मेघवर्णी – रीमा महेन्द्र ठाकुर

कच्ची हांडी में रखी ताजी ताड़ी बरबस उस शहरी युवक को अपनी ओर खींच रही थी ।

पर उससे ज्यादा आकर्षण उसे मेघा का शरीर कर रहा .देवली फलिए की मेघा किसान झीतरा भीलाल की  की बेटी थी ।तंबई रंग के बीच बीच में आबनूसी रंग का भी हल्का दबाब .उसे मेघवर्णी बना रहा था !

उसक मन का भोलापन अल्हडपन उसके दबे रंग पर भारी पड़ रहा था।

झीतरा की ज़मीन जो की .उसे पीढ़ी दर पीढ़ी मिली थी उसकी वही जमांपूजी थी ।

पहाड़ी होने के बावजूद भी उसकी ज़मीन उपजाऊ थी ।उसके ज़मीन पर लगे कुछ पेड़ पर कुछ क़स्बे वालो की नजर थी!  .जिसे बेचने के लिए वो झीतरा पर दबाव बना रहे  थे।

दो बरस पहले उसकी दूसरी लुगाई से जन्मे बेटे ,जीवन ने पड़ोस के फलिए की लड़की को  भागा ले  गया था! .बहुत हो हल्ला हुआ.बात कुछ किलो चाँदी .और आटे शाटे पर तय हुई.।

इसी सबके चलते .झीतरा की माली हालत ख़राब हो गयी ।मेघा का रंग ज़रूर श्यामवर्णी था !पर सोलह बंसत पार करते ही उसके शरीर की कसावट .देखकर .आवारा से लेकर पूँजीपतियो की नज़र उसपर थी ।

कल जब कुछ लोगों ने झीतरा को कच्ची दारु पिला दी .तो उसने अधिक नशे में आकर मेघा का सौदा कर दिया .इसी बात से उसका बेटा जीवन .उससे हाथापाई कर बैठा .वजह थी शर्त के अनुसार .मेघा उसके साले के साथ ब्याही जाने वाली थी ।कनुडा के इतने ऐब थे की मेघा उसे पंसद न करती थी ।

पर सब उसकी समझ से बाहर था ।बस वो झीतरा को दुखी नहीं देख सकती थी .।उसे तालाश थी एक ऐसे युवक की जो उसे सभी मुसीबतों से निकाल सके ।

मेघा जब पानी का घड़ा सिर पर रख घर के भीतर आ रही थीं तो उसकी नज़र उस शहरी युवक पर पड़ी .जो उसकी ओर अपलक देख रहा था ।

वो समझ गयी की वो उसके शरीर पर नज़र टिकाए है .ऐसा उसके साथ पहली बार नहीं हुआ था ।उसने मन ही मन सोचा .ये युवक देखने में अच्छा पढ़ा लिखा है ।क्यू न  इससे सहायता.ली जाऐ,वैसे भी बापू ने सौदा कर ही दिया है!शरीर तो उस कनुडे के हाथ वैसे भी बर्बाद होगा ।

मेघा ने  बहुत सोचने के बाद आख़िर निर्णय ले लिया .रात के अँधेरे में वो .बाहर खाट पर सोये युवक की ओर बढ़ गयी ।वो जैसे ही खाट के समीप पहुँची ..

क कौन ?

मेघा ने महसूस किया शायद वो डर गया ।पर उसे यकीन था वो सोया नहीं होगा ।

मेघा —डरो मत मैं मेघा ।

युवक -कुछ काम था ?

वो युवक अस्वस्त होकर .थुक निगलते हुए बोला ।

मेघा ~मुझे पता है तुम सोये नहीं हो.कुछ काम की बात कर ले ।

इतना स्पष्ट पूछना .वो भी पिछड़े अंचल की लड़की.वो युवक कुछ डरा ।

युवक —कैसी बात .?

मेघा —मुझे पता है तुम इतनी दूर शहर से यहां इस तरह आकाश के नीचे मात्र सोने तो नहीं आये।

मेघा की बात सुनकर उस युवक के होश उड़ गये । ग्रामीण अंचल में पली बढ़ी .लड़की .ने उसकी चोरी पकड़ ली .सोचकर ही उस युवक की रंगत उड़ गयी ।

युवक —आप मुझसे चाहती क्या हैं ।

मेघा ~~आपका साथ “

युवक —मतलब 

युवक ने उस अंधकार मे .हैरानी से पूछा ।

मेघा —सौदा 

युवक —कैसा सौदा ?

