“सुमन ताई, आज ये सूखी लाल मिर्च, लहसुन और राई का मसाला आप सिलबट्टे पर पीस देंगी क्या?” काव्या ने रसोई के दरवाज़े पर खड़ी अपनी कामवाली ताई से बेहद झिझकते हुए और धीमी आवाज़ में पूछा।
सुमन ताई ने एक पल के लिए काव्या की तरफ देखा और फिर घबराकर अपने दोनों कान पकड़ लिए। “अरे नहीं बहू जी! मुझे मेरे काम से मत निकलवाओ। अगर तुम्हारी सासू माँ यानी मालकिन को भनक भी लग गई कि उनके घर का मसाला मिक्सी या मैंने पीसा है, तो वो पूरे घर को सिर पर उठा लेंगी। पिछली बार जब मैंने तुम्हारे कहने पर कपड़े धो दिए थे, तो उन्होंने मेरी सौ रुपये पगार काट ली थी। मुझे माफ करो बहू जी, ये जोखिम मैं नहीं ले सकती।”
काव्या ने एक फीकी सी मुस्कान के साथ सुमन ताई के हाथ अपने हाथों में ले लिए। “कोई बात नहीं ताई, मैं समझ सकती हूँ। आपको डरने की ज़रूरत नहीं है, आप बाकी काम खत्म करके घर जाइए। मैं खुद धीरे-धीरे पीस लूंगी।” सुमन ताई अपना काम खत्म करके चली गईं, लेकिन काव्या वहीं रसोई के स्लैब के पास खड़ी सिलबट्टे को एक अजीब सी बेबसी से घूरती रही।
अब जो भी यह नज़ारा देख रहा होगा, उसके मन में यही सवाल उठ रहा होगा कि आखिर काव्या इतनी सी बात के लिए कामवाली की मिन्नतें क्यों कर रही थी? मसाला ही तो पीसना है, उसमें कौन सा पहाड़ तोड़ना है? और अगर सिलबट्टे पर नहीं पीसना, तो मिक्सी किस दिन के लिए है? आज के ज़माने में कौन घंटों पत्थर पर रगड़-रगड़ कर चटनी या मसाला पीसता है? और बहुत सी पुरानी पीढ़ी की महिलाएं यह भी सोच रही होंगी कि “इसमें रोने वाली क्या बात है? हमने तो अपने ज़माने में बीस-बीस लोगों के परिवार का मसाला सिलबट्टे पर पीसा है, वो भी तब जब हम पेट से होते थे। आजकल की लड़कियों के नखरे ही खत्म नहीं होते।”
लेकिन कहानी का सच सिर्फ उतना नहीं होता जितना बाहर से दिखाई देता है। काव्या कोई कामचोर या नखरे वाली बहू नहीं थी। उसकी असली परेशानी कुछ और ही थी, जिसे उसकी सासू माँ, सुमित्रा देवी, समझने को तैयार ही नहीं थीं। दरअसल, सर्दियों के इस मौसम में ठंडे पानी और लगातार बर्तन-कपड़े धोने की वजह से काव्या के हाथों में बहुत भयंकर एलर्जी हो गई थी। उसकी उंगलियों के पोरों की चमड़ी छिल गई थी और हथेलियों में जगह-जगह दरारें पड़ गई थीं। डॉक्टर ने उसे साबुन और तीखी चीज़ों से दूर रहने की सख्त हिदायत दी थी।
पर सुमित्रा देवी अपने पुराने उसूलों की बहुत पक्की थीं। उनके हिसाब से मिक्सी में पिसे हुए मसाले से सब्जी का स्वाद मर जाता था और “असली घर” वही होता था जहाँ रसोई से सिलबट्टे की ‘घिस-घिस’ की आवाज़ आए। उनका मानना था कि जब उन्होंने अपने ज़माने में अपनी सास के ताने सहकर, बिना उफ किए सब कुछ सहा है, तो उनकी बहू को भी ये सब सीखना ही होगा। उनके लिए काव्या के हाथों की एलर्जी एक ‘आजकल की लड़कियों का बहाना’ मात्र थी। “अरे, थोड़ा सरसों का तेल लगा लो, सब ठीक हो जाएगा। हमारे समय में तो ऐसे ही होता था,” यह कहकर उन्होंने काव्या की तकलीफ को सिरे से खारिज कर दिया था।
काव्या ने एक गहरी सांस ली। उसने अपनी कटी-फटी उंगलियों पर थोड़ा सा नारियल का तेल मला और ज़मीन पर एक बोरी बिछाकर सिलबट्टे के सामने बैठ गई। लाल मिर्च के बीज और तीखी राई जैसे ही पत्थर पर रगड़े जाने लगे, उसकी गंध से ही आँखों में पानी आने लगा। लेकिन असली दर्द तब शुरू हुआ जब वह पीसा हुआ गीला मसाला काव्या की छिली हुई उंगलियों के संपर्क में आया। ऐसा लगा जैसे किसी ने खुले घाव पर उबलता हुआ तेज़ाब डाल दिया हो। काव्या के मुंह से एक दर्दनाक सिसकी निकल गई। उसकी आँखें लाल हो गई थीं और आंसुओं की धार उसके गालों से होती हुई उसकी ठुड्डी तक पहुँच गई। वह एक हाथ से अपनी आँखें पोंछती और दूसरे हाथ से पत्थर को धक्का देती। हर एक रगड़ के साथ उसकी उंगलियों से खून की बारीक बूंदें रिसने लगी थीं, जो मसाले के लाल रंग में छिप जाती थीं।
