**भ्रम के साये: एक पिता का मौन और बेटी की नादानी** – विनीता सिंह 

 शिवानी , जो अपने पिता के निस्वार्थ प्यार को भूलकर रोहन के झूठे आंसुओं पर पिघल गई थी, उसने हामी भर दी। रोहन ने उसे हिदायत दी कि वह घर से निकलते वक्त अपनी माँ के गहने और कुछ नकदी जरूर साथ ले आए, ताकि शुरुआत के कुछ दिन वे आराम से काट सकें। 

शहर के सबसे प्रतिष्ठित और रसूखदार व्यापारी, ठाकुर महेंद्र प्रताप सिंह की हवेली में आज उत्सव का सा माहौल था। हवेली को गेंदे के फूलों और रंग-बिरंगी रोशनियों से सजाया जा रहा था। महेंद्र प्रताप जी की इकलौती और बेहद लाडली बेटी, शिवानी  का रिश्ता शहर के ही एक बहुत संभ्रांत और सुशिक्षित परिवार में तय हो गया था।

लड़के का नाम आदित्य था, जो विदेश से उच्च शिक्षा प्राप्त करके अपने पुश्तैनी कारोबार को नई ऊंचाइयों पर ले जा रहा था। महेंद्र प्रताप जी ने अपनी बेटी के लिए एक ऐसा जीवनसाथी चुना था जो न केवल धन-धान्य से संपन्न था, बल्कि उसके संस्कार और विचार भी बेहद सुलझे हुए थे।

पूरे घर में बधाइयों का तांता लगा हुआ था, रिश्तेदारों की चहल-पहल से घर का कोना-कोना गूंज रहा था। लेकिन, इस सारी चमक-दमक और खुशियों के बीच, हवेली के ऊपरी माले पर स्थित एक कमरे में गहरा सन्नाटा और उदासी छाई हुई थी। यह कमरा शिवानी  का था। 

शिवानी  अपने बिस्तर पर बैठी, आंसुओं से भीगी आँखों से अपने फोन की स्क्रीन को घूर रही थी। उसके लिए यह रिश्ता किसी सजा से कम नहीं था।

घर वालों को लग रहा था कि उनकी बेटी एक बहुत बड़े घराने की बहू बनने जा रही है, लेकिन शिवानी  का दिल किसी और ही दुनिया में कैद था। वह पिछले एक साल से रोहन नाम के एक लड़के के प्रेम जाल में बुरी तरह उलझी हुई थी। 

रोहन एक ऐसा नौजवान था जिसका भविष्य और वर्तमान दोनों ही दिशाहीन थे। वह कुछ काम-धाम नहीं करता था, बस अपने दोस्तों के साथ बाइक पर शहर की सड़कों पर आवारागर्दी करना और बड़ी-बड़ी बातें हांकना ही उसकी दिनचर्या थी। रोहन ने शिवानी  को उसके रूप-रंग और सबसे बढ़कर, ठाकुर महेंद्र प्रताप की इकलौती वारिस होने की वजह से अपने जाल में फंसाया था।

वह बहुत अच्छी तरह जानता था कि अगर शिवानी  उसकी हो गई, तो उसे जिंदगी भर कुछ भी करने की जरूरत नहीं पड़ेगी, उसे बैठे-बिठाए ऐशो-आराम की जिंदगी मिल जाएगी। रोहन बहुत मीठा बोलता था। उसने शिवानी  की मासूमियत का फायदा उठाया

और उसे यह विश्वास दिला दिया कि वह इस दुनिया में शिवानी  से ज्यादा किसी और से प्यार नहीं करता। शिवानी  भी उसकी उन खोखली बातों में इस कदर अंधी हो चुकी थी

कि उसे अपना अच्छा-बुरा कुछ भी नहीं सूझ रहा था। रोहन के महंगे शौक, उसके कपड़े, यहाँ तक कि उसकी बाइक का पेट्रोल भी अक्सर शिवानी  की पॉकेट मनी से ही आता था, लेकिन प्यार में अंधी शिवानी  को यह सब रोहन की ‘मजबूरी’ लगता था, उसका स्वार्थ नहीं।

जब शिवानी  को अपनी सगाई की बात पता चली, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। उसने रोहन को फोन करके मिलने बुलाया। शहर के बाहर एक सुनसान कैफे में जब दोनों मिले, तो शिवानी  फूट-फूट कर रोने लगी। उसने रोहन से कहा कि उसके पिता ने उसका रिश्ता तय कर दिया है और वह अब क्या करे।

रोहन अंदर ही अंदर घबरा गया कि कहीं उसके हाथ से ‘सोने की मुर्गी’ न निकल जाए। उसने तुरंत एक नाटक रचा। उसकी आँखों में झूठे आंसू आ गए और उसने शिवानी  का हाथ पकड़कर कहा,