मेघा —जो तुम चाहते हो मैं तुम्हें दूँगी .जो मैं चाहती हूँ तुम मुझे दोगे ।

मेघा की बात सुनकर पसीने छूट गए युवक के ।

युवक —इतना भरोसा कैसे?

मेघा -मजबूरी है दूसरा विकल्प नहीं है मेरे पास .।

युवक —ठीक है कोशिश करूँगा भरोसा न तोड़ूँ अब बताओ क्या मदद चाहिए ।

मेघा —मेरी ज़मीन .मेरे पेड़ सब दाँव पर लगे हैं.उस पर मेरे भाई की गलती की सजा मुझे मिल रही हैं ।कनुडा से मेरा रिश्ता तय है.वो बेवडा निकम्मा है.मै उसे पंसद नहीं करती ।

युवक —तो क्या तुम मुझे पंसद करती हो!

युवक की बात सुनकर मेघा कुछ न बोली!

युवक —हा या न ?

मेघा —न   पर तुम उस कनुडे से बेहतर हो .फिर भरोसे मंद भी।

युवक—तुम मुझसे विवाह करना चाहती हो?

मेघा —नहीं 

युवक —फिर 

चुप्पी “

युवक —कुछ तो बोलो !

मेघा —समाज वाले हम दोनों को मार देंगे!

युवक —ओह .ऐसा ..फिर मैं कैसे तुम्हारी मदद करूँ ।

मेघा —रुपये से 

युवक —वो सब तो ठीक है.पर कल तुम्हारे पति को पता चलेगा तो ?

मेघा -उसे खुद का नहीं पता तो .वो मेरे लिए क्या ही सोचेगा ।

मेघा की बात सुनकर.युवक अंदर तक हिल गया ॥

मेघा -अब मैं चलती हूँ दो पहर रात बीत जाने के बाद आऊँगी!

युवक —सुनो आने की अवश्यकता नहीं !

मेघा —सौदा ?

युवक —डील में कुछ बदलाव होगा ।

मेघा -मैं समझी नहीं,

युवक —अभी जाओ तुम्हें कोई देख न ले ।

मेघा —तुम आख़िरी उम्मीद हो””उसके बाद सब खत्म .मुहं अँधेरे भाग तो न जाओगे ।

युवक —जिस भरोसे पर आयी थी .उसका क्या हुआ.।अभी जाओ ।

मेघा —ठीक है .फिर मैं जाती हूँ ।

युवक—हम् 

युवक अँधेरे में आँखें गड़ाए उसे बिना पलक झपकाए जाते देखता रहा ।मेघा अंदर खाट पर औंधे मुँह पड़ी .आने वाले भविष्य के लिए चिंतित थी ।उस युवक के प्रति उसका विश्वास टूट गया था ।उसे पूरा भरोसा था की मुहं अँधेरे ही वो युवक चला जाएगा ।मेघा के जाते ही युवक की आँखों मे दृढ़ निश्चय साफ़ नज़र आ रहा था ।की वो अपने फ़ैसले पर अडिग रहेगा.वो कल ही शहर चला जाएगा ।

अगली सुबह जब मेघा उठी तो उसे उस युवक से कोई उम्मीद न थी .उसे यकीन था की वो युवक जा चुका है. रोज की तरह .उसने हाथ मुँह धोया.और पानी का ख़ाली घड़ा सिर पर रख कुऐ की ओर चल दी ।रात की बात सोचकर उसका मन विचलित था ।उसने अभी रस्सी कुएँ में डाली ही थी की उसे पीछे से सविता की आवाज़ आयी ।उसने पीछे मुड़कर देखा.गिरती पड़ती सविता उसी की ओर आ रही थीं!

सविता -मेघडी जल्दी तेरे घर जा .तेरे घर पर पूरा गाँव इकट्ठा है ।

मेघा —क्यों क्या हुआ.बापू ने फिर कुछ किया?

