यह सुनकर कबीर आगबबूला हो गया। “तुम क्या बकवास कर रही हो?”
“सच कह रही हूँ,” श्रुति ने अपनी बात जारी रखी। “तुम जिसे प्यार कहते हो, वो शायद तुम्हारी जिद थी। प्यार में इंसान आज़ाद करता है, कैद नहीं। और वैसे भी कबीर, अगर तुम खुश नहीं हो,
तो किसी और की खुशी की वजह तो बन ही सकते हो न? यह कहाँ लिखा है कि हर कोई सिर्फ तुम्हें खुशी देने के लिए जिए? जीवन हमेशा लेने का नाम नहीं है। कभी-कभी हमें अपने दर्द को दरकिनार करके किसी दूसरे को खुशी देनी पड़ती है।”
शहर के उस पुराने मोहल्ले में शाम गहरे सन्नाटे के साथ उतर रही थी। आसमान में काले बादल छाए हुए थे और हल्की बूंदाबांदी शुरू हो चुकी थी। घर की छत पर बने छोटे से कमरे में 26 साल का कबीर अंधेरे में बैठा था। कमरे में सिवाय एक मोबाइल की स्क्रीन की मद्धम रोशनी के और कुछ नहीं था।
कबीर की आँखें उसी स्क्रीन पर टिकी थीं, जहां किसी और की शादी की तस्वीरें चमक रही थीं। उसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी, आँखों के नीचे गहरे काले घेरे थे और कमरे में चारों तरफ बिखरा हुआ सामान उसकी मानसिक स्थिति की गवाही दे रहा था। पिछले छह महीनों से कबीर का यही रूटीन था। नौकरी छूट चुकी थी, दोस्तों से उसने नाता तोड़ लिया था और अपने ही माता-पिता के लिए वह एक अजनबी बन चुका था।
नीचे आंगन में कबीर की माँ, सुमित्रा देवी, बार-बार सीढ़ियों की तरफ देख रही थीं। उनके हाथों में रात के खाने की थाली थी जो अब ठंडी हो चुकी थी। कबीर के पिता, दीनानाथ जी, चुपचाप दालान में बैठे अपनी पुरानी डायरी के पन्ने पलट रहे थे, लेकिन उनका ध्यान डायरी में कम और अपनी पत्नी की बेबसी पर ज्यादा था।
तभी दरवाजे की घंटी बजी। सुमित्रा देवी ने दरवाजा खोला तो सामने श्रुति खड़ी थी। श्रुति, कबीर के मामा की बेटी थी और बचपन से ही कबीर की सबसे अच्छी दोस्त और राजदार रही थी। श्रुति शहर से बाहर नौकरी करती थी, लेकिन अपनी बुआ (सुमित्रा देवी) का रोता हुआ फोन सुनकर वह दो दिन की छुट्टी लेकर दौड़ी चली आई थी। सुमित्रा देवी ने श्रुति को गले लगा लिया और उनकी आँखों से आंसू छलक पड़े। श्रुति ने उन्हें सांत्वना दी और बिना कुछ कहे, दो कप चाय बनाकर सीधे छत की तरफ बढ़ गई।
कमरे का दरवाजा आधा खुला था। श्रुति ने अंदर कदम रखा तो सीलन और घुटन का अहसास हुआ। उसने कमरे की लाइट जला दी। अचानक हुई रोशनी से कबीर ने चिढ़कर अपनी आँखें मूंद लीं।
“लाइट बंद कर दो,” कबीर की आवाज में एक रूखापन और थकान थी।
“अंधेरे में रहने से हकीकत नहीं बदल जाती, कबीर,” श्रुति ने चाय का कप उसके सामने टेबल पर रखते हुए बहुत ही शांत स्वर में कहा।
कबीर ने आँखें खोलीं और श्रुति को देखा। एक पल के लिए उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आया, फिर वह एक कड़वी हंसी हंसते हुए बोला, “तुम भी मुझे लेक्चर देने आई हो? सब यही करने आते हैं। किसी को मेरी परवाह नहीं है।”
श्रुति वहीं जमीन पर कबीर के सामने बैठ गई। “परवाह है, इसीलिए इतनी दूर से आई हूँ। और तुम यह क्या कह रहे हो कि किसी को तुम्हारी परवाह नहीं है?”
