बेटा – खुशी

निर्मला जी के दो बच्चे थे। धीरेन और दृष्टि।धीरेन बड़ा था जब वो दो साल का था तो पिता की नौकरी छूट जाने के कारण वो जमशेदपुर से दिल्ली आ गए।निर्मला का जमशेदपुर में भरा पूरा परिवार था। मां बाप ,बहने भाई पड़ोस में ही मां का पूरा परिवार रहता था।बचपन से निर्मला लाडो में पली थी खांसी रहती थी इसलिए ढंग से पढ़ी लिखी नहीं घर काम में भी फूहड़ इसलिए उसकी शादी विवेक से हुई जो सीधा साधा आदमी था घर परिवार में मां और दो बड़े भाई थे।पिताजी छोटी उम्र में गुजर जाने के कारण बड़े भाई प्रताप ने छोटी उम्र में घर की जिम्मेदारी उठा ली इसी लिए प्रताप इंग्लिश का टीचर लग गया गवर्नमेंट स्कूल में,उससे छोटा विनय जो कामचोर था आज पकड़ कल छोड़ उसने अपनी पसंद की लड़की सीमा से शादी कर ली।

उसे भी परेशान ही रखता पर सीमा का मायका समृद्ध था इसलिए वो पुणे चली गई ताकि उसके परिवार वाले उसके साथ रहे और गाहे बगाहे मदद भी मिल सके।विवेक एक टेक्सटाइल डिजाइनर था ।जमशेदपुर  में नौकरी छूटी तो उसने टेक्सटाइल मिल दिल्ली में ज्वाइन कर ली। इसलिए वो लोग दिल्ली चले आए। निर्मला को कुछ नहीं आता था इसलिए उसकी सास बीना भी उनके साथ दिल्ली आ गई।धीरे धीरे गाड़ी पटरी पर आने लगी थी दो साल बाद दृष्टि भी आ गई ।दृष्टि बचपन से ही मुंहफट और गुस्से की तेज थी। हर एक से लड़ती किसी को कुछ भी बोलती पर वो निर्मला की बड़ी लाडली थी ।निर्मला उसे कभी कुछ नहीं कहती ।

वो अपने ननिहाल भी जाती तो बाकी भाई बहनों के साथ नहीं खेलती थी।नानी या मां के पीछे ही रहती ।मौसिया मामी कहती कि आजा तेरे बाल बना दे पर वो इतनी जिद्दी थी कि किसी को अपने बालों को हाथ लगाने नहीं देती ।इसी लिए सब उसको डांटते तो निर्मला चीड़ जाती जबकि धीरेन सबका लाडला था इस बात पर भी निर्मला चीड़ जाती की सब धीरेन को प्यार करते हैं और दृष्टि को डांटते हैं।धीरेन पढ़ने में भी अच्छा था सब उसकी तारीफ करते इधर दृष्टि पढ़ने में भी कमज़ोर थी। अपने पिता जी से भी बूरी तरह बात करती क्योंकि वो उसे उसकी गलतियों के लिए गुस्सा करते।धीरेन का 12हो गया वो बैंगलोर में इंजीनियरिंग करने चला गया।

धीरेन पढ़ने में होशियार था इसलिए उसका स्कॉलर शिप में एडमिशस हो गया। धीरेन के जाने के बाद तो दृष्टि और आजाद हो गई उसका एक लड़के से चक्कर चल गया जो उसी की क्लास में पढ़ता था उसका नाम था शिबू पढ़ने में ऐसा ही था और देखने में भी वो घर में झूठ बोल कर बाहर जाती ।विवेक गुस्सा करते या मारते तो लड़ने लगती उन्हें उल्टा सीधा बोलती।पर निर्मला पुत्री मोह में इतनी अंधी थी कि उसे उसकी गलतियां दिखाई ही नहीं देती।दृष्टि दसवीं में फेल हो गई उसने पढ़ाई छोड़ दी।ntt कर ली वहां से भी उसे कोई सर्टिफिकेट नहीं मिला।

उधर धीरेन की प्लेसमेंट नोएडा हो गई और वो वापस आ गया।इधर बीमार होने के कारण विवेक की जॉब चली गई।पारकिंसन के कारण उसके हाथ पैर कांपते थे तो वो कुछ करने लायक नहीं बचा था। घर में ही रहते पूजा पाठ करते।समय बिताने के लिए शाखा ज्वाइन कर ली।lic भरना घर के छोटे मोटे काम कर देते थे।धीरेन पर सारे घर की जिम्मेदारी आ गई थी।इधर दृष्टि कुछ पढ़ती लिखती तो थी नहीं इसलिए उसने एक प्ले स्कूल ज्वाइन कर लिया।वहां से जो भी कम।ती खुद पर उड़ाती। इधर एक दो लोगों ने अच्छे रिश्ते बताए ।

