मांजी ओ मांजी विमला ने रजनी जी को झकझोरा तो रजनी जैसे नींद से जाग उठी हो, क्या हुआ मांजी आप ऐसे कैसे गुमसम सी उदास बैठी हो। इतना सुनते ही रजनी के गालों पर दो आसूं की बूंदें लुढक गई।
फिर विमला ने उनको जमीन से उठाया और सोफे पर बिठाया। विमला जल्दी से दो कप चाय बना लाई और बड़े प्यार से रजनी की तरफ बढाया, लो मांजी चाय पी लो, मन को थोड़ा शांत करो।
विमला रजनी के घर पिछले दस साल से घर का चौका बरतन करती थी। और रजनी जी के खाने वाले काम मे भी हाथ बंटाती थी, और रजनी की देखभाल भी करती थी।
आइये पहले रजनी के बारे मे जानते है। रजनी का खुशहाल परिवार था। पति और अपने आठ साल के बेटे शिवम के साथ हंसी खुशी से जीवन बीत रहा था फिर अचानक एक रोड एक्सीडेंट में शिवम के पिता की मौत हो गई। रजनी के आखों के आगे अधेंरा छा गया। हंसता खेलता परिवार बिखर गया।
रजनी की तो जैसे दुनिया ही उजड गई। पति के मौत के बाद रजनी के सामने घर का खर्चा शिवम की परवरिश और उसके पढाई लिखाई की समस्या आ गई। शिवम का भविष्य रजनी को अंधकार मय नजर आने लगा था। रजनी ने प्रेम विवाह किया था इसलिए उसके खुद के मां बाप और ससुराल वालों ने भी उससे नाता तोड दिया था।
अब वो किससे मदद मांगे कौन सहारा देगा कुछ समझ नहीं आ रहा था। पति का फडंऔर कुछ सैलरी देकर कंपनी वालो ने अपनी इतिश्री कर ली। इसी ऊहापोह मे कि क्या किया जाए और क्या नही छै महीने बीत गए। जो कुछ पैसे मिले थे वो सब खतम होने को आ गए थे।
कुछ तो करना ही होगा, कैसे चलेगा आगे। बहुत ज्यादा पढी लिखी भी नहीं थी बस सिंपल सा बीए एम ए किया था ऐसी कोई डिग्री नहीं थी जिससे वह कोई नौकरी कर सकें। लेकिन वह बाहर जाती काम करने तो शिवम को कौन देखता।
एक दिन रजनी बाजार गई और उसकी मुलाकात परिचित निशा से हो गई उसकी पुरानी जान पहचान थी। कुछ बातें हुई आपस मे फिर निशा ने बताया कि हमारे घर के पडोस के मकान मे चार लडके आए है किराए पर। उनको खाने पीने की बड़ी समस्या हो रही है वो हमसे पूछ रहे थे
यहाँ कहीं आसपास कुछ है भी नहीं दूर जाना पड़ता है। क्या ऐसा कोई मिल सकता है जो उन लोगों के घर खाना बना दे या कहीं से मगंवा ले कुछ जानती हो तो बताओ। सुनकर रजनी का दिमाग थोड़ा ठनका उसने निशा से कहा अच्छा देखती हूँ कुछ हो पाया तो बताऊंगी तुम्हे।
और दोनों अपने अपने घर को चली गई। घर आकर रजनी ऊधेडबुन मे रही कि क्या कुछ किया जा सकता है। कई दिन सोंचने के बाद उसके दिमाग मे एक बात आई कि क्यों न इन लडको को टिफिन बना कर मै दूं देखते है क्या प्रतिक्रिया मिलती है। ऐसे घर बैठे काम हो जाएगा और शिवम की भी देखभाल हो जाएगी।
रजनी ने निशा को फोन लगाया और अपनी मंशा बताई साथ ही उन लडको से बात करने को कहा। निशा को भी ये प्रस्ताव सही लगा। निशा ने लडको से बात की उन लोगों ने हामी भर दी और कहा यदि खाना अच्छा रहा तो आगे भी मंगवाते रहेगे। निशा ने जब रजनी को बताया तो रजनी फूली न समा रही थी।