सविता—मुझे कुछ नहीं पता.भीड देखा तो मैं दौड़कर आयी .मेरी मान जल्दी चल ।

मेघा —पानी तो .

सविता—ये सब छोड़ बाद में ।

मेघा कुऐ पर ही मटकी छोड़कर सविता के साथ  घर की ओर दौड़ पड़ीं ।सविता ने सच कहा था .घर के बाहर काफ़ी भीड़ थी ।मेघा भीड़ को धकेलते हुए आगे बढ़ी .जहा उसका बापू झीतरा बैठा था ।एक नज़र उसने झीतरा पर डाली.तभी उसकी नज़र सामने उकड़ूँ बैठे युवक पर पड़ी .उसकी धड़कनें ठहर गयी ।

कहीं उसने रात वाली बात बापू से तो नहीं बता दी .डर से उसके चेहरे पर पसीने की बूंदे छलकने लगी!

अरे झीतरा तेरी बेटी आ गयी उसीसे पूछ ले .

बूचर काका के शब्द उसके कानों में गर्म सलाख़ की तरह जल रहे थे ।आख़िर बापू उससे क्या पूछने वाले हैं ।

इस काली पोरी में ऐसा क्या है.जो ये सेठ गंडा हो गया है ।

युवक—मैने अपनी बात रख दी है यदि मंजूर हो तो इस काग़ज़ पर अँगूठा लगाओ ।

छोरी तू अपनी मर्जी बता ।झीतरा मेघा की आँखों में झाँककर बोला।

कैसी मर्जी बापू?

सहमते हुऐ  मेघा बोली ।

ये सेठ तेरे सौदे के पचास लाख दे रहा है ।

झीतर मेघा की ओर गौर से देखते हुए बोला ।

मेघा – प प पचास लाख.

मेघा की ज़ुबान लड़खड़ाई .पर बापू..।

छोरी डर मत .जीवन को मना लूँगा.।

मेघा—कनुडा 

सुन छोरी वो सब मुझपर छोड़ दे ।तू अपनी मर्जी बता ।झीतरा .चापलूसी से बोला ।

मेघा -बापू अंदर चलकर बात करे ?

झीतरा —चल छोरी ..

झीतरा मेघा का हाथ थामे .झोपड़ी के भीतर चला गया ।

मेघा —बापू वो सेठ मेरे साथ बदसलूकी तो न करेगा ।

मेघा के मन में,  अब डर अपनी जगह बनाने लगा था ।

झीतरा-छोरी तू इतना क्यूँ सोच रही है.भैरू बाबा लाज रखेंगे बस हा कर दे ।छोरियाँ ही काम आवे माँ बाप के ।

मेघा —ठीक है बापू आपको जैसा ठीक लगे ।

झीतरा मेघा के साथ जब झोपड़ी से बाहर निकला .उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी ।

झीतरा—लाओ सेठ अँगूठा कहाँ लगाऊँ.

युवक—यहाँ 

काली बहुत क़िस्मत वाली है ।बाप भाई का घर भर गयी ।सब नसीब वाली बात है ।काकी भीड़ में धीमे शब्दों में बोली ॥

शाम होते होते .मेघा युवक की गाड़ी में बैठकर शहर के लिए रवाना हो चुकी थीं ।

मेघा के मन में बहुत से सवाल उमड रहे थे ।

मेघा—क्या मेरा सौदा करना जरूरी धा ।

युवक—जरूरी था तभी तो किया .अब तुम आज़ाद हो.मेरे साथ शहर चलोगी.या किसी संबंधी के यहाँ जाना चाहोगी!

मेघा —अब तो मैं आपका क़र्ज़ उतारना चाहूँगी!

युवक-पचास लाख छोटी रकम नहीं है.उतार पाओगी ?

मेघा —शायद नही ।

युवक —फिर सोच क्यूँ रही हो ।

युवक की बात सुनकर मेघा हैरान रह गयी।

युवक—रात में डील में यही बदलाव हुआ था अबसे तुम मेरे हिसाब से रहोगी।चिंता मत करो मैं तुम्हें टच भी न करूँगा ।

मेघा—मेरा तन काला है इसलिए.