कबीर का दर्द और गुस्सा जो महीनों से अंदर दबा था, अचानक ज्वालामुखी की तरह फट पड़ा। “हाँ, सच कह रहा हूँ! मुझे इस दुनिया में कोई प्यार नहीं करता। न इस घर में, न बाहर। मैं बस एक बिना रूह का शरीर बनकर भटक रहा हूँ। जिसे मैंने सबसे ज्यादा प्यार किया, जिसके लिए मैंने दुनिया भुला दी, वो आज किसी और के साथ खुश है। कभी किसी ने मुझे नहीं चाहा, श्रुति। मैं क्या चाहता हूँ, मेरे दिल पर क्या गुजर रही है, आज तक किसी ने नहीं पूछा। मैं इस घर में एक बोझ बन गया हूँ।”
श्रुति ने चाय का घूंट लिया और बहुत ही गहराई से कबीर की आँखों में देखते हुए बोली, “अगर तुम ऐसा सोचते हो, तो इसका सीधा सा मतलब यह है कि तुम्हें भी उससे कभी सच्चा प्यार नहीं था।”
यह सुनकर कबीर आगबबूला हो गया। “तुम क्या बकवास कर रही हो?”
“सच कह रही हूँ,” श्रुति ने अपनी बात जारी रखी। “तुम जिसे प्यार कहते हो, वो शायद तुम्हारी जिद थी। प्यार में इंसान आज़ाद करता है, कैद नहीं। और वैसे भी कबीर, अगर तुम खुश नहीं हो, तो किसी और की खुशी की वजह तो बन ही सकते हो न? यह कहाँ लिखा है कि हर कोई सिर्फ तुम्हें खुशी देने के लिए जिए? जीवन हमेशा लेने का नाम नहीं है। कभी-कभी हमें अपने दर्द को दरकिनार करके किसी दूसरे को खुशी देनी पड़ती है।”
कबीर अब अपने बिस्तर से खड़ा हो गया। उसका चेहरा गुस्से से लाल हो चुका था। वह तेज आवाज में बोला, “तुम्हें क्या लगता है कि मैंने किसी को खुशी नहीं दी? तुम नहीं जानती कि मैं उससे कितना प्यार करता था! मैंने अपनी सारी खुशियां उसके कदमों में रख दी थीं। मैं पागलों की तरह उसके आगे-पीछे घूमता था। उसके गम में, उसकी तकलीफों में मैं अपना जीना तक भूल गया था। मैं आज भी उससे दूर नहीं रह पा रहा हूँ, और वो है कि मेरे कसमें-वादे सब भूलकर किसी और की दुनिया में मजे से बसी हुई है। उसने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। अब तो मेरा प्यार से ही भरोसा उठ गया है। मैं अपनी पूरी जिंदगी में अब कभी किसी से प्यार नहीं कर पाऊंगा।”
श्रुति अपनी जगह से उठी। उसके चेहरे पर अब दया नहीं, बल्कि एक सख्त भाव था। उसने कबीर के कंधे पर हाथ रखा और उसे आईने के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया।
“खुद को देखो कबीर। तुम सिर्फ एक धोखेबाज लड़की के जाने का मातम नहीं मना रहे हो, तुम अपने अहंकार के टूटने का मातम मना रहे हो। तुमने कहा न कि तुमने प्यार किया, अपना सब कुछ लुटा दिया, और बदले में तुम्हें बेवफाई मिली? तो एक बात बताओ… नीचे जो दो बूढ़े इंसान बैठे हैं, उन्होंने तुम पर अपनी पूरी जिंदगी लुटा दी, अपना खून-पसीना एक कर दिया। तुम्हारी एक मुस्कान के लिए तुम्हारे पिता ने कभी अपने लिए नए जूते नहीं खरीदे। तुम्हारी माँ ने तुम्हें पढ़ाने के लिए अपने गहने तक गिरवी रख दिए। उन्होंने तुम्हें वो सब कुछ दिया जो उनके पास था। और तुम उन्हें क्या दे रहे हो?”
