स्वाभिमान – खुशी

राम कुमार एक दुकान पर मुनीम की नौकरी करते थे। उनका हिसाब इतना अचूक होता था कि सेठ कैलाश चंद्र कहते कि राम तेरे जैसा हिसाब जमाने वाला कोई नहीं कभी एक पैसे का भी हेर फेर नहीं।राम कुमार की इस ईमानदारी के कारण कैलाश चंद्र तो उन्हें बहुत मानते थे और राम कुमार के परिवार में तीन बच्चे बेटा संजय , राहुल और बेटी प्रीति थी।पत्नी रमा और मां कोशल्या।राम कुमार अपनी मां को बहुत मानते थे।बच्चे स्कूल में पढ़ रहे थे घर में रमा और सास कौशल्या होते थे। रमा भी खाली समय में करोशिए और सिलाई का काम करती थी।

एक दिन दुकान पर कैलाश चंद्र का दोस्त मोहन आया जो बड़ा व्यापारी था उसने कैलाश चंद्र को बताया पता नहीं कैसे मुझे हिसाब नहीं मिल पा रहा है और यदि ऐसा रहा तो इनकम टैक्स का नोटिस आ जाएगा ।मेरा CA तो देख चुका है तू बता ।कैलाश चंद्र बोले अरे मेरे यहां तो जो मुनीम है राम कुमार वही सब देखता है इतना बड़ा व्यापार उसी ने संभाल रखा हैं तू उसे दिखा ले।क्या यार बड़े बड़े CA नहीं पकड़ पा रहे तो मुनीम क्या कर लेगा फिर भी मेरे कहने पर तू दिखा तो दे।राम कुमार ने पूरा हिसाब किताब देखा पिछले साल के रिकॉर्ड में गड़बड़ होने के कारण ये।

नोटिस आया था रामकुमार ने वो मोहन को बता दिया और ठीक कैसे होगा ये भी।मोहन ने डॉक्यूमेंट दे दिए और पेनल्टी हटवा ली वो राम कुमार को धन्यवाद करता रहा और उसने भी अपने बहीखातो का हिसाब रामकुमार को दे दिया। दोनो जगह से अच्छी आय होने लगी।बच्चे अच्छे स्कूल में पढ़ने लगे।घर भी अपना तिमंजिला हो गया घर में सब सुख सुविधा आ गई।हर तरफ आनंद था ।राम कुमार  ने मेहनत से मां और पत्नी को हर सुख सुविधा दी। रमा बहुत बचत कर कर चलती थी ताकि कभी कोई परेशानी ना हो।समय बीता मां स्वर्ग सिधार गई बच्चे बड़े हो गए बड़ा बेटा  संजय बैंक में था ।छोटा बेटा राहुल  mnc मे था और प्रीति भी बड़ी कंपनी में नौकरी करती थी।प्रीति के फर्ज से रामकुमार और रमा फारिग होना चाहते थे इसलिए उन्होंने पहले प्रीति के रिश्ते की बात चलाई ।

प्रीति के लिए आदर्श का रिश्ता आया वो भी बैंक में काम करता था।उसके घर में उसके माता पिता और दादा जी थे।प्रीति की शादी तय कर वो संजय के लिए भी लड़की देखने लगे।संजय को आदर्श के चाचा की लड़की सीमा पसंद आई थी तो उसने अपनी मां से कहा आप बात चलाए।बेटे की पसंद रमा ने राम को बताई और आदर्श के पिताजी से रिश्ते की बात की सीमा फैशन डिजाइनर थी और अपना खुद का बुटीक चलाती थी।सभी को रिश्ता पसंद आया और एक ही मंडप में संजय और प्रीति की शादी हो गई।सीमा एक लालची किस्म की लड़की थी।

इतना बड़ा घर और सब देख उसकी आँखें फटी की फटी रह गई।इसी बीच राम कुमार की तबीयत खराब होने की वजह से वो काम पर नहीं जाते थे।ये बात जब उन्होंने कैलाश चंद्र को बताई तो उन्होंने यही कहा तुम्हारे जैसा ईमानदार आदमी मुझे नहीं मिलेगा पर तुम्हारे लिए यहां के दरवाजे सदा खुले हैं तुम जब चाहो आ सकते हो।उधर राहुल ने भी अपने ऑफिस में शिक्षा को पसंद कर रखा था।जो अपने मां बाप की इकलौती और घमंडी लड़की थी उसे जो चीज पसंद आ जाए वो उसे हासिल कर कर ही रहती थी। राहुल भी उसकी जिद।ही था जो खुद अब उसके प्यार में पागल हो चुका था।

बेटे की पसंद जान उसकी शादी भी कर दी।राम कुमार सारी जिम्मेदारी से मुक्त हो अब अपना समय रमा के।साथ बिताना चाहते थे।पर कहते है ना कि हम सोचते क्या है होता क्या है? रमा को ब्रेस्ट कैंसर हो गया उसके ट्रीटमेंट में पैसा लग रहा था जब तक राम कुमार के पास पैसे थे उन्होंने बेटों की मदद नहीं ली पर अब सर्जरी के लिए ज्यादा पैसा लगना था तो संजय और राहुल से उन्होंने बात की दोनो ने अपने खर्च गिनवा दिए कोई नहीं मै ये घर बेच देता हूं हम किराए पर रह लेंगे तेरी मां तो बच जाएगी पापा आप घर बेचेंगे तो हम कहा रहेंगे ।