युवक—नहीं तुम मन को छूने वाली मेघवर्णी हो .बहुत जल्दी तुम्हें सब समझ में आ जाएगा ॥

मेघा को फलिए से गये पाँच साल हो चुके थे ।लोग उसे भूलने लगे थे ।चुनाव नज़दीक था .कस्बे की नगरपालिका के सामने एक कार आकर रुकी.उसमे बैठी युवती ने गार्ड को अपने पास बुलाया.और उसके हाथ में एक काग़ज़ थमा दिया ।

दो दिन बाद .नगरपालिका अध्यक्ष पद के लिए दावेदार के रूप में एक साँवली युवती ने नाम दर्ज कराया.मेघा ..पूरे कस्बे में हलचल मच गयी .झीतरा की छोरी मेघा गाव वाले आश्चर्य  से एक दूसरे का मुहं ताकने लगे !चुनाव का रिजल्ट अच्छा था उसे नगरपालिक अध्यक्ष   का पदभार सौपा गया था!झीतरा और फलिए वाले खुशी मे मांदल पर पूरी रात नाचे थे!.देखते ही देखते बीस वर्ष बीत गये ।इन बीस वर्षो मे अजय की मेहनत मेघा की लगन ने उसे शीर्षपर पहुंचा दिया था! मेघा आज दिल्ली में मंत्री पद की शपथ ग्रहण करने वाली थी ।मेघा के लिए जयजयकार के नारे लग रहे थे.पर उस सबके बीच वो  शहरी  युवक  अजय   कहीं गुम हो गया था ।

सांसद भवन के गलियारे में निकलते हुए मेघा अचानक ठिठकी .उसकी नज़रें आसपास किसी को तालाश रही थीं.जिसने उसे फर्श से अर्श तक पहुंचाया.वो अब तक आया क्यूँ नहीं.आख़िर उसकी नज़रें दूर खड़े उस शख़्स पर ठहर गयी !.जिसने आज उसे अनदेखा कर दिया ।उसकी आँखों पर चढ़े चश्मे का नम्बर बढ़ गया था .मेघा हल्की मुस्कान के साथ उसकी ओर बढ़ गयी ।

अजय जी .

मेघा ने धीमी आवाज़ में पुकारा.।

अजय-अरे मेघा जी .नयी उपलब्धि के लिए शुभकामनाएँ 

हमेशा की तरह हल्की मुस्कान बिखेरते हुए बोले अजय जी ।

मेघा -ये सब आपका ही स्नेह है!

अजय —नहीं मेघा जी वो अतीत में किये गये सौदे का परिणाम हैं.और आपकी मेहनत का फल ।

मेघा —मैं आपके लिए कुछ करना चाहती हूँ ।

अजय -करो न किसने रोका है.।पर यदि करना ही चाहती हो तो मेरी तरह किसी से सौदा करना ताकि.सामने वाला .आदर्श बन जाए.क्या तुम कर पाओगी ।

प्रश्नभरी दृष्टि मेघा के अंतर में उतर गयी ।

क्या वो कर पाएगी शायद .मेघा मौन हो बस सोचती रही ।अबतक का शुरू से लेकर अबतक दृश्य उसके मानसपटल पर घूम गया !

अजय -क्या सोचने लगी .असंभव कुछ नहीं होता.अब मुझे मुक्त करो .सौदे से .और हा अभी  जीवन में बहुत कुछ करना है.बस एक बात याद रखना.संकल्प हो तो कुछ असंभव नहीं होता ।मैं अब चलता हूँ.परिवार की भी कुछ ज़िम्मेदारी है मेरी ..

मेघा —अजय जी ?

अजय ने सरसरी दृष्टि मेघा पर डाली .और बिना कुछ जबाब दिये .सांसद भवन से बाहर चले गये ।

मेघा भरी आँखों से उन्हें जाते देखती रही .उस देवता के लिए.वो कुछ न कर सकी .सौदा तो उसने किया था .तो जीत भी उसी की होगी ।

मेघा मन ही मन नये संकल्प को पूरा करने का प्रण कर चुकी थी .।

मैडम चले ..

पीऐ श्यामशरण की आवाज़ सुनकर मेघा चौंकी .।

मेघा -हम्

समाप्त 

रीमा महेन्द्र ठाकुर

विश्वास की डोर बहुत मज़बूत होती है (प्रतियोगिता)

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