कुसुम जी को अपनी बेटी सुरभि की शादी की बहुत चिंता थी उनका मानना था लड़की एक बार अपने घर चली जाए तो वो गंगा नहा ले ।सुरभि पढ़ी लिखी थी लेकिन कुसुमजी की सोच के कारण वो नौकरी नहीं कर पाई उनका सोचना था कि बाहर निकलते ही लड़कियां बिगड़ जाती है
सुरभि के पापा और भाई कई बार समझाते कि आज कल लड़कियों का आत्मनिर्भर होना भी बहुत जरूरी है लेकिन उनकी पुरानी सोच के कारण वो दोनों को चुप कर देती और कहती अगर कल को कोई ऊंच नीच हो गई तो कौन भुगतेगा मेरे जीते जी ऐसा नहीं होगा तीनों मां की खातिर चुप रह जाते।
लड़का देखने की तैयारी ज़ोरशोर से चल रही थी और कुसुम जी की मन्नत पूजा भी उतनी ही बढ़ती जा रही थी एक दिन कुसुमजी की बहन ने एक रिश्ता बताया परिवार भी पैसे वाला था और घर में दो भाई, मां और पिताजी। लड़का गौरव एक कंपनी में ऊंचे पद पर था और दिखने में भी सुन्दर था कुसुम जी ने मन बना लिया
कि इस लड़के से ही रिश्ता पक्का हो जाए और उनकी इच्छा पूरी भी हो गई गौरव के घरवालों को सुरभि पसंद आ गई पहले तो उन्होंने कुछ भी लेने से इनकार कर दिया (ये सुनकर कुसुम जी सुरभि के भाग्य को सराहने लगी) उन्हे घरेलु लड़की ही चाहिए थी गौरव ने भी हां कर दी और जल्दी ही सुरभि और गौरव की शादी हो गई ।
कुछ दिन सब सही रहा फिर सुरभि की सास निशा जी बात बात में सुरभि को दहेज के लिए ताने मारने लगी अरे हमारा नहीं तो अपना ही मान रख लेते बिल्कुल ही खाली हाथ भेज दिया जबकि अपनी सामर्थ्य अनुसार सुरभि सामान ले कर ही आई थी सुरभि सुबह से सबकी सेवा में लगी रहती
और रात को ही फ्री हो पाती गौरव भी अपनी दुनियां में मस्त था उसे सुरभि की कोई चिंता नहीं की नई नई शादी हुई है सुरभि के भी कुछ अरमान होंगे सुरभि कभी कहती भी कि चलो कहीं घूम आते है या थोड़ा वक्त मुझे भी दिया करो तो बोलता कि नौकरी करना आसान नहीं है।
तुम क्या जानों कितनी मेहनत करनी पड़ती है तुम्हें तो बैठे बैठाए सब मिल जाता सुरभि मन मसोस के रह जाती अब उसे अपनी मम्मी पर गुस्सा आता कि उन्होंने अपनी जिद्द में उसकी नहीं सुनी।वो अपनी ससुराल की बातें मम्मी को बताती तो कहती अरे लड़कियों के भाग्य में तो ये सब सुनना लिखा ही रहता है उन्हें सब भूल कर अपनी गृहस्थी निभानी चाहिए।
कुछ महीनों बाद सुरभि को अचानक चक्कर आए डॉक्टर के दिखाने पर पता चला कि सुरभि मां बनने वाली है पहली बार निशा जी को खुश देखा सुरभि को लगा चलो बच्चा आने से सब ठीक हो जाएगा पर कुछ दिनों बाद बही ताने देख बहू कान खोल कर सुन लो लड़का ही होना चाहिए तुम तो कुछ लाई नहीं लड़की पैदा करके हम पर बोझ नहीं बढ़ा देना ।
सुरभि उनके ताने सुनकर परेशान हो गई थी लेकिन क्या करती जब मां ही नहीं समझ रही तो सास को क्या कहती । निशाजी ने सातवां महीना लगते ही सुरभि को मायके भेज दिया कि हमारे यहां मायके में ही डिलीवरी होती है जबकि मन में खर्चा बचाने की लालसा थी ।
सुरभि ने एक प्यारी सी बच्ची को जन्म दिया खबर सुनते ही गौरव और निशाजी बुझे मन से देखने आए और बोले घर आने की जल्दी नहीं जब घरवाले इंतजाम कर ले रुपयों का तब आना नातिन के लिए तो कुछ करेंगे
हमारी तो किस्मत ही फूट गई पहले बहू भी आई खाली हाथ और साथ में एक और खर्चा ले आई। कुसुम जी बोली आप कैसी बात कर रही हैं बहन जी लड़कियों का असली घर तो उनका ससुराल होता है हम से जो बन पड़ेगा वो कर देंगे बाकी उसका भाग्य।
अब सुरभि का आत्मसम्मान जवाब दे चुका था उसने कहा बहुत हो गया मेरी बेटी बोझ नहीं है और दोष भाग्य का नहीं सोच का है जो आज तक बदल नहीं पाई।
मांजी मैंने अपने लिए सब सह लिया पर अब नहीं मैं उस घर में नहीं आऊंगी जहां घर की लक्ष्मी का सम्मान नहीं है तब तक कुसुम जी बोली नहीं तुझे ससुराल में ही रहना पड़ेगा मैं तुझे हमेशा के लिए नहीं रखूंगी।
सुरभि बोली चिंता मत करो मां में अपनी बेटी को खुद पाल लूंगी जब एक लक्ष्मी ही दूसरी लक्ष्मी का सम्मान नहीं कर पा रही तो किसी और से क्या उम्मीद रखेंगे ।
सुनकर कुसुम जी और निशाजी की आँखें झुक गई तब तक सुरभि के पापा और भाई आ गए बोले तू चिंता मत कर हम तेरे साथ है और अपनी दोनों लक्ष्मी को सम्मान से लेकर जाएंगे कुसुम जी ने मौन स्वीकृति दे दी ।
कुछ दिनों में सुरभि ने नौकरी आरम्भ कर दी निशाजी माफी मांगने और सुरभि को घर ले जाने आई लेकिन इस बार सुरभि अपने फैसले पर अडिग थी ।
कई बार हमारी सोच ही रिश्ते टूटने का कारण बनती है लेकिन हम उसे भाग्य का दोष मानकर सह लेते है जबकि दोष हर बार भाग्य का नहीं हमारी सोच का होता है अपनी सोच के कारण किसी के आत्मसम्मान को चोट पहुंचाना गलत है।।
स्वरचित
अंजना ठाकुर
#कहानी प्रतियोगिता – घर की लक्ष्मी का सम्मान