मां की तो अब उमर हो गई है इतना पैसा उन पर लगाना ठीक नहीं आप छोड़ दो । ये सीमा थी ।आज राम कुमार पहली बार चिल्लाए वो मां हे तुम्हारी सड़क पड़ी औरत नहीं घर मेरा है मै जो चाहे वो करूं।राहुल और संजय ने आपस में बात की और कहा पापा का तो दिमाग खराब हो गया है। शिक्षा और सीमा ने भी कहा क्या बुढ़ापे में आशिकी सूझ रही है ऐसा करते हैं ये घर बेच देते है।तुम लोग कुछ पैसा हॉस्पिटल में जमा करवा दो और पापा से प्रॉपर्टी अपने नाम जिससे क्या होगा हम बेच देंगे।दोनो ने जा राम कुमार से माफी मांगी और कहा पापा हम सुबह पैसे जमा कर देंगे।पर वो मौका ही नहीं आया रात में ही रमा ने प्राण छोड़ दिए।

दिन वार पूरे हुए बिना रमा के राम कुमार अपने जीवन की कल्पना नहीं कर पा रहे थे।मां का 13 वा था सबके जाने के बाद रामकुमार आराम कर रहे थे।तभी जोर जोर से चिल्लाने की आवाजें आ रही थी आप लोगों ने घर बेच दिया और मुझे मेरा हिस्सा नहीं दिया मेरा भी हिस्सा है।हा हा दे देंगे शोर कम मचा ये बताओ पापा का क्या करना है।देखो मेरा फ्लैट तो पोश एरिया में है और हम दोनों वर्किंग तो पापा हमारे साथ तो नहीं रह सकते।हमारे घर में 3 कमरे हमारे और बच्चों के है पापा वहां भी नहीं रह पाएंगे तो उन्हें वृद्धआश्रम छोड़ सकते है 

हा वहां उन्हें कंपनी भी मिल जाएगी और वो लोग उनका ध्यान भी रख लेंगे।नहीं तो प्रीति तू अपना हिस्सा ले रही है बड़ा पापा पापा करती थी तू रख ले।भैया मै कैसे मेरे सर पर खुद हो दो बुड्ढे है पर कमाऊ पार्टी है पापा भी कुछ कर रहे होते तो सोचती अब बोझ कौन रखेगा।रामकुमार गिरते गिरते बचे अपने कमरे में आए और बोले आज मै बोझ हो गया दूसरे का मोहताज हो गया। रमा तुम किसके सहारे मुझे छोड़ गई। रामकुमार ने एक चिट्ठी उन के नाम लिखी मैने पूरा जीवन स्वाभिमान से जिया किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया ।

तुम्हारा पिता हूँ तुम्हे भी स्वाभिमान से जीना सिखाया पर तुम ये भूल गए कि इस उमर में तुम्हारा बाप अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं।करेगा।चिंता मत करो तुम पर बोझ नहीं बनूंगा। रमा की तस्वीर और अपने कुछ कपड़े ले कर रामकुमार घर से निकल पड़े। रमा की अलमारी से एक लिफाफा गिरा उसमें बहुत सारे पैसे थे।ये वही पैसे थे जो रमा जोड़ती थी।रामकुमार ने वो रात एक लॉज में गुजारी अगली सुबह वो कैलाश चंद्र के यहां पहुंचे और सारा किस्सा सुनाया ।कैलाश बोले आजा मेरे दोस्त जो तुझमें हुनर है वो किसी मै नहीं संभाल अपनी गद्दी ।

कैलाश चंद्र ने रामकुमार के रहने का भी इंतजाम कर दिया।कुछ महीनों के बाद रामकुमार ने फिर अपना घर खरीद लिया जो उन्होंने और रमा ने बड़े प्यार से बनाया था।ऊपर की दो मंज़िल उन्होंने वृद्धा आश्रम वालो को  दे दी ।लिफ्ट लगवा दी ताकि किसी को कोई परेशानी ना हो।जो कमाते उसका एक हिस्सा उसी आश्रम को चलाने में देते।जब उनके।बच्चों को पता चला कि पापा के पास पैसा आ गया है उन्होंने फिर घर खरीद लिया है तो वो रामकुमार से मिलने आए।रामकुमार बोले ये मेरी रमा का आशियाना था।जिसे तुमने बेच दिया धोखे से और अब मेरा घर ही आश्रम है जहां तुम मुझे भेजना चाहते थे।

चले जाओ यहां से तुम्हारे पिता का स्वाभिमान अभी जिंदा है और जब तक मै जिंदा हूं मेरी रमा भी स्वाभिमान में ही रहेगी।उसे गर्व होगा मुझ पर की मैने उसका आशियाना बचा लिया निकलो यहां से  रामकुमार ने कहा और गार्ड से कह उन्हें बाहर निकाल दिया।रामकुमार शाम को कमरे में रमा की तस्वीर के सामने बैठे हुए थे और सोच रहे थे कि क्या माता पिता से ऊपर धन दौलत है माता पिता का सम्मान उनके प्रेम की कोई कीमत नहीं।बच्चे इतने स्वार्थी कैसे हो जाते है। हे ईश्वर तेरा धन्यवाद तूने मुझे स्वाभिमान से जीने।का मौका दिया।

स्वरचित कहानी 

आपकी सखी 

खुशी

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