फासलों के पुल: जब एक सास ने निभाया माँ का धर्म – सविता गर्ग 

 “माँ जी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मुझे पता है आज मैंने आपको बहुत तकलीफ दी है,” मीरा सुबकते हुए कह रही थी। “सिद्धार्थ मुझे आज एक कैफे में ले गया था।

उसने मुझसे वही बात कही जो उसने अभी आपसे कही। लेकिन माँ जी… मैंने उसे मना कर दिया है। मैंने सिद्धार्थ से साफ कह दिया है कि मेरी दुनिया अब सिर्फ आप हैं और यह घर है। मैं आपको इस उम्र में अकेला छोड़कर कहीं नहीं जा सकती।”

सुमित्रा देवी के घर के उस बड़े से आँगन में पिछले तीन सालों से एक अजीब सी खामोशी का डेरा था। उनका इकलौता बेटा, कबीर, तीन साल पहले एक लंबी और जानलेवा बीमारी के बाद इस दुनिया से विदा हो गया था। उस दिन के बाद से सुमित्रा देवी की दुनिया उनकी बहू, मीरा के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गई थी।

मीरा सिर्फ उनकी बहू नहीं थी, बल्कि उनके बुढ़ापे की लाठी, उनके सूखे हुए आंसुओं की नमी और उस वीरान घर की इकलौती धड़कन थी। लेकिन पिछले कुछ महीनों से इस शांत घर में कुछ ऐसा हो रहा था, जो सुमित्रा देवी के मन में एक अनजानी सी हलचल और खौफ पैदा कर रहा था। यह हलचल थी मीरा और सिद्धार्थ की बढ़ती हुई नज़दीकियों की।

सिद्धार्थ, कबीर का सबसे जिगरी दोस्त था। कबीर के जाने के बाद जहाँ सारे रिश्तेदार सिर्फ सांत्वना देकर अपने-अपने घरों को लौट गए थे, वहीं सिद्धार्थ एक मजबूत दीवार की तरह इस परिवार के साथ खड़ा रहा। बैंक के कागज़ात से लेकर घर के राशन तक, हर छोटी-बड़ी ज़िम्मेदारी उसने अपने कंधों पर ले ली थी।

शुरुआत में सुमित्रा देवी को सिद्धार्थ का आना-जाना बहुत सुकून देता था, लेकिन अब हालात बदल रहे थे। सिद्धार्थ अब सिर्फ घर के कामों के लिए नहीं आता था। वह मीरा की उन छोटी-छोटी बातों का खयाल रखने लगा था, जिन्हें शायद मीरा खुद भी भूल चुकी थी।

कभी मीरा की पसंदीदा किताबें ले आना, तो कभी उसे याद दिलाकर दवाइयां खिलाना। सिद्धार्थ की नज़रों में मीरा के लिए जो एक नया भाव जन्म ले रहा था, वह सुमित्रा देवी से छिपा नहीं था। और सबसे ज्यादा तकलीफदेह बात यह थी कि मीरा भी अब सिद्धार्थ की मौजूदगी में एक अजीब सी राहत महसूस करने लगी थी। वह कुछ कहती नहीं थी, लेकिन उसकी झुकी हुई पलकें और चेहरे पर आने वाली वो हल्की सी रौनक सब कुछ बयां कर देती थी।

सुमित्रा देवी को यह सब अंदर ही अंदर चुभने लगा था। जिस बात का उन्हें आभास हो रहा था, वह उसका सामना करने से कतरा रही थीं। उन्हें डर था कि अगर मीरा भी सिद्धार्थ के साथ अपनी नई दुनिया बसा लेगी, तो उनका क्या होगा? क्या वो इस बड़े से घर में कबीर की यादों के सहारे तिल-तिल कर मरने के लिए अकेली रह जाएंगी?

