पिछले छह महीने से लगातार बीमार रहने की वजह से,मां बहुत कमजोर हो गई थी।पिछले बत्तीस सालों से साथ में रह रही थी निशा।मां का जीवन के प्रति मोह छूट रहा था धीरे-धीरे।अपने जीते जी पति, इकलौते बेटे और दामाद को खोया था उन्होंने।अब उनकी बड़ी बेटी , जो दो साल पहले विधवा हुई थी ,
काफी समय से फोन पर बात नहीं कर रही थी।निशा से दबी आवाज में शिकायत कर चुकी थीं वे”देखो ना बहू, सरिता(बड़ी बेटी) ने कब से बात नहीं की मुझसे।सप्ताह में दो दिन जरूर बात करती थी, अब तो फोन ही नहीं करती।तुमसे बात हुई क्या अभी उसकी?”
निशा ने मजबूरी में एक बड़ा रहस्य उजागर किया”मां,उसकी तबीयत ठीक नहीं।अचानक प्रैशर बढ़ गया था,गिर गई थी। हॉस्पिटल में भर्ती थी एक महीने।अभी घर पर ही ट्रीटमेंट चल रहा है।फिजियो होता है उसका रोज।बात करने से मना किया है डॉक्टर ने ज्यादा।इसलिए नहीं कर पाती बात।तुम परेशान मत हो।जल्दी ही ठीक होकर तुमसे बात करेगी।”
उनके चेहरे पर नाराजगी और दुख साफ दिख रहा था।शिकायत करते हुए कहने लगीं”अरे,मुझे गीता(छोटी बेटी)ने भी नहीं बताया।तुम भी अब बता रही हो।मुझसे क्यों छिपाते हो तुम लोग?
डरते हो क्या?कि मैं सहन नहीं कर सकती? अरे मेरी इतनी अच्छी किस्मत कहां कि भगवान मुझे बुला ले।जिन्हें नहीं जाना था वो चले गए, और मैं बूढ़ी रह गई।सरिता की खोज खबर लेते रहना तुम।”
एक दुखियारी मां की तकलीफ़ चेहरे में झलक रही थी।बेटी के पास जाना भी उनके लिए संभव नहीं था।पिछले महीने ही गीता की बेटी की शादी में भी नहीं जा सकीं।
बड़ा शौक था नवासी की शादी देखने का,पर शरीर जवाब देने लगा था,तो उनका जाना असंभव हो गया।निशा अकेली ही गई थी।बेटा भी घर पर दादी के साथ रुका था।
धीरे-धीरे उनकी खुराक कम होने लगी।अखबार खंगालने वाली,अब बेमन से ही खास खबरें पढ़तीं थीं।हर हफ्ते डॉक्टर के पास ले जाता था बेटा उन्हें।उसके लिए दादी ज़िंदगी की सबसे बड़ी प्राथमिकता थी।पोते के साथ ज्यादा बात भी नहीं करतीं थीं अब वो।
रोज रात को बार-बार उठकर निशा और बेटा चैक करते कि वो सो रहीं हैं या नहीं।प्रैशर ,शुगर नियमित रूप से चैक करने लगा था बेटा।
कभी-कभी दुखी होकर पूछता”दादी ठीक तो हो जाएंगी ना मां?” निशा उसे ढांढ़स बंधाते हुए कहती”कैसे ठीक नहीं होगी?ठीक होना पड़ेगा।मुझे छोड़कर सब चले गए,उन्हें नहीं जाने दूंगी।” मां की तबीयत का प्रत्यक्ष प्रभाव निशा के व्यवहार पर पड़ता था।वो ठीक रहतीं तो निशा में ऊर्जा का संचार करती रहतीं ,यदि वो बीमार तो निशा भी मानो बीमार ही हो जाती।
पुणे में रह रही बेटी से बात करते समय भी दादी की सेहत की चिंता जताती रहती निशा।