सोच रही थी एक छोटी सी शुरुआत है देखे क्या होता है। और निशा ने बड़े जतन से बढिया खाना बनाया और टिफिन लगाकर पहुंचा दिया। खाना उन लडको को बहुत पसंद आया एक तो घर का बना खाना और अच्छा गरमा गरम खाना पाकर वे बहुत खुश हुए।
तीन चार दिन खाने के बाद उन लडको को लगा कि आंटी खुद खाना पहुचाने आती है तो उन्होने रजनी को बोला आंटी आप परेशान न हुआ करे खाना बना कर टिफिन लगा दिया करे हम लोग आकर ले जाएगें। रजनी बहुत संतुष्ट थी ऐ छोटी सी शुरुआत करके।
धीरे धीरे रजनी के खाने की महक इधर उधर फैलने लगी। पास मे ही एक बैकं था वहाँ भी कुछ टिफिन जाने लगे। उन लडको से और लडको को भी पता चला तो खाने की डिमांड बढने लगी। इस छोटी सी शुरुआत ने रजनी को बडे लेबल का काम दिलवा दिया काम अच्छा चलने लगा रजनी बहुत खुश था काम करके।
इसी क्रम मे रजनी ने विमला को अपनी सहायता के लिए रख लिया। अब शिवम भी बड़ा हो गया था और इस बार इंटर की परीक्षा दे रहा था। रजनी की खाने की गाड़ी अब सुचारू रूप से चलने लगी थी। रजनी शिवम को उच्च शिक्षा दिलवाना चाहती थी। शिवम भी पढाई मे होशियार था।
इस तरह अच्छी पढाई के बाद शिवम इंजीनियर बन गया और अब उसे भी किसी कंपनी में नौकरी मिल गई थी। रजनी की पूरी दुनिया ही शिवम के आसपास ही घूमती थी और था ही कौन रजनी का शिवम की ही खातिर तो जी रही थी।
आज रजनी के ऊपर जैसे वॼपात हो गया जब शिवम ने घर आकर बताया कि कंपनी उसे तीन महीने को आस्ट्रेलिया भेज रही है। रजनी बहुत उदास हो गई कैसे रहेगी वो शिवम के बिना।
शिवम ऐसा मौका छोडना नहीं चाहता था माँ को उदास देखकर शिवम कहने लगा माँ बस तीन महीने की ही तो बात है ऐसा मौका सबको नहीं मिलता। उदास न हो माँ मै जल्दी ही वापस आ जाऊंगा। आखिर रजनी भी मन मारकर जाने देने को तैयार हो गई।
आज शिवम की फ्लाइट थी और रजनी बेमन से तैयारियां कर रही थी। रजनी बार बार हिदायतें दे रही थी बेटा अच्छे से रहना, अपना खूब ध्यान रखना, ज्यादा ठंडी चीजे मत खाना उससे तुम्हारा गला खराब हो जाता है। जाते ही फोन करना वगैरह वगैरह।
शिवम उन्मुक्त गगन मे उड चला अपने सपनो को पंख देने को। पर यहाँ रजनी बहुत उदास हो गई। किसी काम मे मन न लगता। जब भी खाना खाने बैठती बस यही सोचती पता नहीं शिवम ने खाना खाया होगा कि नहीं, वहाँ उसके पसंद का खाना मिल रहा होगा या नहीं। तमाम बातें रजनी को दिनभर परेशान किए रहती थी। तीन महीने किसी तरह गुजरे लेकिन आज शिवम का फोन आया कि मम्मी अभी मै वापस नहीं आ सकता मेरा टाइम और बढ़ा दिया है
छै आठ महीने या सालभर। क्या कह रहे हो बेटा मै कैसे जीऊंगी यहाँ। अरे माँ बहुत लडके आते देश से बाहर आखिर उनके माँ बाप भी तो रहते है न, आप भी रह लेना और हाँ आप काम तो करती हो उसी मै मन लगाओ।
और फिर कुछ समय बाद शिवम ने फोन किया कि माँ अभी दो साल का समय और बढ़ गया है। अब शिवम को भी वहां रहना अच्छा लगने लगा था और माँ से दूरी बढती जा रही थी अब फोन भी कम करने लगा था। और फिर एक दिन शिवम ने कहा माँ मै एक लड़की को पसंद करता हू और हम दोनों शादी करना चाहते है। ये तो माँ को बस तसल्ली दी जा रही थी शादी भी कर ली थी और अब वही पर रहने का प्रोग्राम भी बन चुका था। रजनी बस इतंजार मे ही बैठी रहीं।