“शिवानी , मैं तुम्हारे बिना मर जाऊंगा। ये अमीर लोग हम गरीबों के प्यार को कभी नहीं समझेंगे। तुम्हारे पिता सिर्फ तुम्हारा सौदा कर रहे हैं। अगर तुम सच में मुझसे प्यार करती हो, तो हमें आज रात ही भागना होगा। हम कहीं दूर जाकर अपनी नई दुनिया बसाएंगे।”

शिवानी , जो अपने पिता के निस्वार्थ प्यार को भूलकर रोहन के झूठे आंसुओं पर पिघल गई थी, उसने हामी भर दी। रोहन ने उसे हिदायत दी कि वह घर से निकलते वक्त अपनी माँ के गहने और कुछ नकदी जरूर साथ ले आए, ताकि शुरुआत के कुछ दिन वे आराम से काट सकें। 

उस रात हवेली में सब लोग थके-हारे गहरी नींद में सो रहे थे। रात के करीब दो बज रहे थे। शिवानी  ने अपने सूटकेस में अपने कपड़े, माँ के सारे गहने और तिजोरी से निकाली हुई लाखों की नकदी रख ली।

उसके हाथ कांप रहे थे, लेकिन रोहन के साथ बिताए जाने वाले ‘सपनों के जीवन’ की धुन ने उसकी सोचने-समझने की शक्ति को शून्य कर दिया था। वह दबे पांव हवेली के पिछले दरवाजे से बाहर निकली। बाहर हल्की बारिश हो रही थी। रोहन ने उसे शहर के किनारे बने एक पुराने और खंडहर हो चुके मंदिर के पास बुलाया था। 

शिवानी  रिक्शा लेकर जब उस पुराने मंदिर के पास पहुंची, तो वहां का नजारा देखकर उसके कदम वहीं ठिठक गए। मंदिर के चबूतरे पर रोहन खड़ा था, लेकिन वह अकेला नहीं था। उसके ठीक सामने, हाथ में एक बड़ा सा सूटकेस लिए ठाकुर महेंद्र प्रताप सिंह खड़े थे।

शिवानी  के पिता! शिवानी  डर के मारे एक पुरानी दीवार के पीछे छुप गई। उसका दिल जोरों से धड़कने लगा। उसे लगा कि उसके पिता को सब पता चल गया है और अब वे रोहन को बहुत मारेंगे या पुलिस के हवाले कर देंगे। वह रोहन को बचाने के लिए बाहर निकलने ही वाली थी कि तभी उसे अपने पिता की आवाज सुनाई दी। वह आवाज न तो गुस्से में थी और न ही उसमें कोई धमकी थी। 

“रोहन,” महेंद्र प्रताप जी ने बहुत ही शांत स्वर में कहा, “मैं जानता हूँ कि तुम मेरी बेटी से कोई प्यार-व्यार नहीं करते। तुम्हें सिर्फ मेरे दौलत से प्यार है। शिवानी  नादान है, वह तुम्हारी चिकनी-चुपड़ी बातों में आ गई है, लेकिन मैं एक पिता हूँ, मैं एक नजर में इंसान को परख लेता हूँ। मेरी बेटी ने अपनी माँ के जो गहने और पैसे तुम्हारे लिए चुराए हैं, वो शायद बीस-पच्चीस लाख के होंगे।” 

रोहन चुपचाप खड़ा सुन रहा था। उसके चेहरे पर न कोई डर था, न ही शिवानी  के लिए कोई फिक्र।

महेंद्र प्रताप जी ने वह सूटकेस खोलकर रोहन के सामने कर दिया। सूटकेस में नोटों की गड्डियां भरी हुई थीं। “इस सूटकेस में पूरे पचास लाख रुपये हैं,” महेंद्र प्रताप जी बोले। “ये तुम्हारी उस छोटी सी चोरी से कहीं ज्यादा हैं। इसे उठाओ और मेरी बेटी की जिंदगी से हमेशा के लिए चले जाओ। अगर तुमने यह रकम ले ली, तो मैं समझ जाऊंगा कि तुम्हारी कीमत बस इतनी ही है, और अगर तुमने इसे ठुकरा दिया, तो मैं खुद शिवानी  का हाथ तुम्हारे हाथ में दे दूंगा।”

दीवार के पीछे खड़ी शिवानी  की सांसें रुक गईं। उसे पूरा यकीन था कि उसका रोहन, जो उसके बिना मरने की कसमें खा रहा था, इस सूटकेस को लात मार देगा और उसके पिता से कहेगा कि उसे पैसा नहीं, सिर्फ शिवानी  चाहिए। 