कबीर आईने में अपनी अस्त-व्यस्त शक्ल देख रहा था। श्रुति के शब्द हथौड़े की तरह उसके दिमाग पर बज रहे थे।
श्रुति रुकी नहीं, उसकी आवाज में अब एक पीड़ा थी। “तुम शिकायत कर रहे हो कि उसने तुम्हारी कदर नहीं की। लेकिन कबीर, तुम भी तो वही कर रहे हो! तुम अपनी माँ की कदर नहीं कर रहे जो पिछले छह महीने से रोज तुम्हारा जूठा और ठंडा खाना खाकर सो रही है, क्योंकि तुम थाली फेंक देते हो। तुम अपने पिता की कदर नहीं कर रहे, जिनका ब्लड प्रेशर तुम्हारे तनाव को देखकर बढ़ता जा रहा है। जिस بیوفائی का रोना तुम रो रहे हो, वही बेवफाई तुम अपने माता-पिता के साथ कर रहे हो। वो लड़की तो पराई थी, वो चली गई। पर जो तुम्हारे अपने हैं, तुम उन्हें जीते जी क्यों मार रहे हो?”
कबीर के होंठ कांपने लगे। उसका गुस्सा अब आंसुओं में बदल रहा था।
“प्यार से भरोसा उठ गया है तुम्हारा?” श्रुति ने तंज कसते हुए कहा। “प्यार कभी एक इंसान तक सीमित नहीं होता कबीर। अगर एक लड़की के जाने से तुम्हारा जीवन खत्म हो गया, तो धिक्कार है ऐसे जीवन पर। क्या तुम्हारे वजूद की कीमत सिर्फ एक लड़की का साथ था? प्यार देखना है तो नीचे जाकर देखो। वो माँ जो तुम्हारे ताने सुनकर भी रात को उठकर तुम्हें कंबल ओढ़ाती है। वो पिता जो अपनी पेंशन के पैसे तुम्हारे नाम पर सेव कर रहा है ताकि तुम्हारी नौकरी छूटने के बाद भी तुम्हें कोई कमी न हो। वो होता है सच्चा प्यार। जिसमें कोई शर्त नहीं होती, जिसमें कोई बेवफाई नहीं होती। तुम उनके प्यार के कर्जदार हो कबीर, उस लड़की के आंसुओं के नहीं।”
कमरे में एक भारी सन्नाटा छा गया। बाहर बारिश तेज हो गई थी। कबीर घुटनों के बल वहीं जमीन पर बैठ गया और अपने दोनों हाथों से चेहरा छिपाकर फूट-फूट कर रोने लगा। उसकी वे सिसकियाँ जो महीनों से उसके अंदर एक जहर बनकर पल रही थीं, आज आंसुओं के रास्ते बाहर निकल रही थीं। वह रोता रहा और श्रुति चुपचाप उसके पास खड़ी रही, उसे उसका सारा दर्द बाहर निकाल लेने दे रही थी।
काफी देर बाद जब कबीर शांत हुआ, तो श्रुति ने उसे उठाया और उसका हाथ पकड़कर उसे सीढ़ियों की तरफ ले गई। “चलो मेरे साथ,” श्रुति ने कहा।
दोनों धीरे-धीरे सीढ़ियां उतरकर आंगन में आए। दालान में एक हल्की सी पीली रोशनी जल रही थी। सुमित्रा देवी उसी पुरानी थाली को लिए सोफे के एक कोने में सो गई थीं। उनके चेहरे पर गहरी झुर्रियां और आंसुओं के सूखे हुए निशान साफ दिख रहे थे। पास ही दीनानाथ जी चश्मा लगाए कबीर की कोई पुरानी स्कूल की मार्कशीट देख रहे थे, शायद अपने बेटे के उस पुराने और होनहार रूप को याद करने की कोशिश कर रहे थे।