तभी घर के मुख्य दरवाज़े के खुलने की आवाज़ आई। काव्या के पति, अनुराग, आज ऑफिस से आधे घंटे पहले आ गए थे। घर में घुसते ही जब उन्होंने रसोई की तरफ देखा, तो उनके कदम वहीं ठिठक गए। काव्या ज़मीन पर बैठी थी, उसके बाल पसीने से माथे पर चिपके थे, वह लगातार रो रही थी और कांपते हाथों से मसाला पीस रही थी।
अनुराग ने अपना लैपटॉप बैग वहीं सोफे पर फेंका और दौड़कर रसोई में आया। उसने झटके से काव्या के हाथ से बट्टा छीन लिया। जब उसने काव्या के लाल, सूजे हुए और खून रिसते हाथों को देखा, तो उसका दिल बैठ गया।
“ये क्या पागलपन है काव्या? डॉक्टर ने तुम्हें सख्त मना किया था ना? फिर तुम ये आग अपने हाथों में क्यों ले रही हो?” अनुराग की आवाज़ में गुस्सा और बेबसी दोनों थे।
काव्या ने अपने हाथ पीछे खींचते हुए रुंधे गले से कहा, “छोड़ो अनुराग, माँ जी नाराज़ हो जाएंगी। उन्हें आज यही सब्जी खानी है, मैं बस खत्म करने ही वाली हूँ।”
उसी वक्त सुमित्रा देवी अपने कमरे से बाहर आईं। “क्या हो गया? रसोई में इतना शोर क्यों है?”
अनुराग अपनी जगह से खड़ा हुआ। उसने सुमित्रा देवी की तरफ देखा। उसकी आँखों में आज कोई लिहाज़ नहीं, बल्कि एक सवाल था। “माँ, आप हमेशा कहती हैं ना कि आपने अपने ज़माने में बहुत तकलीफें सही हैं? आपकी सास आपको बुखार में भी सिलबट्टे पर मसाले पीसने को मजबूर करती थीं? आप अक्सर रोते हुए हमें वो किस्से सुनाती थीं।”
सुमित्रा देवी थोड़ा सकपकाईं, “हाँ… तो? वो तो हमारे ज़माने का नियम था। औरतें ऐसे ही घर संभालती हैं।”
“तो माँ,” अनुराग की आवाज़ अब भारी हो गई थी, “जिन तकलीफों ने आपको इतना रुलाया, जो दर्द आपको आज तक याद है, वही दर्द आप अपनी बहू को क्यों दे रही हैं? क्या ये ज़रूरी है कि जो ज़ुल्म आपने सहा, वो अगली पीढ़ी भी सहे? स्वाद और परंपराओं के नाम पर आप अपनी ही बेटी जैसी बहू के रिसते हुए घावों को कैसे अनदेखा कर सकती हैं? क्या हमारी मशीनें और हमारी तरक्की हमारे अपनों की तकलीफ से छोटी हो गई है?”
अनुराग के इन शब्दों ने सुमित्रा देवी को भीतर तक झकझोर दिया। उन्होंने काव्या के सूजे हुए और छिले हाथों को पहली बार इतने ध्यान से देखा। काव्या डर के मारे सिर झुकाए खड़ी थी। सुमित्रा देवी को अचानक उस छिले हुए हाथ में अपना तीस साल पुराना वो हाथ नज़र आया, जो कभी उनकी सास के डर से ऐसे ही खून के आंसू रोता था। जाने-अनजाने में, वह भी अपनी सास जैसी ही कठोर बन गई थीं।
सुमित्रा देवी धीरे से आगे बढ़ीं। उन्होंने काव्या के कांपते हाथों को अपने हाथों में लिया। उनकी अपनी आँखों में भी नमी तैर गई थी। “मुझे माफ कर दे बेटा। इंसान उम्र के साथ समझदार होता है, पर मैं अपने पुराने ढर्रे के अहंकार में अंधी हो गई थी। मैंने तेरा दर्द समझा ही नहीं।”
सुमित्रा देवी ने अनुराग की तरफ मुड़कर कहा, “बेटा, जा वो मिक्सी निकाल कर ला। आज से इस घर में स्वाद से ज़्यादा मेरी बेटी के हाथों की कीमत होगी।”
उस दिन मिक्सी में पीसे गए मसाले से बनी सब्जी शायद सुमित्रा देवी के जीवन की सबसे स्वादिष्ट सब्जी थी, क्योंकि उसमें पुराने कठोर उसूलों की कड़वाहट नहीं, बल्कि समझ और प्यार की मिठास घुली थी।
क्या आपने भी कभी अपने आस-पास या अपने घर में ऐसी परिस्थितियों को देखा है जहाँ पुरानी मान्यताओं के नाम पर महिलाओं की खामोश तकलीफों को अनदेखा कर दिया जाता है? क्या एक सास के लिए उस दर्द को तोड़ना ज़रूरी नहीं है जो उसने खुद सहा हो? अपनी राय हमें ज़रूर बताएं।
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