खोया हुआ सम्मान – गरिमा चौधरी

“अम्मा, क्या बात है? आज फिर आप यहाँ सीढ़ियों पर बैठी हैं? धूप कितनी तेज़ है, अंदर क्यों नहीं जातीं?” मैंने अपने घर का दरवाज़ा खोलते हुए सामने वाली सीढ़ियों पर बैठी शांति अम्मा से पूछा।

शांति अम्मा ने अपने मैले हो चुके पल्लू से अपनी डबडबाई आँखें पोंछीं और एक सूखी, बेजान सी मुस्कान के साथ बोलीं, “कुछ नहीं बिटिया, बस अपने करमों का फल भोग रही हूँ। अंदर दम घुटता है, इसलिए बाहर खुली हवा में बैठ गई।”

उनका यह जवाब सुनकर मेरा दिल कचोट सा गया। मैं जानती थी कि यह ‘खुली हवा’ का बहाना सिर्फ अपने बेटे की इज़्ज़त और बहू के अत्याचारों पर पर्दा डालने के लिए था। शांति अम्मा मेरे पड़ोस में रहती थीं। यह दो मंज़िला मकान कभी उनके स्वर्गीय पति ने बनवाया था, जिसे पूरा करने के लिए शांति अम्मा ने अपने गहने तक बेच दिए थे।

आज उसी घर में उनका इकलौता बेटा सुमित और बहू रितु रहते थे। सुमित एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करता था। सुबह नौ बजे घर से निकलता और रात को आठ बजे से पहले कभी वापस नहीं आता। सुमित अपनी माँ से बहुत प्यार करता था, लेकिन वह इस बात से बिल्कुल अनजान था कि उसके पीठ पीछे इस घर की चारदीवारी के भीतर क्या होता है।

जैसे ही सुमित की गाड़ी मोहल्ले से बाहर निकलती, रितु का असली रूप सामने आ जाता। वह शांति अम्मा को ताने मारना शुरू कर देती। कभी उनके खांसने से उसे चिढ़ होती, तो कभी उनके धीरे-धीरे चलने से। बात-बात पर वह अम्मा को घर के बाहर वाले बरामदे या सीढ़ियों पर निकाल देती थी।

“सारा दिन घर में बैठकर गंदगी फैलाती हैं, जाकर बाहर बैठिए, मुझे सफाई करनी है,” रितु के ये कड़वे शब्द कई बार मेरी खिड़की तक पहुँच जाते थे। शांति अम्मा चुपचाप अपना एक छोटा सा झोला, जिसमें उनकी दवाइयां और पानी की बोतल होती, लेकर बाहर सीढ़ियों पर आ जातीं।

गर्मी हो, सर्दी हो या बरसात, सुमित के लौटने तक शांति अम्मा का अधिकांश समय उसी चौखट पर कटता था। उनका अपना घर उनके लिए एक जेल बन चुका था, जहाँ से उन्हें हर दिन बेदखल कर दिया जाता था। मुझे यह सब देखकर बहुत तकलीफ होती थी।

कई बार मैंने सोचा कि सुमित भैया को सब कुछ सच-सच बता दूँ। लेकिन बिना किसी सबूत के सुमित भैया अपनी पत्नी के खिलाफ मेरी बात पर यकीन क्यों करते? उल्टे, हो सकता था कि रितु इसका सारा गुस्सा शांति अम्मा पर ही उतारती और उनकी ज़िंदगी और भी नर्क बन जाती।

शांति अम्मा की वह लाचार सूरत और ‘करमों का फल’ वाली बात मुझे रात भर सोने नहीं दे रही थी। मैंने तय कर लिया कि मैं इस अन्याय को यूं ही मूकदर्शक बनकर नहीं देख सकती।

मुझे कुछ ऐसा करना था जिससे सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे। अगले दिन मैंने बाज़ार से एक छोटा सा वाई-फाई वाला हिडन कैमरा खरीदा। यह कैमरा बिल्कुल एक छोटे से चार्जर प्लग जैसा दिखता था।

दोपहर के समय जब रितु अपनी सहेलियों के साथ फोन पर बात करने में व्यस्त थी, मैं बहाने से शांति अम्मा को पानी देने उनके बरामदे में गई। बरामदे के कोने में एक प्लग पॉइंट था जो सीधे घर के मुख्य दरवाज़े और हॉल के एक हिस्से को कवर करता था। मैंने बहुत ही सफाई से उस हिडन कैमरे को वहाँ लगा दिया और उसे अपने फोन से कनेक्ट कर लिया।

