रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते – मुकेश पटेल

मैं अपनी एक महीने की छुट्टी बिताने के लिए अपने शहर आया हुआ था। बाजार में काफी रौनक थी और मैं अपनी माँ के लिए कुछ गरम कपड़े और दवाइयां खरीद कर वापस अपनी कार की तरफ लौट रहा था। अचानक मेरी नजर एक सेब वाले के ठेले के पास जमा हुई भीड़ पर पड़ी। भीड़ के बीच से किसी बच्चे के रोने की आवाज़ आ रही थी।

मैं पास गया तो देखा कि ठेले वाला एक छोटे से, मैले-कुचैले कपड़े पहने हुए बच्चे को बुरी तरह पीट रहा था। बच्चा मुश्किल से दस या ग्यारह साल का रहा होगा। वह ज़मीन पर गिरा हुआ था और अपने चेहरे को दोनों हाथों से छिपाने की कोशिश कर रहा था।

“चोर कहीं का! इतनी सी उम्र में चोरी करता है?” ठेले वाला चिल्ला रहा था।

मुझसे रहा नहीं गया। मैंने आगे बढ़कर ठेले वाले का हाथ पकड़ लिया और उसे पीछे धकेलते हुए कहा, “क्या कर रहे हो भाई? एक छोटे से बच्चे पर हाथ उठाते हुए शर्म नहीं आती?”

ठेले वाले ने गुस्से से कहा, “साहब, आप बीच में मत पड़िए। इस आवारा लड़के ने मेरे ठेले से सेब चुराया है।”

मैंने उस बच्चे को उठाया। वह डर से कांप रहा था। मैंने ठेले वाले को दो सौ रुपये का एक नोट थमाया और कहा, “ये लो तुम्हारे सेब के पैसे और आज के बाद इस बच्चे पर हाथ मत उठाना।” ठेले वाला पैसे लेकर बड़बड़ाता हुआ शांत हो गया। भीड़ भी धीरे-धीरे छंट गई।

मैंने उस सहमे हुए बच्चे को पास की एक चाय की दुकान पर बिठाया और उसे गरम चाय और कुछ बिस्किट दिए। वह इतनी तेज़ी से खा रहा था जैसे कई दिनों से उसे अन्न का एक दाना भी नसीब न हुआ हो।

जब वह थोड़ा शांत हुआ, तो मैंने बहुत ही प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा, “बेटा, तुमने सेब क्यों चुराया? अगर भूख लगी थी तो मांग लेते।”

उस बच्चे ने अपनी बड़ी-बड़ी और नम आँखों से मुझे देखा और बोला, “साहब, मैंने चोरी नहीं की थी। मैं पिछले दो दिनों से भूखा था। मैं ठेले के पास से गुज़र रहा था कि अचानक एक लावारिस सांड ने ठेले को टक्कर मार दी

और कुछ सेब नाली के पास मिट्टी में गिर गए। ठेले वाले ने वो सेब उठाकर फेंकने चाहे। मैंने बस मिट्टी में सना हुआ वो एक सेब उठा लिया था क्योंकि मुझसे भूख बर्दाश्त नहीं हो रही थी। लेकिन उन्होंने मुझे ही चोर समझकर मारना शुरू कर दिया।”

उसकी बात सुनकर मेरा दिल पसीज गया। मैंने उसका नाम पूछा तो उसने बताया, “मेरा नाम सूरज है।”

सूरज के माता-पिता के बारे में पूछने पर पता चला कि वह एक अनाथ है। बचपन में ही उसके सिर से माँ-बाप का साया उठ गया था और अब वह रेलवे स्टेशन के पास सोता था

और दिन भर खाने की तलाश में यहाँ-वहाँ भटकता रहता था। उस सर्द रात में सूरज को वापस उसी स्टेशन की बेदर्दी में छोड़ने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। मैंने फैसला किया कि मैं सूरज को अपने साथ अपने घर ले जाऊंगा।

घर पर मेरी माँ, देवकी देवी, अकेली रहती थीं। मेरी दो बड़ी बहनें थीं, जिनकी शादी हो चुकी थी और मेरे पिताजी का साया पाँच साल पहले ही हमारे सिर से उठ चुका था। मैं फौज में था और साल में बस एक या दो बार ही छुट्टी पर आ पाता था। माँ को अक्सर अकेलेपन और काम की वजह से परेशान होते देखा था।

जब मैं सूरज को लेकर घर पहुँचा, तो माँ पहले तो थोड़ी झिझकीं, लेकिन जब मैंने उन्हें सूरज की पूरी कहानी बताई, तो उनका मातृत्व जाग उठा। उन्होंने तुरंत सूरज को नहलाया, मेरे बचपन के कुछ पुराने कपड़े उसे पहनाए और भरपेट खाना खिलाया। सूरज के घर आने से हमारी उस सूनी और बड़ी सी कोठी में जैसे एक नई जान आ गई।

सूरज बहुत ही फुर्तीला और समझदार बच्चा था। वह सुबह उठकर आंगन में झाड़ू लगाता, माँ के लिए पूजा के फूल तोड़कर लाता और उन्हें समय पर दवाइयां याद दिलाता। माँ को भी अब घर के छोटे-मोटे कामों में बहुत राहत मिलने लगी थी और सबसे बड़ी बात, उन्हें बात करने के लिए एक साथी मिल गया था।

