असली खूबसूरती शरीर नहीं मन होता है – बिमला रावत जड़धारी

अरविंद, बेटा अरविंद।आया अंकल जी।क्या कर रहे हो?खाना बना रहा हूॅं, अंकल जी। आज मैं जल्दी आ गया तो सोचा

खाना ही बना लेता हूॅं। सब्जी तो बन गयी, रोटी बनाना बाकी है।बहुत बढ़िया! चलो साथ बैठकर चाय पीते हैं। अभी

खाना खाने में बहुत टाइम है।ठीक है, मैं अभी चाय बना देता हूॅं। आप आंटी जी को भी बुला लो।;तुम वहीं चलो, मैं पूनम

को बोल कर आया हूॅं चाय बनाने के लिए।पूनम, हम आ गए। चाय बन गयी है तो लेते आओ।तीनों बैठे चाय पीते हैं, तभी

अरविंद कहता है अंकल जी, मुझे आऐ एक साल से ऊपर हो गया, कभी आप लोग अपने बेटे के पास नहीं गए, ना ही वो

लोग आए।बेटा उन लोगों के पास समय ही नहीं है। वो दोनों नौकरी करते हैं। हम जाकर क्या करेंगे, बच्चें होते तो उनसे मन

लग जाता। और फिर उनको हमारा …कमल जी, क्या बातें लेकर बैठ गए।पूनम जी, अरविंद से क्या छुपाना। तुम्हें याद है

जब अरविंद यहॉं मकान किराए में देखने आया था, तब हमें लगा था हमारा बेटा आ गया और तब से हम अरविंद में अपना

बेटा देखने लगे।क्या मतलब अंकल जी?हाॅं बेटा, हमारा बेटा अविरल तुम्हारी ही तरह गोरा-चिट्टा, अच्छा खासा लम्बा,

बिल्कुल अपनी मम्मी की तरह है। उसे शुरू से ही अपने रूप में बहुत घमंड था। किसी से भी सीधा मुंह बात नहीं करता था।

यहाॅं तक कि मुझे भी कुछ नहीं समझता था। उसने अपने साथ आफिस में काम करने वाली आरुषी से शादी कर ली। वो भी

उसी की तरह सुंदर और घमंडी है। जब हम उनके घर गए तो दोनों मुझसे – कहते पापा आप मेरे दोस्तों के सामने नहीं आया

करो, हमें आपको अपने दोस्तों से मिलाने में शर्म आती है। मम्मी का आना तो ठीक है पर आप का नहीं। तब पूनम ने गुस्से में

कहा – तामीज से बात करो, ये तुम्हारे पापा है। जब तुम अपने पापा की इज्जत नहीं कर सकते तो किसी और की क्या इज्जत

करोगे। असली खूबसूरती शरीर नहीं मन होता है। खूबसूरती तो आज है कल नहीं, मन को सुंदर बनाओ। मन सुंदर होगा तो

लोगों के मन में जगह बना पाओ। वरना कोई भी तुम्हें पूछेगा नहीं। और आज के बाद हम यहाॅं कभी नहीं आएंगे। – बस

अरविंद, तब से हम न कभी बेटे बहू के पास गये न ही हमने कभी फोन किया। और न उसने किया। बेटा तुम भी तो स्मार्ट

हो, पर तुम्हारा मन कितना साफ है। यहाॅं तुमने सबके मन में अपनी जगह बना ली है। आस पड़ोस के सभी लोग तुम्हारी

तारीफ़ करते हैं ‌‌। तुम्हें देख कर सब के चेहरे में मुस्कान आ जाती है।अरविंद अपने कमरे में आ जाता है। और सोचता है कि

मैं भी तो कितना घमंडी था। अपने समाने किसी को कुछ नहीं समझता था। किसी की भी बेइज्जती कर देता था। धीरे – धीरे

सब मुझसे दूर रहने लगे, पर मुझे उससे कोई फर्क नही पड़ा। घर में शादी की बात चली तो मैंने बोल दिया  मुझे लड़की

गोरी चाहिए, वह नौकरी करती हो या न करती हो मुझे उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। और मुझे रीमा मिल गयी। वह नौकरी

नहीं करती थी, मैं बहुत खुश था। रीमा बहुत सुलझी हुई लड़की थी। आते ही उसने सब के दिल में जगह बना ली। मम्मी –

पापा, सभी रिश्तेदार, आस – पड़ोस के लोग सभी रीमा की तारीफ करते। रीमा मुझे समझाती अरविंद सब से मिल कर