अगले तीन दिनों तक मैंने जो कुछ अपने फोन की स्क्रीन पर देखा, उसने मेरे रोंगटे खड़े कर दिए। वीडियो में साफ दिख रहा था कि कैसे सुमित के जाते ही रितु शांति अम्मा के हाथ से नाश्ते की प्लेट लगभग छीन लेती है। कैसे वह उन्हें धक्का देकर बाहर बरामदे में निकालती है और अंदर से जाली वाला दरवाज़ा लॉक कर देती है।

एक दिन तो शांति अम्मा ने पानी मांगा, तो रितु ने चिल्लाते हुए कहा, “मेरे पास फुरसत नहीं है आपकी सेवा करने की, वहीं बाहर रखे मटके से पी लीजिए।

” शांति अम्मा दिन भर उस चिलचिलाती गर्मी में एक पुरानी कुर्सी पर सिकुड़ी बैठी रहतीं और जैसे ही शाम को सुमित के आने का समय होता, रितु दरवाज़ा खोलकर उन्हें अंदर बुला लेती और एक आदर्श बहू होने का नाटक करने लगती।

मेरे पास अब पर्याप्त सबूत था। रविवार की शाम को जब सुमित भैया अपनी बालकनी में अकेले खड़े थे, मैं उनके पास गई। मैंने बिना कोई भूमिका बांधे अपना फोन उनके हाथ में थमा दिया और वो वीडियो प्ले कर दिया।

“सुमित भैया, मुझे माफ कीजिएगा कि मैंने आपके घर के मामलों में दखल दिया। लेकिन एक पड़ोसन और एक इंसान होने के नाते मुझसे एक माँ की यह दुर्दशा और नहीं देखी गई,” मैंने गंभीर स्वर में कहा।

सुमित भैया की नज़रें फोन की स्क्रीन पर गड़ी थीं। जैसे-जैसे वीडियो आगे बढ़ रहा था, उनके चेहरे का रंग उड़ता जा रहा था। उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। जिस माँ ने उन्हें पाल-पोसकर इतना बड़ा किया, जिसके लिए वह दिन-रात मेहनत करते थे, उसी माँ को उनकी गैरमौजूदगी में घर से बाहर जानवरों की तरह निकाल दिया जाता था। सुमित भैया की आँखों से आंसू बहने लगे और उनका पूरा शरीर गुस्से और ग्लानि से कांपने लगा।

उन्होंने मुझे फोन वापस किया और बिना एक शब्द कहे भारी कदमों से अपने घर के अंदर चले गए। उस रात शांति अम्मा के घर से कोई आवाज़ तो नहीं आई, लेकिन मुझे पता था कि सुमित भैया ने एक बहुत बड़ा फैसला ले लिया है।

अगले दिन सुबह मैं अपनी खिड़की से बाहर देख रही थी। मेरी नज़र शांति अम्मा के घर के बरामदे पर गई। आज वहां कोई पुरानी कुर्सी नहीं थी। सुमित भैया की गाड़ी ऑफिस के लिए निकल चुकी थी। मैंने किसी बहाने से उनके घर का दरवाज़ा खटखटाया। दरवाज़ा रितु ने खोला, उसका चेहरा उतरा हुआ था और आँखें सूजी हुई थीं।

मैंने अंदर झाँक कर देखा। शांति अम्मा आज घर के बाहर सीढ़ियों पर नहीं, बल्कि अपने घर के मुख्य हॉल में, सोफे पर आराम से बैठी टीवी देख रही थीं। उनके चेहरे पर आज कोई खौफ या लाचारी नहीं थी, बल्कि एक सुकून था। रितु चुपचाप उनके लिए चाय ला रही थी।

सुमित भैया ने न सिर्फ अपनी पत्नी को उसकी गलती का एहसास कराया था, बल्कि अपनी माँ को उनके ही घर में उनका खोया हुआ सम्मान भी वापस दिला दिया था। उस दिन शांति अम्मा ने जब मुझे देखा, तो उनकी आँखों में कोई शब्द नहीं थे, बस एक गहरी कृतज्ञता थी। और मेरे दिल में यह सुकून था कि मैंने एक माँ को उनके ही घर में वनवास काटने से बचा लिया।

क्या आपने भी कभी अपने आस-पास किसी बुजुर्ग को ऐसी खामोश पीड़ा सहते देखा है? कभी-कभी हमारा एक छोटा सा कदम किसी की पूरी ज़िंदगी बदल सकता है। अपनी राय जरूर साझा करें।

अगर इस कहानी ने आपके दिल को छुआ तो तो लाइक, कमेंट और शेयर करें अगर इस पेज पर पहली बार आए हैं तो ऐसे ही मार्मिक कहानियाँ पढ़ने के लिए पेज को फ़ॉलो करें , धन्यवाद

लेखिका : गरिमा चौधरी

error: Content is protected !!