पिछले सप्ताह वीडियो कॉल पर बात करती हुई बेटी ने दादी से बात करवाने को कहा,तो निशा ने फोन मां कीओर घुमाया।बेटी ने डांटते हुए कहा “दीदू, तुम कब ठीक होगी? मेरी शादी की कोई चिंता नहीं है तुम्हारी बहू को।तुमने कैसे सही समय पर अपने बच्चों की शादी कर दी।अब अपनी बहू को देखो।लगता नहीं
कि कोई प्रयास भी करती होगी।ऐसे कैसे चलेगा।तुम भी शादी की चर्चा नहीं चालोगी, तो बस हो गई मेरी शादी।पापा होते तो, ऐसा होने देते क्या? जल्दी ठीक हो जाओ तुम।मैं आऊंगी जब, तुम पहले की तरह ही दिखनी चाहिए मुझे।”
मां से फोन लेकर थोड़ी देर बेटी से बतिया कर फोन रख कर जैसे ही जाने को मुड़ी,तभी रात नौ बजे मां ने अपना चश्मा और पंचांग देने के लिए कहा।निशा ने खीझते हुए कहा”मां, अभी रात हो गई है।अपनी दवाई खाओ, और सो जाओ।बहुत सारी दवाईयां हैं।पानी ज्यादा पीना।कल सुबह पंचांग पंचांग देखना।”
वो शांति से सो गईं।अगली सुबह निशा को अचरज में डालते हुए आंगन से अखबार लेकर आ रहीं थीं वो।सात बजे से उठकर अपनी खाली पेट की दवा खा चुकी थीं वे।दूध पीकर अखबार पढ़ने में पहले की तरह काफी दिनों बाद व्यस्त दिखीं वो।इंसुलिन ख़ुद ही फ्रिज से निकाला भी और लगा भी लिया। डाइनिंग टेबल पर तैयार बैठी मिलीं वो,ठीक साढ़े आठ बजे।मूंग का चीला प्लेट में डालते ही आदत अनुसार बोलीं वो” तुम भी ले लो।खा लो अभी, तैयार बाद में होना।सुनो ना बहू, आज के अखबार में दो ब्राह्मण लड़कों की जानकारी देखकर पेंसिल से दाग लगा कर रखी हूं।तुम स्कूल से आकर फोन करना।नंबर दिया हुआ है।” निशा ने खाते हुए कहा”उफ्फ, तुम्हारा शुरू हो गया सुबह-सुबह।ये अखबार देखना, लड़कों के घर में फोन लगाना आजकल के बच्चों को पसंद नहीं आते मां।बेकार में कहीं बात करो, और ये बच्चे बाद में घुमा-फिरा कर मना कर देतें हैं।तुम्हारे पोता-पोती समझदार हैं।अपनी पसंद के हिसाब से ढूंढ़े अपने पार्टनर।जब मुझसे कहेंगे, मैं उनके परिवार वालों से बात कर लूंगीं।ये जबरदस्ती लोगों से बात करो सौ -सौ तरीके की, फिर उनकी बातों का जवाब दो।मुझ अकेली से नहीं होता।उन्हें देखने दो अपनी पसंद का।”
निशा की बात खत्म भी नहीं हो पाई थी कि,उनकी नकारात्मक प्रतिक्रिया सामने आई” वाह,बहू वाह।ऐसे ही सभी मांएं सोचने लगें ,तो हो चुकी बच्चों की शादियां।अरे अभी अगर मेरा बेटा जिंदा होता ना, धूमधाम से बेटी का ब्याह कर चुका होता,और शायद बहू भी ले आया होता।तुम कब तक बचोगी अपनी जिम्मेदारी से।”
निशा को अब गुस्सा आने लगा था।कांपते हुए बोली” अगर इतनी ही चिंता थी अपने बच्चों की शादी की,तो क्यों चले गए तुम्हारे बेटे।मैं क्या अकेली ही सब जिम्मेदारी निभाएं?अपने हिस्से की भी और पापा के हिस्से की भी।मैं नहीं थकती क्या?मेरी भी तो उम्र हो रही है।बीमारियां बढ़ रहीं हैं।तुम्हें लगता है,मैं बचना चाहती हूं शादी से।वाह मां,क्या खूब पहचाना है तुमने मुझे इतने सालों में।”