कबीर के कदम भारी हो गए। उसने अपने पिता को इतने गौर से महीनों बाद देखा था। उनके बाल पहले से कहीं ज्यादा सफेद हो चुके थे और उनके कंधे झुके हुए लग रहे थे। कबीर को लगा जैसे किसी ने उसके सीने में खंजर घोंप दिया हो। वह धीरे-धीरे अपनी माँ के पास गया। उसने बहुत ही कोमलता से सुमित्रा देवी के हाथ से वह ठंडी खाने की थाली ले ली।
सुमित्रा देवी की आँख तुरंत खुल गई। कबीर को अपने सामने खड़ा देखकर वह घबरा गईं। “क्या हुआ बेटा? खाना ठंडा हो गया है? तू रुक, मैं अभी गैस पर गरम कर देती हूँ।” वह हड़बड़ा कर उठने लगीं।
कबीर ने अपनी माँ के कांपते हुए हाथों को पकड़ लिया। उसकी आँखों से फिर आंसू बहने लगे। उसने वही ठंडा निवाला तोड़ा और अपने मुंह में रख लिया। “खाना बहुत स्वादिष्ट है माँ… दुनिया का सबसे स्वादिष्ट खाना,” कबीर रुंधे हुए गले से बोला।
सुमित्रा देवी को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। उन्होंने कांपते हाथों से कबीर का चेहरा छुआ। पास बैठे दीनानाथ जी ने भी अपना चश्मा उतार कर रख दिया और उनकी बूढ़ी आँखों में एक चमक सी आ गई।
कबीर आगे बढ़ा और उसने अपने पिता को गले से लगा लिया। “मुझे माफ कर दीजिए बाबूजी। मैं अंधा हो गया था। मैं एक ऐसे रिश्ते के पीछे भाग रहा था जिसकी कोई बुनियाद नहीं थी, और उस रिश्ते को भूल गया जो मेरी रगों में दौड़ रहा है। मैंने आप दोनों को बहुत तकलीफ दी है। मुझे माफ कर दीजिए।”
दीनानाथ जी ने अपने बेटे की पीठ थपथपाई। एक पिता के पास शब्द कम होते हैं, लेकिन उनका स्पर्श सब कुछ कह देता है। “कोई बात नहीं मेरे लाल। जब सुबह का भूला शाम को घर लौट आए, तो उसे भूला नहीं कहते। हमने तो बस तुम्हारे वापस लौटने का इंतजार किया है।”
उस रात कबीर ने अपनी माँ के हाथ से खाना खाया। श्रुति दूर खड़ी मुस्कुरा रही थी। कबीर ने तय कर लिया था कि जो बीत गया वो एक बुरा सपना था। अब वह किसी ऐसे इंसान के लिए अपनी जिंदगी बर्बाद नहीं करेगा जिसने उसकी कदर नहीं की। अब वह उनके लिए जिएगा, जिनकी जिंदगी सिर्फ उसी से जुड़ी है।
अगली सुबह जब सूरज निकला, तो कबीर के कमरे की खिड़की खुली हुई थी। उसने अपनी दाढ़ी बना ली थी और वह अपने लैपटॉप पर नई नौकरी के लिए अपना रिज्यूमे अपडेट कर रहा था। उसके दिल से उस लड़की का भ्रम पूरी तरह निकल चुका था और उसकी जगह अपनों के उस अटूट यथार्थ ने ले ली थी, जो कभी धोखा नहीं देता। कबीर समझ चुका था कि जीवन में प्यार का अर्थ सिर्फ किसी को पा लेना नहीं होता, बल्कि उन लोगों की खुशी का कारण बनना होता है, जो निस्वार्थ भाव से आपकी खुशी मांगते हैं।
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लेखिका : शारदा सक्सेना