रहो, असली खूबसूरती शरीर नहीं मन है। एक बार तुम रंग भेद भूल कर सब के दिल में अपनी जगह बनाओ, तब देखना।

उनके चेहरे की खुशी देख कर तुम्हें कितना सुकून मिलेगा। पर मैं उसे डाॅंट देता और कहता अपना ज्ञान अपने पास रखो,

मुझे तुम्हारे ज्ञान की जरूरत नहीं है।शादी को आठ साल हो गए। दो बच्चों का पिता बन गया, बेटी छः साल की और बेटा

चार साल का। मुझे अपनी खूबसूरती का अब भी बहुत घमंड़ था। मुझे देख देख कर मेरी बेटी भी मेरी तरह अपनी सुन्दरता

पर नाज करती। रीमा उसे समझाती बेटा सब के साथ मिलकर रहो। बाहर अपने दोस्तों के साथ खेलो। बेटी कहती मम्मी

मेरे साथ का कोई नहीं है जिस के साथ मैं खेलूं। वह सब गन्दे बच्चें हैं, मैं उन बच्चों के साथ नहीं खेल सकती।देखा अरविंद,

इसमें तुम्हारा असर आ रहा है। तुम अपने को सुधारो। मैं नहीं चाहती ये बच्चें तुम्हारी तरह बनें।मैं हंस कर कहता ठीक ही

तो है, मैं चाहता हूॅं मेरे बच्चे मेरी तरह हो। रीमा गुस्सा हो कर अपना काम करने लगती।समय अपने रफ्तार से चलता

गया। एक दिन मैं नहा कर निकला तो रीमा ने पूछा अरविंद, तुम्हारी पीठ में ये कैसा सफेद सा निशान है?कैसा सफेद

निशान रीमा? फोन से फोटो खींच कर दिखाओ।जब देखा तो बोला अरे ऐसे ही है।अरविंद एक बार डाॅक्टर को दिखा

देना।क्यों दिखाऊं? तुम्हें क्या लगता है मुझे कोई बिमारी है।नहीं अरविंद, बीमारी नहीं है। अगर एलर्जी है तो दवाई से

ठीक हो जाएगी।मैं नहीं जा रहा डाॅक्टर के पास और मैं आफिस के लिए निकल गया। परन्तु आते हुए डॉक्टर के पास जाता

हूं। कुछ टेस्ट होते हैं। कुछ दिनों बाद रिपोर्ट आती है। डॉक्टर बताता है कि मुझे ल्यूकोडर्मा नामक बीमारी हो गयी है। ये

धीरे – धीरे पूरे शरीर में फैल जाएगी। पर घबराने की जरूरत नहीं है ये किसी और को नहीं होगी। उस दिन मैं बिल्कुल टूट

गया और रीमा से कहा भगवान ने मुझे सजा दे दी। मुझे अपने गोरे रंग में बहुत नाज था। इसलिए ये सब हो गया।अरविंद

ऐसे नहीं बोलते। ये तो किसी को भी हो सकता है। तुम हिम्मत रखो और जो हो रहा है इसे स्वीकार करो सब ठीक हो

जाएगा।रीमा तुम ठीक कहती थी कि असली खूबसूरती शरीर की नहीं मन की है। इसी बीच अरविंद का तबादला कलकत्ता

से दिल्ली हो गया। दिल्ली कमल जी के यहाॅं किराएदार के रूप में रहने लगा। धीरे – धीरे अरविंद में बहुत परिवर्तन आने

लगा। वह सबसे मिल-जुल कर रहता, सबसे हंसी मजाक करता। जब कलकत्ता अपने घर जाता, अपने आस पड़ोस वाले सब

से बातें और हंसी मजाक करता। उसके इस परिवर्तन से सबको बड़ा आश्चर्य होता। सब कहते अरविंद घर से दूर जा कर

तुममें तो बहुत परिवर्तन आ गया। अरविंद कहता हाॅं भाई, दूर रह कर ही आप लोगों की अहमियत पता चली। आप सब

लोगों को बहुत मिस करता हूॅं। मैं ही मुर्ख था जो आप लोगों से दूर – दूर रहा।अरविंद अब सब का चहेता बन गया। किसी ने

भी उसके शरीर के निशानों को लेकर ताना नहीं मारा। आज परिवार वाले अरविंद के इस परिवर्तन से बहुत खुश हैं।

अरविंद ने भी अपने शरीर के सफेद निशानों को स्वीकार कर लिया।- 

बिमला रावत जड़धारी

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