कभी भी किसी पर आंख मूंद कर भरोसा मत करना चाहिए। – सीमा सिंघी

बाजार के बीचो-बीच रमेश जी की कपड़े की दुकान खूब अच्छी चल रही थी क्योंकि रमेश जी की पारखी नजर लोगों की पसंद ना पसंद को बहुत अच्छी तरह समझने लगी थी इसीलिए जिस तरह के ग्राहक आते। उन्हें उसी तरह के कपड़े दिखाकर खुश कर देते। रमेश जी की दुकान से कोई भी ग्राहक खाली हाथ नहीं लौटता था

और इसकी खूबी रमेश जी की पारखी नजर के संग संग उनका अच्छा व्यवहार भी था। वह अच्छी तरह जानते थे की एक दुकानदार का अपने ग्राहक के साथ किस तरह का व्यवहार होना चाहिए।

रमेश जी की दुकान से कुछ कदम छोड़कर उनके छोटे भाई शंकर की भी दुकान थी मगर उसमें ग्राहक बहुत कम आते थे, वजह थी शंकर का अपने ग्राहकों के प्रति रूखा व्यवहार। इसीलिए शंकर की दुकान पर वही ग्राहक जाते जिन्हें बाजार में वह कपड़ा उपलब्ध नहीं होता था। 

इसी वजह से शंकर अपने बड़े भाई रमेश जी के प्रति मन ही मन ईर्ष्या का भाव रखता था इसीलिए उनकी दुकान पर नुकसान पहुंचाने का कोई ना कोई तरीका हमेशा ढूंढते रहता था ।

रमेश जी का बेटा रोहन हमेशा अपने काका के लिए अपने पिता को सावधान रहने और उनकी किसी भी बात पर आंख मूंदकर यकीन करने को मना करते रहता था मगर रमेश जी फिर भी अपने भाई के प्रति वही मृदुल भाव ही रखते।

आज जब दोनों भाई का सामान ट्रक से उतर रहा था तो शंकर ने कपड़ों का एक जैसा पार्सल होने की वजह से खुद के पार्सल को अपने बड़े भाई रमेश जी का पार्सल समझ कर उसमें आग लगा दी। शंकर आग लगाकर जैसे ही घर की और लौटने लगा उसकी नजर उसे जलते हुए पार्सल पर लिखे नाम पर पड़ गई।

पार्सल पर अपना नाम देखते ही शंकर के होश उड़ गए । वह जोर-जोर से शोर मचाने लगा । अपने भाई शंकर की आवाज सुनकर रमेश जी और रोहन दौड़े दौड़े शंकर की करीब आ गए और पार्सल को जलते हुए देखकर हैरान रह गए।

अचानक रोहन बोल पड़ा काका अभी कुछ देर पहले तो दोनों पार्सल सही सलामत थे फिर क्या हुआ अचानक इस तरह कैसे आग लग गई जबकि यहां आस-पास आग का कोई जरिया दिख भी नहीं रहा है। तब शंकर रमेश जी की ओर देखकर रोते हुए कहने लगा। भैया मैंने तो आपके पार्सल में आग लगाई थी तो यह मेरी कैसे जल रही है ।

तब रोहन को सारा माजरा समझ आ गया। उसने अपने काका को समझाते हुए कहा। काका शायद हमारे पार्सल को देखकर आप अंदर जलाने का सामान लेने गए। मगर तब तक मैं अपना पार्सल घर के अंदर लेकर जा चुका था और आपने जल्दबाजी में वापस आग लगाते समय पार्सल पर नाम देखा ही नहीं। जिसका नतीजा आपका पार्सल जल गया।

आपने हमारा नुकसान चाहा मगर आपका ही नुकसान हो गया । अपने भतीजे रोहन की बात सुनते ही रमेश जी अपने छोटे भाई शंकर से बोल उठे।

यह मैं सपने में भी नहीं सोच सकता था मेरे छोटे भाई। मुझे दुकान के आसपास के लोग हमेशा कहा करते थे कि कभी भी किसी पर आंख मूंदकर विश्वास नहीं करना चाहिए खासकर आपको अपने भाई शंकर पर मगर मैं तेरा बड़ा भाई जो एक दिन तुम्हारे ठीक होने का और तुम्हारे दिल में मेरे प्रति प्यार जागने का इंतजार करता रहा।

धिक्कार है तुम पर… आज तुमने लोगों की बात को सच साबित कर दिया कि कभी भी किसी पर आंख मूंदकर विश्वास नहीं करना चाहिए कहते हुए रमेश जी दुखी हो उठे। 

अब शंकर को सारा माजरा समझ आ चुका था और अपने नुकसान के प्रति उसे भारी पछतावा भी हो रहा था। वह फिर दुखी मन से बोल उठा । मुझे क्षमा कर दीजिए भैया, मुझसे बहुत बड़ी भूल हो गई इसीलिए मुझे ईश्वर ने आज इतनी बड़ी सजा दी है। मैंने आपको नुकसान पहुंचाना चाहा मगर देखिए मेरी करनी ने मेरा ही नुकसान करवा दिया।

मगर आज के बाद वादा करता हूं मैं ऐसा कभी नहीं करूंगा। अपने छोटे भाई शंकर की बात सुनकर रमेश जी का मन पिघल गया क्योंकि शंकर का काफी नुकसान हो चुका था । जिसने रमेश जी का मन बहुत द्रवित कर दिया था ।  वो फिर शांत मन से बोल उठे ।

शंकर मेरे भाई आगे से कभी भी किसी के बारे में बुरा मत सोचना और अपना व्यवहार सदा अच्छा रखना। तुम्हारी दुकान पर ग्राहक ग्राहक कम आने की वजह भी तुम्हारा यह व्यवहार ही है जो तुम्हारा ही दुश्मन बन बैठा था।

अपने भाई रमेश जी की बात सुनकर शंकर बहुत पछताते हुए बोल उठा। हां भैया आज के बाद मैं अपना व्यवहार ग्राहक तो क्या सभी के प्रति बहुत अच्छा रखूंगा और हां आज के बाद आप यह कभी मत कहना की कभी किसी पर आंख मूंद कर विश्वास नहीं करना चाहिए। क्योंकि आज के बाद में वह मौका आपको कभी नहीं दूंगा कहते हुए शंकर अपने बड़े भाई रमेश जी के गले लगा पड़ा। 

स्वरचित 

सीमा सिंघी 

गोलाघाट असम

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