संतोष के आंसू – प्रियंका नाथ

“क्या कर रही हो तुम मीरा? पागल हो गई हो क्या?” कमरे में घुसते ही कमला जी की आवाज़ में एक तीखापन और गहरी हैरानी थी। उनकी नज़र बिस्तर पर रखे उस लाल मखमली डिब्बे पर थी, जिसमें मीरा का पुश्तैनी भारी सोने का हार और कंगन रखे हुए थे। साथ ही मेज पर बैंक की एक टूटी हुई फिक्स डिपॉजिट की रसीद भी पड़ी थी।

मीरा ने शांति से अपनी माँ की तरफ देखा और अपने काम में लगी रही। वह बड़ी सावधानी से उन गहनों को एक साफ कपड़े में लपेट रही थी।

कमला जी से रहा नहीं गया। वह मीरा के पास आईं और उसका हाथ पकड़ते हुए बोलीं, “तुमने मेरी बात सुनी नहीं? अपने चचेरे जेठ की बेटी की शादी के लिए तुम अपना पुश्तैनी सोना बेच रही हो और अपनी बचत तोड़ रही हो? तुम्हारी अपनी एक बेटी है, सिया। कल को उसे मेडिकल की पढ़ाई के लिए बाहर भेजना होगा,

तब क्या कटोरा लेकर मांगोगी? ये सोना और ज़मीन-जायदाद बुरे वक्त के लिए होते हैं, ऐसे ही किसी पर लुटाने के लिए नहीं। और वैसे भी, वो तुम्हारे पति के सगे भाई तो हैं नहीं, दूर के ताऊ जी के बेटे-बहू हैं। उनके लिए इतना सब करने की क्या ज़रूरत है? ज्यादा से ज्यादा शगुन में एक सोने की चेन या बीस-पच्चीस हज़ार का लिफाफा दे देना। दुनिया इतना ही करती है।”

मीरा ने गहनों का डिब्बा बंद किया, एक गहरी सांस ली और अपनी माँ की आँखों में सीधा देखते हुए कहा, “दुनिया क्या करती है, मुझे नहीं पता माँ। लेकिन मुझे यह पता है

कि इंसानियत और अहसान की कोई कीमत नहीं होती। आप कह रही हैं कि वो मेरे पति के सगे भाई नहीं हैं? सच कहा आपने, वो सगे नहीं हैं। लेकिन उन्होंने सगे रिश्तों से बढ़कर हमारे लिए जो किया है, वह शायद सगे भी कभी नहीं कर पाते।”

कमला जी ने मुँह बनाते हुए कहा, “अरे ऐसा भी क्या कर दिया! हर परिवार में लोग एक-दूसरे की थोड़ी-बहुत मदद करते ही हैं। इसका मतलब ये तो नहीं कि तुम अपना घर फूंक कर तमाशा देखो।”

मीरा की आँखों में अब एक दर्द भरी सख्ती आ गई थी। उसने कहा, “थोड़ी-बहुत मदद? माँ, आप शायद भूल गई हैं, लेकिन मैं नहीं भूली। आज से छह साल पहले जब अनूप का एक्सीडेंट हुआ था और उनकी रीढ़ की हड्डी में गंभीर चोट आई थी, तब डॉक्टरों ने कह दिया था कि वो शायद कभी चल नहीं पाएंगे। उस वक्त हमारे पास इलाज के लिए पैसे नहीं थे। क्या तब आप या मेरे सगे भाई आगे आए थे? आपने तो कह दिया था कि ‘हमारे पास इतनी बड़ी रकम कहाँ से आएगी, भगवान पर भरोसा रखो।’ उस भयानक वक्त में यही ‘दूर के’ जेठ-जेठानी, सुरेश भैया और कविता भाभी, हमारे लिए भगवान बनकर आए थे।”

मीरा बोलते-बोलते भावुक हो गई, उसकी आवाज़ कांपने लगी। “सुरेश भैया ने अपनी चलती हुई दुकान गिरवी रख दी थी अनूप के इलाज के लिए। कविता भाभी ने अपने हाथ के कंगन बेच दिए थे ताकि सिया की स्कूल की फीस भरी जा सके और हमारे घर का चूल्हा जल सके। पंद्रह दिनों तक कविता भाभी अस्पताल के ठंडे फर्श पर मेरे साथ सोई थीं। उन्होंने मुझे टूटने नहीं दिया। आज हम जिस मुकाम पर हैं, अनूप आज अपने पैरों पर खड़े होकर जो अपनी कंपनी चला रहे हैं, वो सिर्फ और सिर्फ सुरेश भैया और कविता भाभी की बदौलत है। आज जब उनके व्यापार में घाटा हुआ है और उनकी बेटी रिया की शादी सिर पर है, तो क्या मैं उन्हें पैसों के लिए परेशान होने दूँ? मेरा ये सोना और मेरी ये बचत उनकी उस कुर्बानी के आगे मिट्टी के बराबर है।”