निशा सच में रोने लगी थी।मां तब पास आकर सिर पर हांथ फेरकर बोलीं”किसने कहा तुम अकेली हो?अरे मैं नहीं हूं क्या तुम्हारे साथ?अपने बच्चों की शादी मैं अपने जीते-जी जरूर देखकर जाऊंगी। हां-हां,मैं जल्दी ठीक हो जाएंगी देखना।मेरी पोती ने कितनी उम्मीद लगाकर मुझसे कहा है रिश्ता देखने की बात।अब तो मैं यह जिम्मेदारी निभाने के लिए ठीक भी होऊंगीं,और जिंदा भी रहूंगीं।मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूं।अरे तुम्हारी इतनी जान-पहचान है,क्या एक लड़का नहीं मिलेगा अपनी बेटी के लिए?वो दूर दूसरे शहर में अकेली रहकर नौकरी करेगी कि लड़का ढूंढ़ेगी? तुम्हें बस फोन करना होगा।मैं गोत्र, गण, राशि सब मिलान करके ही पेंसिल से मार्क करूंगी।मेरा बेटा भी तो ऊपर से देखकर दुखी होता होगा।उसी की उम्र की पाखी(गीता की बेटी)की शादी हो गई, जिसे घर का कोई काम नहीं आता।खाना नहीं बनाया उसने कभी।और मेरी पोती जो हर काम में निपुण हैं, उसे लड़का नहीं मिलेगा? ऐसा हो ही नहीं सकता।”
निशा की आंखों से वाकई जमा रखें सारे दुख पिघलने लगे थे।बड़ा चाव था पति को बच्चों की शादी का।एक सुंदर बहू और राजकुमार दामाद चाहिए था उन्हें।हमेशा चिढ़ाकर बोलते ” मेरी बेटी लाखों में एक है।रानी की तरह शादी करूंगा।एक बड़ी सी कार दूंगा उसे,जिसमें बैठकर ही वो ससुराल जाएगी।”निशा चिढ़कर कहती” क्यों देंगे हम कार?क्या दामाद इतना निकम्मा होगा कि एक कार खरीद ना सके।”हर बार यह बहस बिना किसी परिणाम के खत्म होती थी।आज बहुत याद आने लगी उनकी।
पता ही नहीं चला कि कब मां ने अपने सीने में निशा का सर छिपा कर पीठ सहलाने लगी।ढांढ़स बंधाते हुए बोलीं” बिल्कुल चिंता मत कर।मेरी लाडो के पापा और दादा जी उसके लिए एक अच्छा लड़का ढूंढ़ने में हमारी मदद करेंगें।तू खुद इतनी अच्छी बहू है,तुझे तो अच्छा दामाद मिलना ही है।”
पोती के द्वारा दी गई उलाहना ना जाने कब फिर से उनके जीने की उम्मीद बढ़ा गई।अब मां दो रोटी खा रही है।बगीचे में जाकर हवा से झुक गईं फूलों की डालियां बांध रहीं हैं।शाम को निशा की अनुपस्थिति में पूजा घर में दीया भी जला रहीं हैं।
पोती की शादी की उम्मीदों ने उनके जीवन के सांझ को एक नया सवेरा दे दिया है।बस इसी उम्मीद से कि पोती की शादी पूरे रीति-रिवाज से हो, उनमें अब जिंदा रहने की ललक बढ़ी है।
अब वो मरने की बात नहीं करतीं,उल्टा कहती हैं”मुझे अभी और जीना है।बिना बाप की बेटी और बेटे की शादी मेरी जिम्मेदारी है।उसे पूरा किए बिना मैं नहीं जाने वाली कहीं।
शुभ्रा बैनर्जी
मुहावरा आधारित कहानी -उम्मीदों का नया सवेरा