यह असुरक्षा उन्हें स्वार्थी बना रही थी। मीरा उनकी इस मनःस्थिति को बहुत अच्छी तरह समझती थी। वह जानती थी कि सुमित्रा देवी अंदर से कितनी डरी हुई हैं।

मीरा और सुमित्रा का रिश्ता बहुत अनमोल था, एक ऐसा रिश्ता जिसे दर्द ने सींचा था। शायद इसीलिए, सब कुछ महसूस करने के बावजूद, मीरा ने कभी अपने दिल की बात जुबां पर नहीं आने दी और हमेशा अपनी भावनाओं को दबा कर रखा।

लेकिन एक रविवार का दिन ऐसा आया जिसने इस खामोश रिश्ते में एक बड़ा तूफ़ान खड़ा कर दिया। उस दिन मीरा की स्कूल से छुट्टी थी। आम तौर पर रविवार को मीरा पूरा दिन सुमित्रा देवी के साथ बैठकर पुरानी बातें करती या घर के काम निपटाती थी। लेकिन आज सुबह से ही कुछ अलग था।

मीरा तैयार होकर अपने कमरे से बाहर आई। उसने गहरे नीले रंग का एक साधारण सा सूट पहना था, जो कबीर के जाने के बाद उसने पहली बार निकाला था। सुमित्रा देवी कुछ पूछ पातीं, उससे पहले ही मीरा ने बस इतना कहा, “माँ जी, मुझे थोड़ा काम है, मैं बाहर जा रही हूँ।” और वह तेज़ कदमों से बाहर निकल गई।

सुमित्रा देवी वहीं अवाक खड़ी रह गईं। मीरा कभी भी उन्हें बिना पूरी बात बताए इस तरह घर से बाहर नहीं गई थी। दोपहर ढलने लगी, लेकिन मीरा का कुछ पता नहीं था। सुमित्रा देवी ने उसे कई बार फोन लगाया, लेकिन उसका मोबाइल लगातार ‘स्विच ऑफ’ आ रहा था। उनका दिल अब ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा था। क्या हुआ होगा?

कहीं उसे कोई चोट तो नहीं लग गई? या कहीं वह सिद्धार्थ के साथ…? यह आखिरी खयाल आते ही सुमित्रा देवी का मन एक अजीब सी कड़वाहट और डर से भर गया। वह कभी दरवाज़े की तरफ देखतीं, तो कभी दीवार पर टंगी घड़ी की तरफ। समय जैसे काटे नहीं कट रहा था।

शाम के पांच बजने को आए थे, लेकिन मीरा की कोई खबर नहीं थी। सुमित्रा देवी का ब्लड प्रेशर बढ़ने लगा था। आज मीरा ने सचमुच हद पार कर दी थी। उनका दिल किसी अनहोनी की आशंका से बैठने लगा था।

तभी बाहर दरवाज़े की घंटी बजी। सुमित्रा देवी लगभग दौड़ते हुए दरवाज़े तक गईं और हाँफते हुए दरवाज़ा खोला। सामने का नज़ारा देखकर उनके पैरों तले से ज़मीन खिसक गई। सामने मीरा और सिद्धार्थ एक साथ खड़े थे। दोनों के चेहरे पर एक अजीब सी गंभीरता थी।

मीरा की आँखें सूजी हुई थीं, जैसे वह बहुत रोई हो। सुमित्रा देवी को दोनों को एक साथ इस तरह देखकर बिल्कुल भी अच्छा नहीं लगा। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ जैसे जिस बात से वह इतने महीनों से भाग रही थीं, आज वह साक्षात उनके दरवाज़े पर आकर खड़ी हो गई है।

ना चाहते हुए भी, एक अजीब सी घुटन के साथ सुमित्रा देवी ने दोनों को अंदर आकर बैठने को कहा। ड्राइंग रूम में एक भारी सन्नाटा पसरा था। हम तीनों ही मौन स्थिति में थे। बाहर सड़क से आती गाड़ियों की आवाज़ें भी इस सन्नाटे को तोड़ नहीं पा रही थीं। अचानक सिद्धार्थ अपनी जगह से उठा और सीधा आकर सुमित्रा देवी के सामने ज़मीन पर बैठ गया।