मामा मामी ने भी कोशिश की कि उसे जमशेदपुर बुला ले कुछ पढ़ लिख लेगी।पर उसने साफ मना कर दिया।आखिर जिद में आकर दृष्टि ने शिबू से शादी की जिद पकड़ ली।निर्मला को छोड़ कोई भी इस शादी के समर्थन में नहीं था। विवेक ने तो उसकी पिटाई भी कर दी।पर कोई असर नहीं एक सादा समारोह में उसकी शादी हो गई।जो भी लड़के को देखता पूछता क्या देखा आपने ।बारात में शिबू की तरफ से लोग आए पीए हुए ।सब तरफ जग हंसाई हुई।मामा तो अपनी बेटी को शादी से लेकर आ गए।मामी तो आई ही नहीं।अड़ोसी पड़ोसी रिश्तेदारों में बहुत बातें बनी।धीरेन ने तो दृष्टि और शिबू से बात भी नहीं की।कुछ दिन तो दृष्टि अपने ससुराल में रही पर निर्मला के उकसाने और कान भरने से वो घर में झगड़ा कर अपने मायके के पास ही रहने आ गई।अब क्या वो सारा दिन अपने मायके में पड़ी रहती रात को सिर्फ सोने जाती ।

निर्मला घर से चीज़ें उठा कर दृष्टि को देती ।विवेक कहते भी कल को घर में बहु आनी है उसका पति खुद सामान लाए ना अपने घर में पर वो निर्मला ही क्या जिस पर जू रेंग जाए।समय बीता धीरेन के लिए लड़कियां देखी जाने लगी।उन्हीं लड़कियों में माया का रिश्ता आया ।धीरेन को माया पसंद आई और उनकी शादी हो गई।माया के आने से तो निर्मला को नौकरानी मिल गई वो कोई काम नहीं करती थी।सारा दिन घूमती ब्रह्मकुमारी आश्रम में बेटी के साथ लगी रहती और शाम होते ही दोनों घूमने निकल पड़ती।दृष्टि को दिन ठहर गए वो सारा दिन मायके ही रहती रात को भी नहीं जाती ।खाना नाश्ता सब शिबू का भी यही से जाता।वो भी जब तब पैसे मांग कर ले जाता ।

कभी बिजनेस के बहाने कभी किसी बहाने ।हद तो तब हो गई जब पूरी प्रेग्नेंसी और डिलीवरी में उसने एक पैसा खर्च नहीं किया और तो और निर्मला भी उसके सामने बार बार कहती डिलीवरी का खर्चा तो मायके वालों का होता है।उसने एक दो बार माया से फ्री होने की कोशिश की पर माया ने उसे घास नहीं डाली। डिलीवरी के 6 महीने तक दृष्टि वही रही ।सारा खर्चा धीरेन करता वो निर्मला को कहता मां मेरा भी परिवार बढ़ रहा है तुम बोलो दृष्टि को की अपने पति से कहे अपना खर्चा उठाए तो निर्मला कहती तेरी बीवी ने सिखाया होगा उसे तो मेरी बेटी चुभती है।

उससे बड़ी परेशानी है इसे समय बीता विवेक का देहांत हो गया।धीरेन की भी बेटी हो गई। माया स्कूल में अध्यापिका थी फिर ट्यूशन पढ़ाती।घर में सब सुख सुविधा आ गई पर निर्मला ने कभी बेटे बहु की तारीफ नहीं की हर समय बेटी बेटी करती ।फिर धीरेन की दूसरी बेटी हुई उस दिन तो घर में आतंक मचा दिया फिर बेटी पैदा कर दी।मेरे बेटे पर बोझ धीरेन बोला मां तुम क्या बात करती हो।दृष्टि की भी तो बेटी है आप उसे तो कुछ नहीं कहती।साल बीते धीरेन और माया ने बड़ा घर लिया सब सुख सुविधा थी।हर कोई कहता निर्मला तू अच्छा खा रही है पहन रही है तेरा बेटा बहु कितना ध्यान रखते है।रिश्तेदारी में भी जहां जाती अच्छा पहनती ओढ़ती ।सब कहते तू नसीबवाली है पर निर्मला का बेटी पुराण खत्म ना होता।उसके इस व्यवहार से माया तो उससे कम ही बात करती थी।हर समय कहती पुराना मोहल्ला सही था मेरी बेटी आ जाती थी अब तो उसका पैसा खर्च होता है।निर्मला का 75 वा जन्मदिन था ।