कमला जी कुछ पल के लिए निशब्द रह गईं, लेकिन फिर अपने बचाव में बोलीं, “फिर भी बेटा, अपना भविष्य सुरक्षित रखना भी तो ज़रूरी है। कल को तुम्हें ज़रूरत पड़ी तो क्या गारंटी है कि वो फिर तुम्हारी मदद करेंगे?”

मीरा के होंठों पर एक फीकी और व्यंग्यात्मक मुस्कान तैर गई। “भविष्य की चिंता आपको सिर्फ आज क्यों हो रही है माँ? याद है पिछले साल जब मेरे सगे भाई, सुमित को अपना नया बिजनेस शुरू करने के लिए पैसों की सख्त ज़रूरत थी? तब मैंने अपनी पांच लाख की फिक्स डिपॉजिट बिना अनूप से पूछे सुमित को दे दी थी। तब तो आपने एक बार भी मुझे नहीं रोका। तब आपने यह नहीं कहा कि ‘मीरा, तेरी भी एक बेटी है, तुझे उसके हायर एजुकेशन के लिए पैसे चाहिए होंगे।’ तब आपने बड़ी खुशी से कहा था कि ‘बहन का फर्ज होता है अपने भाई के काम आना।’ तो आज क्या हुआ माँ? मेरा भाई सगा है तो उसके लिए लाखों रुपये दे देना मेरा फर्ज था, और अनूप के भाई ने हमारी जान बचाई, तो उनके लिए कुछ करना मेरी बेवकूफी कैसे हो गई? क्या आपके लिए दामाद के रिश्तेदार हमेशा ‘पराए’ ही रहेंगे?”

कमला जी के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था। उनकी दोहरी मानसिकता और स्वार्थ का आईना आज उनकी अपनी बेटी ने उनके सामने रख दिया था। उनका सिर शर्म से झुक गया।

मीरा ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा, “माँ, रिश्ते खून के हों या दिल के, वे तभी ज़िंदा रहते हैं जब उन्हें निस्वार्थ भाव से सींचा जाए। सुरेश भैया ने कभी यह नहीं सोचा था कि हम उन्हें वो पैसे लौटा पाएंगे या नहीं। उन्होंने बस अपना फर्ज निभाया था। आज मेरी बारी है। मैं अपनी बेटी सिया को यह नहीं सिखाना चाहती कि मुसीबत में काम आने वालों को जरूरत पड़ने पर पीठ दिखा दी जाए। मैं उसे यह सिखाना चाहती हूँ कि सच्ची दौलत बैंक में नहीं, बल्कि उन लोगों में होती है जो आपके बुरे वक्त में आपके साथ खड़े रहते हैं।”

कमला जी चुपचाप वहां से मुड़ीं और कमरे से बाहर चली गईं। उन्हें आज एक बहुत बड़ा सबक मिल गया था।

अगले दिन मीरा और अनूप सुरेश भैया के घर पहुंचे। मीरा ने रिया को पास बुलाया और वो पुश्तैनी हार उसके गले में पहना दिया। साथ ही, फिक्स डिपॉजिट के पैसों से रिया की शादी की सारी व्यवस्थाओं का खर्च अनूप ने अपने कंधों पर ले लिया। सुरेश भैया और कविता भाभी की आँखों में आंसू थे, लेकिन वे खुशी और संतोष के आंसू थे। उस दिन उस मंडप में कोई सगा या सौतेला नहीं था, वहां सिर्फ एक सच्चा परिवार था, जो प्यार और एक-दूसरे के प्रति समर्पण की डोर से बंधा हुआ था।

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क्या मीरा ने अपने जेठ की बेटी के लिए अपनी बचत और गहने देकर सही किया? क्या हमारे समाज में अक्सर ‘मायके’ और ‘ससुराल’ के रिश्तों को लेकर ऐसे ही दोहरे मापदंड अपनाए जाते हैं? अपने विचार कमेंट में साझा करें।

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लेखिका : प्रियंका नाथ

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