उसने बहुत ही अदब और स्नेह के साथ सुमित्रा देवी के दोनों हाथ अपने हाथों में ले लिए। सुमित्रा देवी का दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उन्हें अपनी धड़कनें अपने कानों में सुनाई दे रही थीं। वह इस बात का सामना नहीं करना चाहती थीं, वह इस सच को सुनना नहीं चाहती थीं।

लेकिन आखिर वही हुआ जिसका उन्हें डर था। सिद्धार्थ ने बहुत ही ठहरी हुई और भारी आवाज़ में कहा, “माँ जी, मैं जानता हूँ कि मेरे इस सवाल से आपको बहुत तकलीफ होगी।

लेकिन मैं अब और खामोश नहीं रह सकता। मैं कबीर की जगह कभी नहीं ले सकता, और ना ही मैं लेना चाहता हूँ। लेकिन मैं मीरा को इस तरह हर दिन अंदर ही अंदर घुटते हुए भी नहीं देख सकता। मैं उसे वह सारी खुशियाँ देना चाहता हूँ, जिसकी वह हक़दार है। मैं अपने लिए मीरा का हाथ माँगने आया हूँ।”

ये शब्द सुनते ही सुमित्रा देवी का शरीर सुन्न पड़ गया। उनके कान जैसे सुन्न हो गए थे। उन्हें ऐसा लगा जैसे कोई उनके सीने से कबीर की आख़िरी निशानी भी छीन कर ले जा रहा है। वह सिद्धार्थ से कुछ कह नहीं सकीं। उन्होंने अपने हाथ झटके से छुड़ाए और बिना मीरा की तरफ देखे, तेज़ कदमों से अपने कमरे में चली गईं

और अंदर से दरवाज़ा बंद कर लिया। कमरे में अँधेरा था। वह कबीर की बड़ी सी तस्वीर के सामने ज़मीन पर बैठ गईं और फूट-फूट कर रोने लगीं। उनका स्वार्थ, उनका डर और उनका मातृत्व, सब आपस में टकरा रहे थे।

कुछ ही देर बाद, दरवाज़े पर हल्की सी दस्तक हुई। “माँ जी… दरवाज़ा खोलिए ना,” बाहर से मीरा की रुंधी हुई आवाज़ आई। सुमित्रा देवी ने उठकर दरवाज़ा खोला। मीरा दौड़कर उनके गले लग गई और बिलख-बिलख कर रोने लगी।

“माँ जी, मुझे माफ़ कर दीजिए। मुझे पता है आज मैंने आपको बहुत तकलीफ दी है,” मीरा सुबकते हुए कह रही थी। “सिद्धार्थ मुझे आज एक कैफे में ले गया था। उसने मुझसे वही बात कही जो उसने अभी आपसे कही। लेकिन माँ जी… मैंने उसे मना कर दिया है। मैंने सिद्धार्थ से साफ कह दिया है कि मेरी दुनिया अब सिर्फ आप हैं और यह घर है। मैं आपको इस उम्र में अकेला छोड़कर कहीं नहीं जा सकती।”

यह सुनकर सुमित्रा देवी के भीतर जैसे कोई बिजली सी कौंध गई। उन्होंने मीरा के आँसू पोंछे और उसका चेहरा अपने हाथों में ले लिया। उनके दिमाग में पिछले तीन सालों के दृश्य किसी फिल्म की तरह चलने लगे। उन्हें याद आया कि जब कबीर ब्लड कैंसर जैसी भयानक बीमारी से जूझ रहा था, तब कैसे इस लड़की ने रात-रात भर जागकर उसकी सेवा की थी। अपना खाना-पीना, अपनी नींद, अपना सब कुछ भूलकर वह सिर्फ कबीर की सांसों को बचाने में लगी रही थी। जब अस्पताल के बिल चुकाने के लिए पैसे कम पड़ गए थे, तो मीरा ने अपने सारे गहने बिना एक पल सोचे बेच दिए थे। कबीर के जाने के बाद भी, एक पल के लिए भी मीरा ने अपने कर्तव्यों से मुँह नहीं मोड़ा। सास-बहू का रिश्ता होते हुए भी उसने हमेशा एक बेटी बनकर सुमित्रा देवी को संभाला था।