लेकिन अगले ही पल जो हुआ, उसने शिवानी  की पूरी दुनिया को चकनाचूर कर दिया।

रोहन की आँखों में लालच की एक गंदी चमक आ गई। उसने बिना एक पल गंवाए आगे बढ़कर उस सूटकेस को अपने हाथों में ले लिया। उसके होठों पर एक बेशर्म मुस्कान थी। “ठाकुर साहब, आप सच में बहुत बड़े व्यापारी हैं। आपने सही पहचाना। मुझे उस बेवकूफ लड़की से कोई लेना-देना नहीं था, मुझे तो बस अपनी लाइफ सेट करनी थी। पचास लाख में तो मेरी जिंदगी मजे से कट जाएगी। आप अपनी बेटी को संभालिए, मैं आज ही यह शहर छोड़ दूंगा।” 

रोहन सूटकेस लेकर पलटा ही था कि सामने शिवानी  खड़ी थी। उसके हाथ से गहनों वाला बैग नीचे गिर चुका था। बारिश के पानी के साथ-साथ उसकी आँखों से आंसुओं का सैलाब बह रहा था। रोहन उसे देखकर एक पल के लिए घबराया, लेकिन फिर उसने नजरें चुरा लीं और सूटकेस सीने से लगाकर वहां से भाग खड़ा हुआ। उसने एक बार पलटकर भी उस शिवानी  को नहीं देखा, जिसके लिए वह कुछ घंटे पहले मरने का नाटक कर रहा था।

शिवानी  वहीं कीचड़ में घुटनों के बल गिर पड़ी और फूट-फूट कर रोने लगी। उसे अपने आप पर, अपनी पसंद पर इतनी घिन आ रही थी कि वह बता नहीं सकती थी। जिस इंसान के लिए वह अपने उस पिता को छोड़कर जा रही थी, जिसने उसे बचपन से पलकों पर बिठाकर रखा था, वह इंसान उसे चंद नोटों के लिए बेचकर चला गया। 

महेंद्र प्रताप जी धीरे-धीरे चलकर अपनी बेटी के पास आए। उन्होंने शिवानी  को डांटा नहीं, उस पर चिल्लाए नहीं। उन्होंने बस अपना छाता शिवानी  के ऊपर कर दिया ताकि वह बारिश से बच सके। 

“पिता की सख्ती और पाबंदियां अक्सर बच्चों को दुश्मन की तरह लगती हैं, बेटा,” महेंद्र प्रताप जी ने शिवानी  के सिर पर हाथ रखते हुए भारी आवाज में कहा, “लेकिन वो सख्ती सिर्फ इसलिए होती है ताकि हमारे बच्चों के कोमल पैरों में दुनिया के फरेब के कांटे न चुभ जाएं। मैं चाहता तो उसे पुलिस से पकड़वा सकता था, लेकिन तब तुम मुझे विलेन समझतीं और जीवन भर उस धोखेबाज के लिए रोतीं। मैं अपनी बेटी को एक भ्रम में घुट-घुट कर मरते हुए नहीं देख सकता था।”

शिवानी  ने अपने पिता के पैर पकड़ लिए और वह दहाड़ें मार-मार कर रोने लगी। “मुझे माफ़ कर दीजिए बाबूजी! मैं अंधी हो गई थी। मुझे अपना अच्छा-बुरा कुछ नहीं दिखा। मैं कितनी बड़ी गलती करने जा रही थी।”

महेंद्र प्रताप जी ने उसे उठाया और गले से लगा लिया। उस रात शिवानी  ने सिर्फ अपना घर नहीं छोड़ा था, बल्कि उसने अपने बचपन की नादानियों को हमेशा के लिए छोड़ दिया था। 

अगले कुछ हफ़्तों में शिवानी  ने खुद को पूरी तरह बदल लिया। उसने अपने पिता के फैसले का सम्मान किया और आदित्य के साथ विवाह के बंधन में बंध गई। आदित्य सच में एक बहुत ही परिपक्व, समझदार और प्यार करने वाला जीवनसाथी साबित हुआ। उसने न केवल शिवानी  को सम्मान दिया, बल्कि उसे अपनी पहचान बनाने के लिए भी प्रेरित किया। शिवानी  को अब समझ में आ चुका था कि सच्चा प्यार मीठी बातों और फिल्मी वादों में नहीं होता, बल्कि वह उस भरोसे और सम्मान में होता है जो आदित्य उसे हर दिन दे रहा था। वह आज अपने पिता की उस खामोश समझदारी के लिए मन ही मन उन्हें धन्यवाद देती थी, जिन्होंने उसे एक गहरे खड्डे में गिरने से बचा लिया था।

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लेखिका : विनीता सिंह 

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