन सहमति से, अपनी-अपनी पर्चियों पर देवकीनंदन का नाम लिख दिया था। वे सब चाहते तो चंदा इकट्ठा करके सीधे देवकीनंदन के हाथ में पैसे रख सकते थे, लेकिन वे जानते थे कि देवकीनंदन जैसा स्वाभिमानी व्यक्ति कभी किसी की ‘खैरात’ या दान स्वीकार नहीं करेगा। इसीलिए, गौरी की जान बचाने और देवकीनंदन का स्वाभिमान बनाए रखने के लिए, पूरे संघ ने अपनी किस्मत और अपने पैसों का बलिदान दे दिया था।

मदद का यह तरीका इतना पवित्र और निस्वार्थ था कि रमन बाबू को उन सभी अनपढ़ बुनकरों में ईश्वर का रूप नज़र आने लगा। उन्होंने सिखा दिया था कि दान वह नहीं जो देने वाले का अहंकार बढ़ाए और लेने वाले को छोटा महसूस कराए। सच्चा दान वह है जो लेने वाले को यह एहसास दिलाए कि वह उसकी अपनी ही जीत है।

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