यहाँ रजनी का बिजनेस अच्छा चलने लगा था। उसके खाने की डिमांड बढ गई थी अब उसके खाने के कुछ पैकेट एक्सपोर्ट भी होने लगे थे। बेटा उसके खाने से वंचित न रह जाए इसलिए उसके पसंद की चीजे उसके पास भी भेजती थी। धीरे धीरे पांच साल बीत गए और शिवम घर लौटकर नहीं आया। अब वो एक बच्चे का बाप भी बन गया था। रजनी शिवम और उसके बच्चे को देखने को तरसती रहती थी। हफ्ते में एक बार विडियो काल हो जाती थी उसी से बात है जाती थी। हर बार रजनी यही पूछती कि शिवम कब आएगा शिवम बोलता जल्द आऊंगा माँ बस थोड़ा काम कम हो जाने दो। अच्छा शिवम ये बता जो मै तेरी पसंद का खाने का सामान भेजती हूँ वो खाता तो है न, हाँ माँ खाता हूँ कहकर टाल देता बात को। लेकिन शिवम की पत्नी सुमैला शिवम को हर बार कहती मना करो माँ को क्यों भेजती है ये सब बेकार जाता है कोई नहीं खाता। लेकिन शिवम माँ की भावनाओं का ख्याल करके चुप रह जाता। इस बार जब रजनी ने खाने के सामान के लिए शिवम से पूछा तो शिवम चुप रहा पीछे से सुमैला बोली क्यों भेजती है ये सब इतना आयली खाना कौन खाता है सब फेका जाता है। आप अपनी मेहनत और पैसे दोनों बर्बाद कर रही है। शिवम भी चुप रहा कुछ नहीं बोला। रजनी पर मानो घडो पानी गिर गया हो। धम्म से जमीनपर बैठ गई। जिसके लिए इतना कुछ किया आज वही पराया हो गया। रजनी को एक गहरी ठेस लगी मन को। अपने और पराए वक्त ने सब बता दिए।
रजनी के मन मे गहरी पीड़ा थी। रात को बिना खाए पीए ही सो गई। सुबह उठी तो अनमनी सी थी। विमला आई काम करने तो देखा माँ जी बिलकुल चुपचाप है क्या हुआ माँ जी आप परेशान सी लग रही है। विमला के छेडते ही मन की सारी पीड़ा बाहर निकल गई। विमला ने सांत्वना दी ठीक है माँ जी आपको दुख हुआ लेकिन दुनिया ऐसी ही है। मत परेशान हो। इतनी दूर खाने का पैकेट भेजती है क्या फायदा हुआ मत परेशान हो।
अच्छा माँ जी मै आपसे बात करने आई थी कि मेरी बेटी के बेटा हुआ है क्या आप उसके लिए लडडू बना देगी जो पैसा खर्च होगा वो मै दे दूगीं। रजनी अचानक तंद्रा से जागी और बोली तुम्हारी बेटी की डिलीवरी हुई है तो उसके खाने पीने का सब खर्चा मै उठाऊंगी, तुम परेशान न होना जो कहोगी वो मै बना दूगीं। क्या करूगीं इन पैसो का अब किसको जरूरत है इसकी बेटा तो विदेश मै बैठ गया जाकर।
रजनी अब विमला की बेटी के लिए ही सबकुछ करती है वो बच्चे को लेकर घर आ जाती है उसके बच्चे के साथ खेलती है प्यार करती है उसके लिए कपड़े और जरूरत का सामान लाती है। धीरे धीरे रजनी का मन बदलने लगा और शिवम की कमी अब कम महसूस होने लगी। शिवम भी अब फोन कम ही करता। अब तो शिवम आस्ट्रेलिया का होकर रह गया। माँ को तो जैसे भूल ही गया। जब अपने पराए हो जाते है तो कोई न कोई पराया अपना बन जाता है। आजकल ऐसी ही दुनिया हो गई है। अपनो के लिए कितु ही कुछ कर लो वो अपनत्व नहीं मिलेगा लेकिन परायों के लिए थोड़ा सा करके बहुत कुछ मिल जाता है अपने और पराए तो वक्त ही बताता है।
मंजू ओमर
झांसी उत्तर प्रदेश
4 अप्रैल