माया और धीरेन ने सरप्राइस पार्टी प्लान की थी ।धीरेन के फैमिली फ्रेंड के यहां निर्मला को छोड़ा था क्योंकि घर में रिश्तेदार आने वाले थे।नई साड़ी गहने सब माया ने अपनी सहेली को दिए क्योंकि वो उसे उनके जानकार के फंक्शन में जाना है ऐसा कह ले जाने वाले थे।इतना  बड़ा होटल बुक किया सारे अरेंजमेंट एक no थे हर कोई तारीफ कर रहा था।वहां पर जब निर्मला को लाया गया तो वो नाराज़ हो गई अपने सभी भाई बहनों को देख थोड़ा मुस्कुराई पर उसके मन में गुस्सा था वही उसका बोलना शुरू हो गया सबके समझाने पर वो चुप हुई वहां भी सभी जगह बेटी नाती और दामाद को ही आगे आगे रखती रही।घर आते ही निर्मला का चीखना शुरू हो गया।

कितने झूठे हो तुम लोग मेरे भाई बहन यहां आए हुए थे और मुझे दूसरे के यहां फेक दिया  इतना बुरा बुरा बोला माया के माता पिता को भी जलील किया ।माया  रोने लगी तब निर्मला की बहन मधु बोली दीदी आप कितनी नाशुक्री हो आपके बेटे बहु ने आपके लिए इतना कुछ किया और तुम उनका सबके सामने अपमान कर रही हो ।बेटा बहु ही काम आते है और कोई नहीं। धीरेन बोला मौसी ये कुछ नया नहीं है। बचपन से ही मां का व्यवहार आपने देखा है ये मेरी किसी खुशी में खुश नहीं होती मेरे जीवन में कुछ अच्छा होता है ये दृष्टि से कंपेरिजन करना शुरू कर देती है।मेरा परिवार है मैं उसकी जिम्मेदारी उठाऊंगा या सारी जिंदगी मैं दृष्टि के घर संसार को देखूंगा।

माया इतनी मेहनत करती है मेरा घर मेरे बच्चे संभालती है तो उसके साथ यह अन्याय क्यों ।क्यों मां आपकी एक ही बेटी है तो आप उसी के साथ रहे आज तो आपने सारी सीमाएं लांघ दी आपके लिए प्लान किया आपने भरे लोगों में हमारी इज्जत दो कोड़ी की कर दी।मां आपने अच्छा नहीं किया अब इतना सब होने के बाद आप हम से कोई उम्मीद मत रखियेगा।धीरेन वहां से चला गया।माधुरी बोली हर रिश्ते की अपनी मर्यादा और सीमा होती हैं ।इतना तुम दृष्टि दृष्टि करती हो।दामाद  करती हो रेवा के लिए तुम्हारा दिल धड़कता है।पर धीरेन ,माया  अरु और आरुषि के लिए तो ऐसा  नहीं होता।पूरे रिश्तेदारी पड़ोसी तुम्हारे मिलने वालों में जो तुम्हारा सम्मान है वो बेटे बहु की वजह से जाओ चार दिन इनसे अलग रहो पता चलेगा आज सब मिल रहा है इसलिए तुम्हे कीमत नहीं है।

जिसके पास जो होता हैं वो उसकी कदर नहीं करता।दीदी आज तुमने बहुत गलत किया सबके सामने अपने बच्चों का अपमान किया।सब चले गए घर में एक शांति छा गई कोई भी अब निर्मला से बात नहीं करता था।माया ने तो सारे तोहफे पैसे सब निर्मला को सौंप दिया था क्योंकि इतना कुछ करने के बाद भी उसे शर्म नहीं थी।मेहमान जाने के बाद घर समेटते और नौकरी  संभालते हुए उनलोगो ने गिफ्ट्स अनपेक नहीं किया था। माया उस दिन स्कूल से जल्दी आ गई तो निर्मला फोन पर लगी हुई थी मुझे अभी तक कोई गिफ्ट नहीं दिया ।

पैसे भी खुद के पास रख लिए।माया ने तभी वो पूरा सूटकेस उसे थमा दिया बोली मम्मी जी आप कभी नहीं सुधर सकती। अरु को बंगलौर में एडमिशन मिल गया तो माया भी उसके साथ गई ।धीरेन का ऑफ़िस वही था तो वो भी कुछ दिन वही चला गया।निर्मला दृष्टि को फोन करती वो बिजी होने की बात करती अपने घर भी नहीं बुलाती।अब निर्मला को अकेला पन सताता पर वो कुछ कह नहीं पाती।ये सब उसने खुद ही चुना था अपने बच्चों का तिरस्कार किया जिस बेटी के लिए बेटे बहु का अपमान किया वो पूछती भी नहीं है। सच है जो करोगे वही भरोगे।

स्वरचित कहानी 

आपकी सखी 

खुशी

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