मेरी छुट्टियां पंख लगाकर उड़ गईं। मेरे वापस बॉर्डर पर जाने का समय आ गया था। जाते समय मैंने अपना बैग गाड़ी में रखा और सूरज के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “सूरज, अब मैं जा रहा हूँ।

तुम इस घर के छोटे बेटे हो। माँ का बहुत अच्छे से ख्याल रखना और उन्हें कभी कोई तकलीफ मत होने देना।” सूरज ने पूरी गंभीरता से सिर हिलाया और बोला, “आप फिक्र मत कीजिए भैया, मैं दादी को कोई आंच नहीं आने दूंगा।”

ड्यूटी पर पहुँचने के बाद मैं रोज़ शाम को फोन पर माँ और सूरज से बात कर लिया करता था। सूरज मुझे फोन पर घर की सारी बातें बताता कि आज उसने दादी को कौन सी सब्ज़ी बनाकर खिलाई और दादी ने उसे कौन सी कहानी सुनाई। मुझे भी अब माँ की चिंता कम सताती थी।

सब कुछ बहुत अच्छा चल रहा था, लेकिन एक रात कुछ ऐसा हुआ जिसने हमारे जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया। सर्दियों की रात थी। रात के लगभग दो बज रहे थे। अचानक माँ को सीने में भयंकर दर्द महसूस हुआ। उन्हें सांस लेने में तकलीफ होने लगी और पसीने से उनका पूरा शरीर भीग गया। वे बिस्तर से उठ भी नहीं पा रही थीं। उन्होंने किसी तरह कराहते हुए सूरज को आवाज़ दी।

सूरज, जो पास वाले कमरे में सो रहा था, आवाज़ सुनते ही दौड़कर आया। माँ की हालत देखकर कोई भी बड़ा इंसान घबरा जाता, लेकिन उस बारह साल के बच्चे ने गज़ब की हिम्मत दिखाई। सूरज ने बिना एक पल गंवाए माँ को उनका इनहेलर और पानी दिया। जब दर्द कम नहीं हुआ,

तो उसने तुरंत मेरी दी हुई इमरजेंसी डायरी निकाली। हमारे घर से अस्पताल करीब दो किलोमीटर दूर था और रात के उस पहर में कोई ऑटो या टैक्सी मिलना नामुमकिन था।

सूरज बाहर सड़क पर दौड़ा। कड़ाके की ठंड में वह नंगे पैर दौड़ते हुए हमारे पड़ोसी, शर्मा जी के घर पहुँचा। उसने लगातार उनका दरवाज़ा पीटा जब तक कि वे जाग नहीं गए। सूरज ने रोते हुए शर्मा जी को पूरी बात बताई। शर्मा जी ने तुरंत अपनी कार निकाली। सूरज ने शर्मा जी की मदद से माँ को कार में लिटाया और वे लोग सीधा सिटी अस्पताल पहुँचे।

अस्पताल पहुँचते ही माँ को इमरजेंसी वार्ड में शिफ्ट किया गया। डॉक्टरों ने तुरंत इलाज शुरू किया। सुबह जब शर्मा जी ने मुझे फोन पर यह खबर दी, तो मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई। मैं अपने कमांडिंग ऑफिसर से विशेष अनुमति लेकर अगली ही फ्लाइट से घर के लिए रवाना हो गया।

जब मैं अस्पताल पहुँचा, तो माँ होश में आ चुकी थीं और खतरे से बाहर थीं। सूरज उनके बिस्तर के पास ज़मीन पर बैठा उनका हाथ पकड़े हुए था। उसकी आँखें लाल थीं, मानो वह पूरी रात सोया ही न हो।

डॉक्टर ने मुझे केबिन में बुलाया और कहा, “तुम बहुत खुशनसीब हो कि तुम्हारे पास ऐसा बेटा है। तुम्हारी माँ को एक बहुत गंभीर हार्ट अटैक आया था। अगर इस बच्चे ने 15 मिनट की भी देरी की होती, तो हम तुम्हारी माँ को नहीं बचा पाते। इस बच्चे की सूझबूझ ने उनकी जान बचा ली।”

मैं डॉक्टर के केबिन से बाहर आया और सीधा सूरज को गले लगा लिया। मेरी आँखों से आंसू बह रहे थे। मैंने उसे सड़क से एक अनाथ समझकर उठाया था, लेकिन आज उसने साबित कर दिया था कि वह अनाथ नहीं, बल्कि हमारे घर का मसीहा है। उस दिन मुझे एहसास हुआ कि रिश्ते सिर्फ खून से नहीं बनते; कुछ रिश्ते इंसानियत, प्यार और निस्वार्थ सेवा से बनते हैं, जो दुनिया के किसी भी खून के रिश्ते से कहीं अधिक मजबूत होते हैं। आज सूरज मेरा छोटा भाई है और मेरी माँ का सबसे दुलारा बेटा।

आपकी नज़र में इंसानियत बड़ी है या खून के रिश्ते? क्या कभी किसी अजनबी ने आपके जीवन में फरिश्ता बनकर आपकी मदद की है? अपने अनुभव जरूर साझा करें।

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लेखक : मुकेश पटेल

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