सुमित्रा देवी को अचानक अपने आप से घिन आने लगी। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मैं इतनी स्वार्थी कैसे हो गई? जिस लड़की ने मेरे बेटे को इतना प्यार दिया, जिसने अपनी पूरी जवानी इस घर के दुख समेटने में निकाल दी, मैं उसी की ज़िंदगी को एक अँधेरी कोठरी में कैद करने पर तुली हूँ? सिर्फ इसलिए कि मैं अकेली ना रह जाऊँ?

सुमित्रा देवी ने महसूस किया कि सिद्धार्थ और कबीर बहुत अच्छे दोस्त थे। सिद्धार्थ ने भी कबीर की बीमारी में उनके परिवार का दिन-रात साथ दिया था। अगर इस दुनिया में कोई इंसान मीरा को सच में समझ सकता है, उसकी कद्र कर सकता है और उसकी बेनूर ज़िंदगी में फिर से रंग भर सकता है, तो वह सिद्धार्थ ही है।

सुमित्रा देवी ने एक गहरी साँस ली। उनके भीतर का सारा डर, सारी असुरक्षा जैसे अचानक कहीं गायब हो गई थी। उन्होंने मीरा को अपने सीने से लगा लिया और उसके बालों को सहलाते हुए कहा, “पगली… तूने उसे मना क्यों कर दिया? क्या तुझे लगता है कि तेरी यह माँ इतनी कमज़ोर है कि तुझे अपनी बेड़ियों में जकड़ कर रखेगी?”

मीरा ने हैरानी से सुमित्रा देवी की तरफ देखा।

“तूने मेरी और मेरे बेटे की इतनी सेवा की है मीरा, जितना कोई सगी बेटी भी नहीं करती। मैं भी तुझे हमेशा खुश देखना चाहती हूँ। और मुझे पता है कि तेरी खुशी सिद्धार्थ के साथ है,” सुमित्रा देवी की आँखों से अब जो आँसू बह रहे थे, वो दुख के नहीं, बल्कि एक असीम सुकून के थे। “एक सास के रूप में शायद मैं तुझे जाने से रोक लेती, लेकिन एक माँ होने के नाते मेरा यह धर्म है कि मैं अपनी बेटी का घर बसाऊँ। जा, सिद्धार्थ को अंदर बुला कर ला।”

उस रात उस घर में बहुत सालों बाद किसी ने चैन की साँस ली थी। सुमित्रा देवी अब बहुत हल्का महसूस कर रही थीं। उन्होंने खुद सिद्धार्थ के परिवार वालों से बात की और सारी रस्में तय कीं।

आखिरकार, एक महीने बाद, उसी आँगन में जहाँ कभी मातम पसरा था, वहाँ शहनाइयां गूँजीं। सुमित्रा देवी ने खुद अपने हाथों से मीरा को जोड़ा पहनाया और सिद्धार्थ के साथ उसकी शादी करवाकर एक सास के चोले को हमेशा के लिए उतार दिया और पूर्ण रूप से एक माँ बन गईं। उन्होंने मीरा का कन्यादान किया और उसे एक नई ज़िंदगी की ओर विदा किया। अब उस घर में खामोशी नहीं थी, बल्कि एक माँ के निस्वार्थ प्रेम और एक बेटी की नई शुरुआत का सुकून भरा एहसास था।


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 लेखिका : सविता गर्ग 

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